16.6.17

फिर वही सवाल ?

आपने कोचिंग क्यों खोली आप तो ऑफिसर नहीं हो...
हमेशा की तरह वही सवाल .. आपने कोचिंग क्यों खोली आप तो ऑफिसर नहीं हो....  मैं बोर हो चुकी हूं बता बता कर कि मेरे बच्चे ऑफिसर है और ऐज़ अ टीचर... यही मेरी जॉब है ... पर वह दो औरतें कहां मानने वाली थीं...  मुझे लगा वह बहुत ज्यादा फ्रस्टेटेड थीं और इस बात से काफी परेशान थीं कि पुरुष उनसे ज्यादा मुझ पर ध्यान दे रहे थे। वह हर कोशिश कर रही थी मुझे नीचा दिखाने की.... पक पक पक पक पक पक ...दिमाग खराब हो गया था मेरा.. बस फिर मैंने मौन व्रत ले लिया और टीटी के आने का इंतजार करने लगी.... 😑😑😑

टीटी के आते ही मैंने कहा ..... प्लीज मेरी जगह चेंज कर दीजिए .... ट्रेन में बैठी दोनों सहयात्रियों ने मुझे बड़े गुस्से से घूर कर देखा और TT ने उन्हें गुस्से में देखा ...... 1 सेकंड को लगा कि मैंने गलती की ... मुझे धैर्य दिखाना था... पर जल्दी ही अपनी बीमार बेटी को लेकर मैं दूसरी जगह बैठने चली गई । यहां अच्छे लोगों का साथ मिला और मेरी बेटी भी खुश होकर बात करने लगी 🐤🐤🐤 वहाँ कॉलेज के लड़के लड़कियां थे आपस में हंसी-खुशी बात कर रहे थे और मुझसे भी टिप्स लिए गए ..पीएससी क्लियर करने के .. that's so nice ..😊😊😊 👍👍👍

कहने का मतलब यह है कि हर समय बेवकूफों को झेलना कोई जरूरी नहीं है । आप अपने बैठने की जगह भी बदल सकते है क्योंकि कुछ लोग तो सुधारने से रहे...  हम क्यों अपना समय खराब करें उनपर... 😏

 कोचिंग खोलने के बाद से ऐसी घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं मेरे साथ जिसमें औरतें मुझे बहुत बुरी तरह टारगेट करती हैं और उनके मूर्ख मित्र भी चले आते हैं मुझे नीचा दिखाने ।।।।। क्या कर सकते हैं ...कुछ नहीं कर सकते..   उस वक्त को बस बीत जाने देते हैं बस। परंतु कालांतर में देखने में आया कि वह औरतें भस्मासुर साबित हुईं और बुरी तरह बेइज्जत करके अपने ही ग्रुप से निकाल दी गयीं ।  हाँलाकि कुछ बड़ी चालाक होती हैं...  लगता है उनका बड़ा इंतजाम किया जाएगा... पर यह तो मानना पड़ेगा 'जैसी करनी वैसी भरनी' । आज नहीं तो कल, अपनी जलन अपने ही लिए भारी पड़ेगी क्योंकि अच्छे लोगों का साथ खुद ईश्वर देते हैं।

😇😇😇

हमारा पर्यावरण

घर की हौद में कमल के फूलों के बीच सुंदर सुंदर चिड़ियाँ नहातीं, फड़फड़ातीं और सावधानी से चलती हुईं पानी के कीड़े खातीं बहुत प्यारी लगती हैं। मन करता है ये यूं ही संध्याजी की तरह पंख होते तो उड़ आती रे जैसी भंगिमाएँ बनातीं रहें और हम छुपकर चुपचाप इन्हें देखते रहें। मन करता है फोटो लूँ पर हमारी कोई भी हरकत इनके सामान्य जीवन में अड़ंगा न बने सोचकर ....

