8.12.13

जन गण मन की जीत हुई

टेलीविजन पर जैसे - जैसे आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों के जीतने के और दिल्ली के तीन कार्यकालों को सँभालने का व्यापक अनुभव रखने वाली शीला दीक्षित जी के बुरी तरह हारने के समाचार आ रहे थे उनसे देश की राजनीति तो स्तब्ध थी परन्तु जनता का उत्साह तो जैसे हिलोरें मार रहा था।  मात्र चौदह माह पुरानी पार्टी डेढ़ सौ साल पुरानी पार्टी के साथ जैसे दूध - भात का खेल खेल रही थी।  इस आश्चर्यजनक घटना के साक्षी बने हमसब जो उन दिनों के भी साक्षी थे जब सत्ता के मद में चूर नेता आम आदमी को धूल चटा रहे थे।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के प्रमुख किरदार अरविंद केजरीवाल थे।  परन्तु इस जीत के पीछे दो आंदोलन हैं जिन्होंने जनता को जगाया और ये याद दिलाया कि उठो, जागो और विरोध करो इस व्यवस्था का जो जनता के द्वारा , जनता के लिए चुनी तो जाती है परन्तु शासन सिर्फ अपने भले के लिए करती है। शासक दल का तो जैसे बुरा वक्त आ गया था या कहें कि पाप का घड़ा भर गया था जो जनता कि शक्ति को समझने की बजाए इन आंदोलन के नेताओं अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को सताने में लग गया और इतना ही नहीं इनके और इनके साथियों के साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार करने लगा। कांग्रेस के समझ में ही नहीं आया कि जनता इसे अपने अपमान की तरह ले रही थी।  सोशल मिडिया में लगातार आग सुलग रही थी कि हम तो बस अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं। और देखिये, विधानसभा चुनावों में देश की सबसे पुरानी पार्टी और शासक दल कांग्रेस का सफाया हो गया।

सबसे पहले देश की राजधानी दिल्ली
दिल्ली में पंद्रह वर्षों से चल रही शीला सरकार से लोग स्थानीय कारणों के अलावा केंद्रीय नेतृत्व कि असफलता के कारन भी नाराज थे।  बिजली, पानी , गैस की बढ़ी दरें और बेतहाशा बढ़ता भ्रष्टाचार देश अब और सहन नहीं कर सकता था उसमे करेला नीम चढ़ा हो गया अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का अनशन और दामिनी बलात्कार काण्ड।  शीला सरकार की नाकामियाबी खुलकर सामने आ गई परन्तु सरकार का दम्भी चेहरा देख जनता ठगा सा महसूस करने लगी।
अरविंद केजरीवाल का अपनी पार्टी बनाना और जनता को एक बेहतर विकल्प देना तो जैसे मुंह मांगी मुराद थी. जनता ने तुरंत ही इस मौके को लपका और अरविंद केजरीवाल की साफ़ सुथरी छवि और साधारण राजनीतिक कार्यशैली जनता के दिल में उतरी। भाजपा ने अपना नेतृत्व और उम्मीदवार तय करने में देरी दिखाई जिसका फायदा भी ' आप ' को मिला।  भाजपा बड़े दल के रूप में सामने तो जरुर आई परन्तु दिल तो ' आप ' ने जीता और अब वह एक सशक्त विकल्प के रूप में जनता के सामने आ गई है।

राजस्थान
राजस्थान में हर चुनाव में सरकार बदलने का रिवाज रहा है इसका फायदा वसुंधरा राजे को मिला।  फिर अशोक गहलोत अपने कार्यकाल में वायदे पूरे कर पाने और नवाचार देने में असफल रहे जिसका नतीजा रहा बेहद शर्मनाक हार।  गहलोत सरकार के मंत्री ही अपनी सीट नहीं बचा पाए तो अन्य का क्या कहना ? राजस्थान में भाजपा एक टीम के तौर पर सामने आई और पूरा खेल अपने घेरे में ले लिया। इस चुनाव में कॉंग्रेस २०० में से मात्र २१ सीटें ही बचा पाई।  मात्र एक कार्यकाल में यह हाल चिंताजनक है क्यूंकि अन्य राज्यों में सरकारें अपने दो -दो कार्यकाल पूरे कर चुकी थीं।  ऐसे में केंद्र सरकार के सर हार का दोष मढ़ना नकारात्मक सोच ही दिखाता है।