इधर धूप ऐसे तेज़ होती जा रही है जैसे बच्चों ने होड़ लगा ली हो कि किसका झूला सबसे ऊपर जाएगा। कभी रायपुर, कभी चाँपा, कभी बिलासपुर ... गजब प्रेस्टीज इश्यू बन गया है जनसामान्य में कि हमारा शहर सबसे गरम था कल... पेपर में आया है .. तुम्हारा 42° होगा .. हमारा 42.5° है .. और रूको थोड़ा 45° होना भी कोई बड़ी बात नहीं है.. पर इतना बोलते वक्त रूतबा 'दुखता' में बदल जाता है।

सोचती हूँ हमारी क्यूट गौरैया का क्या होगा अगर उसके आसपास पानी न हुआ और हुआ भी तो अगर उस स्त्रोत के पास अहीर याने शिकारी हुआ तो ? हमारी अरपा नदी इनकी समस्या का हल हो सकती है .. वहाँ चिड़ियों को आसरा मिल सकता है प्राकृतिक शरणस्थली के रूप में। ओह्ह.. याद आया ... हमें पहले तो अरपाजी को बचाना होगा पर कैसे? हम तो अपने घरों में पेड़ उगाते हैं अरपा तट पर नहीं फिर पूजा भी घर में करते हैं अरपाजी की नहीं। यहाँ तक की हमने कभी अरपा को अरपाजी तक नहीं कहा.. मतलब... हम बिलासपुर की प्राण शक्ति से ही कभी नहीं जुड़े तो अब ... सहिए 46.5° ताफमान हर साल।

हमारे अहम् ने हमें हमारी संस्कृति से विमुख किया है। अहम् को स्वार्थ भी कह सकते हैं। न नदियाँ बचीं न गायें बचाइए.. न चिड़ियाँ बचेंगी न पेड़ ... और सच - सच बताऊँ ... किसी बम के मदर और फादर की जरूरत नहीं है .. हम खुदही धीमी आत्महत्या के चरम को .....

तो क्या करें.. भई... वेदों को गरियाना ही पढ़े लिखे होने का सबूत है.. समाज सुधारक होने का सबूत है .. सबने किया ये तो... । मेरी दादी कहतीं थीं कि तेरी सहेली कुएँ में कूदी तो तू भी कूदेगी क्या ? भई जब आप रिज़ल्ट देख रहे हो सामने तब भी आँख बंद किए रहोगे क्या ?  अब तो नवाचार अपनाइए ... कब तक सौ साल पुराने ट्रेंड पर चलेंगे..।  आज का ट्रैंड 'वेदों की ओर लौटो' ही है मानो या न मानो ..
एक बात और, स्नेह और देखभाल भी गंगाजल की तरह तरल और पवित्र हैं। इनका प्रयोग भी भरी गर्मी में ज़रूर करिएगा ...  सूर्यदेव का प्रकोप कम मालूम पड़ेगा  ...

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Queen Kangana

एक वक्त था जब मुझे कंगना रानौत सख्त नापसंद थी..
पर हुआ यह कि एक दिन youtube पर मैंने ट्रेलर देखा""' मैं अकेली घूम रही हूं...  मेरा हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं.... मैं अकेली एफिल टावर देख रही हूं मेरे साथ फोटो खींचने वाला कोई नहीं .... मेरी जिंदगी तो झंड हो गई है... और उसके बाद पीछे गाना बजता है... तूने जो पिलाई तो हंगामा हो गया ..हां हंगामा हो गया.... "

तनु वेड्स मनु मुझे कुछ खास अच्छी नहीं लगी थी हीरो पसंद है पर हीरोइन कुछ खास नहीं...

पर क्वीन का ट्रेलर देखने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाई और फिल्म देखने चली गई । एक ऐसी फिल्म जिसके हीरो हीरोइन से मुझे कोई मतलब नहीं था। मैं बस यह देखना चाहती थी कि हिरोईन अकेले हनीमून पर क्यों गई थी ?

 फिल्म शुरू हो गई.. एक साधारण लड़का स्क्रीन पर आया और इतना बुरा व्यवहार अपनी होने वाली पत्नी के साथ किया कि हॉल में बैठी हुई लड़कियां क्या लड़के तक सन्न रह गए। हम सर खुजलाने लगे कि फिल्म तो खत्म हो गई अब यह दिखाएगा क्या ?

इसके बाद फिल्म शुरू होती है पेरिस में ... जहां कंगना को बहुत अच्छे दोस्त मिलते हैं... लड़के हो या लड़कियां ... देश कोई भी हो... रंग कोई भी हो.. होते सब इंसान हैं। एक अजीब सी जर्नी कंगना की शुरू होती है जहां अनजान लोग उस का हौसला बन जाते हैं और उसे पूरी तरह रियल पर्सन बना देते हैं।

फिल्म में कंगना का नाम रानी था जो शुरू में अजीब लगता है..  परंतु फिल्म खत्म होने के बाद .. आज तक..  मुझे कंगना Queen ही लगी हैं। उसके बाद आई तनु वेड्स मनु पार्ट 2 ... अच्छी फिल्म थी हीरो तो पसंद है ही .. पर इस बार हीरोइन भी अच्छी लगी even ज्यादा अच्छी लगीं।

उत्तराखंड के लोग दिल के सरल होते ऐसा मेरा इलाहाबाद के हॉस्टल का अनुभव है । कंगना को भी छल कपट पूर्ण व्यवहार करते नहीं देखा। हमेशा यही पढ़ा कि उनका मजाक उड़ाया जाता है , उनकी बहन रंगोली पर एसिड अटैक हुआ और उसके बाद ताजा प्रकरण ऋतिक विवाद हो गया।

कंगना हमेशा अपने बोल्ड अवतार में सामने आती है इन सब विवादों को अपने क्लियर कट अंदाज में उन्होंने निपटाया जिसकी वजह से वे लड़कियों की रोल मॉडल बन गई।

इस बीच अचानक हालाकि मैं पढ़ती नहीं हूं परंतु भास्कर में है कोई नाम याद नहीं आ रहा... और इंफेक्ट ...चौरसिया जी.. हां.. मैं उनका नाम याद करना भी नहीं चाहती थी.... चलिए अब याद आ गया ...उन्होंने लिखा के रितिक कितने महान परिवार के हैं और कंगना की औकात ही क्या है ...कभी इसके साथ रही कभी उसके साथ रही... स्टेशन में सोई... मुझे बहुत बुरा लगा। उन्होंने ऋतिक के बचाव के लिए कंगना की इज्जत की वह धज्जियाँ उडा़ईं ..   कि पूछिए नहीं । एक कलेक्टर की पोती जो अपने दम पर अकेले खड़ी होती है बिना किसी पुरुष का नाम लिए तो उसको कोई कुछ भी बोल सकता है ... और जब वह ऐसा बोल रहा होता है यह भूल जाता है कि इज्ज़त बोलने वाले की उतरी। कंगना तो हमारे लिए क्वीन है और रहेंगी।

कल अचानक फिर नजर पड़ गई पेपर पर जिसमे चौरसियाजी ने नरगिस की माताजी के संघर्ष को बड़े अच्छे से बताया । क्यों... डरते हो संजय दत्त से... कंगना के बारे मे लिखते समय नहीं  ध्यान आया  यह कंगना का संघर्ष था क्योंकि आपको कंगना का डर नहीं है। यही सोच है भारतीय पुरुषों की ...ऋतिक हों.. चौरसिया हो ...असफल बेटे के बाप शेखर सुमन हो .. सफल करण जोहर .. सब चिढ़े हुए अटैकिंग लोग.

कंगन कभी बदलेंगीं भी नहीं..  क्यों कि उन्होंने यह छोटा सा मुकाम अपने दम पर हासिल किया है। कंगना आप हमारे दिल में हो इज्जत से हो और हमेशा रहोगी।

शेखर सुमनजी आसमान पर मत थूकिए और अपने बेटे की असफलता अब पचाइए... क्यों अपनी हँसी उड़वा रहे हैं...

My favourite Shridevi

मेरी एक और फेवरेट फिल्म है। वो सबकी फेवरेट फिल्म है पर वो फिल्म फ्लॉप भी हुई और विवादित भी रही .....'लम्हें' ..
ये श्रीदेवी के करियर की ढलान की शुरुआत थी। इसके बाद और कई फिल्में आईं उनकी पर सब बकवास... लाडला छोड़कर। समय बदल रहा था.. दिवाना की श्रीदेवी लुक अलाइक दिव्या भारती सात समुंदर पार तक सबको लुभा रहीं थीं। चुलबुली और परफेक्ट श्री किसी भी फ्रेम में फिट नहीं बैठ रही थीं। हालत ये थी कि मुझे और कोई भाए न .. उनकी आँखें ... उनका डांस ... उनकी नटखट शैतानियाँ ... पर खुद लगे कि अब इनको सन्यास ले लेना चाहिए।

अब इस बुरे दौर से गुजर रही मुझ मायूस फैन को सहारा मिला स्वीsssssssट क्यूट जूही चावला की पनाह में। जैसे ही सुंदर सी चावला जादू तेरी नजर पर दौड़तीं जातीं हम निकल पड़ते सेम ड्रेस खरीदने। चाहत इतनी जोर मारी कि घूंघट की आड़ से गाना देखने के बाद प्यार राहे इज़हार तक पहुँच गया और उनका एक कंधे दिखाता फुल साइज़ पोस्टर दिवार पे चिपका मारा। ये बात आम ही है .... कि इधर इज़हारे प्यार हुआ ..  उधर सारी बुआओं ने वो कोसा जूही को कि पूछिए मत।