मध्यप्रदेश
अपने कुशल प्रशासन के साथ ही सौम्य और मिलनसार छवि ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लगातार तीसरा कार्यकाल पूरा करने का मौका जनता ने दिया। कॉंग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एंटी इन्कम्बेंसी का फायदा नहीं उठा पाए और राज्य में बुरी तरह पराजित हुए।  ज्योतिरादित्य और राहुल गांधी ने पूरे प्रदेश में जबर्दस्त चुनाव प्रचार किया परन्तु वे कुशल और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का भरोसा नहीं दे पाए।  वहीँ नरेंद्र मोदी की लहर ने हवाओं का रुख पूरी तरह से शिवराज सिंग चौहान के पक्ष में कर दिया।  अब कांग्रेस क्या आत्मावलोकन और विश्लेषण करेगी पता नहीं परन्तु दिग्विजय सिंह जी के बोले शब्द अब वापस भी तो नहीं हो सकते हैं न।

हमार छत्तीसगढ़
स्वच्छ छवि और विकास को मुद्दा बनाने वाले चाऊर वाले बाबा के लिए इस बार की जीत उतनी सरल नहीं थी क्योंकि दरभा घाटी कांड, महिलाओं की सुरक्षा, मजदूरों का पलायन, बढ़ती बेरोजगारी और धीमा विकास ऐसे मुद्दे थे जिनसे निपटना सरल नहीं था।  परन्तु रमन सरकार की खुश किस्मती देखिये कि कांग्रेस एक बार फिर छग में भीतरघात की शिकार हो गई और ३९ सीटों पर सिमट गई। दिनभर चली टिक - टॉक के बाद आखिरकार गेंद भाजपा के पाले में आ ही गई और रमन सिंग सरकार की हैट्रिक तय हो गई और एक अदद जीत का इंतज़ार करती कॉंग्रेस फिर से हाथ मलती रह गई।

जनता खुश है इन परिणामों से क्योंकि ये जन गण का मन है।  एक चुनाव ही वह तरीका है जिससे सत्ता कांपती है और सर झुकाकर जनता के आदेश को स्वीकारती है।  पांच सालों में केवल एक बार जनता अपना अस्तित्व साबित कर पाती है। ऐसा नहीं है कि जनता ने अपने शासक को पुकारा नहीं परन्तु लोकतंत्र में आश्चर्यजनक रूप से शासक स्वयं को जनता का सेवक न समझकर स्वामी समझने लगता है और जनता की हर पुकार अनसुनी कर देता है।  ऐसे में लाचार जनता के पास चुनाव में विपक्ष को चुनने के सिया चारा भी क्या बचता है ? परन्तु इस बार भारत वर्ष के चुनाव कि तस्वीर कुछ अलग थी।  सबकी निगाहें थीं अन्ना हजारे के अर्जुन अरविंद केजरीवाल पर और सबकी उम्मीदों से कहीं आगे बल्कि अपने गुरु कीउम्मीदों से भी बहुत आगे जाकर इस ' मैंगो पीपल ' पार्टी ने जैसे पूरे देश कि जनता को झूमने को मजबूर कर दिया। हर तरफ केवल ' आप ' की चर्चा। क्यों न हो ? आखिर वर्षों बाद भारतीय जनता को कोई ऐसा चेहरा मिला जिसने आजादी की लड़ाई के दौरान गांधीजी के जनता से जुड़ने और उनके लिए लड़ने वाले योद्धा की याद दिल दी।  जी उठे वो आदर्श जो भारत की पहचान हैं।  युवाओं की एक छोटी सी टोली जिसके पास हौसला है और उत्साह है देश के लिए कुछ करने का।  पूरे देश की राजनीति को बदलने का माद्दा दिखाना होगा ' आप ' को और यह गरीब दल ऐसा करे यह पूरे देश की आशा और विश्वास है।  आज लोकतंत्र की जीत हुई है।  आज गणतंत्र की जीत हुई है।

जय जवान !
जय हिन्द !
[ दो चित्र इस आम आदमी के ]