इनके बाद आईं काजोल, करिश्मा, उर्मिला .. सब एक से बढ़कर एक पर ... सब 'उनसे' पानी कम ही थीं।

फिर न जाने कहाँ से आईं हमारी चाँदनी इंगलिश विंगलिश में। उफ्फ़.... वॉट अ ट्रीट इट वॉज़ ... 👌👌👌

तत्पश्चात हम सदमे से बाहर आए......... और गुनगुनाए....
'तू मेरी चाँदनी .....❤❤❤

- पक्की चमची ऑफ श्रीदेवी ☺

हमारी इरोम

डियर इरोम,

मुझे पता है आप इसे नहीं पढ़ेंगी पर अपने दिल की बात सबके सामने लिखूँगी ज़रूर। आपके अनशन ने मेरे मन में एक आपके प्रति एक दृढ़ व्यक्ति की छाप छोड़ी है।

डियर, आपका अनशन करना मुझे आधा गलत लगा क्योंकि पूर्वोत्तर के हालात मजबूर करते हैं कि वहाँ भारतीय सेना तैनात हो और आधा  सही लगा क्योंकि यह अनशन सेना की ज्यादतियों के खिलाफ था।

आपका मन निश्छल है जो तीन-पाँच समझने और करने की इजाज़त आपको नहीं देता है। अन्य दलों ने जो तरीके अपनाए वही तरीका है आज सफल जीवन जीने का। धनबल, बाहुबल, बरगलाना सब क्योंकि कहते हैं न जो जीता वो सिकंदर जो हारा वो बंदर। तो जंग में सब जायज़ है हमेशा से। आपको यह जंग नहीं लगी दैट्स सो नाइस ऑफ यू।

इरोम .. बाहरी दुनिया में कदम रखोगी तो इस सच्चाई का सामना करना ही होगा। आप तो बहुत बहादुर हो आपको घरवालों का सपोर्ट नहीं था फिर भी आपने अपने इरादे कमजोर न पड़ने दिए। अब आप आराम से अपनी ज़िंदगी बिताइए जिसकी हक़दार आप हैं.. डेफिनेटली हैं।

आप पर मुझे गर्व है कि हमारे देश में भी कोई इतना प्योर हार्ट है। अब तथाकथित योग्य लोगों को आप उनका काम करने दो और आप चैन की बंसरी बजाओ। आप फिर तैयार हों राजनीति में आने के लिए तो फिर आ जाइएगा और तैयारी के साथ ... 😊

लव यू डियर 👍
टेक केयर 😊
#IromSharmilaChanu, #IronLady

गुरमेहरवाद..

मुझे वाद-विवाद कभी अच्छे नहीं लगे। दोनों पक्ष सही हैं पर अपना ही राग अलापेंगे बस। ऐसी बहस में चाहे कोई  कितना भी अच्छा तर्क दे या भाषा का प्रयोग करें और दोनों पक्षों में से कोई भी जीते मुझे वो थोड़ा पानी कम ही लगते। आप एक ही बात पर अटक गए मतलब पूरी बात आपने समझी कहाँ।

अब क्योंकि पीएससी से जुड़ी हूं तो tv पर डिबेट देखती हूं । आज तक पर, दूरदर्शन पर... इनके डिबेट मुझे अच्छे लगते थे परंतु एक दिन गलती से मैंने अर्नब गोस्वामी को सुन लिया । मुद्दा था कि कश्मीरी युवक पाकिस्तान की जीतने की खुशी मना रहे थे और जेएनयू के दूसरे लड़कों ने उन्हें गुस्से में पीट दिया। बड़ी मासूम सूरत बनाते हुए कश्मीर के सुंदर लड़के तर्क देते हैं कि भारत में बोलने की आजादी है तो हम पाकिस्तान के जीतने पर खुशी क्यों नहीं मना सकते?

और बोलते-बोलते उस मासूम खूबसूरत लड़के ने सिर नीचे झुका कर एक बदमाश मुस्कुराहट छुपाई। मेरा खून खौल गया देख कर। हमारे डैशिंग ऑर्नब गोस्वामी कहां वेट करते हैं संघी का.. कोई कुछ बोले वह खुद ही कूद पड़े ...उनका तर्क सुनिए, "मतलब आप कहना चाहते हैं कि जापान जीतेगा कोई फुटबॉल मैच और मैं बम फोड़ना चाहता हूं ... ऑस्ट्रेलिया जीतेगा कोई मैच में बम फोड़ना चाहता हूं इसमें आपको क्या आपत्ति है... पर ऐसा कभी होता नहीं है ना ... मेरे डिबेट में आप भारत के खिलाफ एक बात नहीं कह सकते ... पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है उसकी जीत में खुशी मनाना.. आपका कोई तर्क अलाउड नहीं है। "

उस खूबसूरत मासूम कश्मीरी चेहरे का क्या रंग उड़ा.. मैं आपको क्या बताऊं ..मजा आ गया डिबेट देखकर..

वहीं कल बेहद चर्चित कन्हैया जी का तर्क सुना.. कितना मूर्ख आदमी है यह ...कितनी मूर्खतापूर्ण बातें करता है... धन्य हैं हमारे संबित पात्रा जी मेरे दूसरे पसंदीदा पात्र जिनकी वजह से मुझे डिबेट भाने लगे.. उन्होंने कन्हैया के तर्कों का इतना अच्छा जवाब दिया कि बंगाल की भूमि में होने के बावजूद भी उनके तर्कों को लोगों ने बेहद सराहा ... बताइए कन्हैया को रामदेव बाबा के अमीर होने पर एतराज था.. संबित पात्राजी ने कहा तो आप चाहते हैं कि वह गरीब बने रहें.... अपनी मेहनत से आज वो आगे आ गए तो उन्हें आप रोल मॉडल बनाएंगे या कोसेंगे?

इन दोनों महानुभावों की वजह से मुझे डिबेट अच्छी लगने लगी ।

 ....कल ndtv लग गया गलती से और वह दिमाग खराब हुआ कि नींद नहीं आई। उनका कहना था जोकि रवीश कुमार जी अपने अजीब ढंग से बता रहे थे जैसे कि कोई बच्चा महीनों से भूखा हो तो कैसे वह खाने पर टूट पड़ता है .. वैसे ही हमारे रवीश कुमार जी बिना सांस लिए अपनी बात धारा प्रवाह बोलते हैं जैसे सालों के भूखे हों। कल ठोककर उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि केवल नक्सली साहित्य मिल जाने से कोई देशद्रोही नहीं होता ..जबतक हिंसा नहीं हुई है कोई देशद्रोही नहीं माना जाएगा।

हे रवीश कुमार और कोर्ट ! इन 2 प्रश्नों का जवाब दीजिए पहले,
आदरणीय न्यायालय की सच्चाई अगर हम लिख दें या बोल दें.. तो कोई उस से दंगा तो नहीं भड़कता तो फिर इसे न्यायालय की अवमानना मानकर जेल क्यों भेज दिया जाता है.... दूसरा, कोई व्यक्ति यदि दूसरे व्यक्ति को रेप कर देंगे बोल दे तो उसके बोलने से रेप तो नहीं हो जाता.. तो फिर पुलिस उस आरोपी को क्यों गिरफ्तार कर लेती है । अब क्योंकि आपने अपने देश को एक भौगोलिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से बस देखा है तो आपको लगता है कि इसके खिलाफ बोल देने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता कि उसे सजा दी जाए । मतलब आपकी बहन को किसी ने देख कर कोई हनन जैसी बात कर दी ..आपको पीटने का जो मन हुआ खून खौला वह जायज है.. परंतु एक दूसरा व्यक्ति यदि भारत को अपनी मां समझता है और उसके हनन का प्रयास होते देखता है और उसका खून खौल जाता है और हाथ उठ जाता है तो वह गलत है ... क्योंकि वह व्यक्ति उस खास पार्टी का है जो आपको नहीं पसंद है । कोर्ट सिर्फ दूसरों को भाषण देने के लिए बनाए गए हैं... उलजुलूल कैसे भी फैसले करिए ...सैलरी रखिए और घर में निकल जाइए । रविशजी ..आपका tv चैनल असंतुष्टों को खुश करने की खुजली मारक दवाई से ज्यादा कुछ नहीं लगता मुझे।

लाहौल विला कूवत......धिक्कार है तुम पर ! अब मेरी बात इतनी सही तो नहीं है क्योंकि मैं किसी शहीद की बेटी नहीं हूं ... मेरे घरवाले तो व्यापारी हैं।... मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं हूं ...मेरे पास मीडिया की ताकत भी नहीं है ... पैसे की ताकत भी नहीं है पर इतना जरुर पता है कि मेरी देशभक्ति किस से ज्यादा है और किससे कम इसका सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत मुझे बिल्कुल नहीं है । भई  जिनके समझ में आया उनको राम-राम और बाकी को हे राम !

What is Motherhood ?

एक पक्षी प्यासा तड़प रहा है जिसपर बिल्ली घात लगाए बैठी है। उस पक्षी को बचाने के लिए आप बिल्ली को ज़ोर से डाँटकर भगाते हैं और पक्षी को पानी पिलाते हैं यही है मातृत्व । दोस्तों मातृत्व का अर्थ केवल जन्म देने वाली मां और उसके और हमारे बीच का प्यार नहीं है बल्कि इसके व्यापक अर्थ हैं। हमने कई ऐसे चित्र देखे हैं जहां किसी परित्यक्त वृद्ध को कोई स्कूल का बच्चा या कॉलेज जाता 'कूल डूड' पानी पिलाता है या खाने की व्यवस्था करता है वह भी मां है। जरा उस वक्त में खुद को रख कर देखिए... कैसा प्यार और देखभाल की भावना रही होगी मन में जो बिना मदद किए वह मददगार रह नहीं पाया।

एक सैनिक जो बूढ़ी दादी को अपने कंधे पे उठा लेता है और उनका बक्सा भी रेलवे पुल से पार करा देता है हमें भी मातृत्व भाव से भर देता है। इस जज्बे को सलाम है । हमने कई ऐसे ही पशुओं के भी वीडियो देखें हैं जिसमें बंदर अंधे व्यक्ति की पानी पीने में मदद कर रहा है या शेर अपनी ही द्वारा शिकार की गई बंदरिया के  गर्भस्थ शिशु को दुलार करके बचा रहा है। क्या यह मातृत्व नहीं है... बिल्कुल है 👍

विश्व में बिना किसी संबंध के कार्यरत ऐसी सभी मातृत्व भावनाओं को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर आपकी सदैव रक्षा करें और आपको सदैव प्रसन्न रखें यही मेरी प्रार्थना है।

मेरा ननिहाल ३

पहले गर्मियों में छत में सोने जाते थे सब। नियम था , अपना बिस्तर खुद ले जाओ और सिर पे बैलेंस बनाकर ऊपर छत तक कछुआ छाप अगरबत्ती भी ले जाओ। बिना गिराए ले जाने वाले को ईनाम मिलेगा। काहे का ईनाम गद्दा तक न ले जा पाएँ वो बार बार फिसले हाथ से और सब दाँत निपोरें और इस चक्कर में अपना गद्दा भी गिरा दें। फिर वहीं सीढ़ी में बैठकर आँसू पोछके हँसें..😂😂😂

हम बारह पंद्रह ममेरे मौसेरे भाई बहन थे और सारे हँसोढ़। जितना गिरें उतना खुश हों 😀😀😀  इस प्रकार बड़ी मेहनत से ऊपर गद्दे लेजाएँ और छत में जाकर सामने का शांत  तालाब और घर के चारों ओर बने मंदिर देखें। हर मंदिर से जुड़ी बचपन की कोई न कोई मजाकिया बात मौसियां बताएँ और हम लोग और हँस हँस के लोटपोट हो जाएँ।

इसके बाद सब अपना अपना बुराई पुराण शुरु करें 😀😀😀 सब हाथ में चावल ले कथा सुने टाईप ध्यानमग्न हो ठुड्डी पे हाथ रख कथावाचक को घूरें और बीच बीच में जोश से बोलने लगें " जेई बात हमने भी बोली रही पर हमारी सुनता कौन है.." 😃😃😃 मतलब अब जो ये सही प्रूव्ह हुईं हैं तो इंदिराजी की गद्दी खतरे में पड़ गयी है बिल्कुल .. हा हा...

रात बढ़ते बढ़ते सब बच्चे आकाश में ध्रुव तारा, सप्तर्षि तारामंडल खोजें और जैसे ही नींद पड़े कि मच्छर भुन्नाएँ कान पर। तिसपर अक्सर इंद्रदेव प्रसन्न हो जाएँ और वो झमाझम बारिश शुरू कि सारे बिस्तर ऊठाके फिर भागें नीचे... हे भगवान् .. 😀😀😀

पंखा देखत रात गई ..आई ना लेकिन light
मच्छर गाते रहे कान में .. Party All Night..

सोकर कब उठते थे मत पूछिएगा... ग्यारह के बाद मुझे गिनती नहीं आती है...

😂😂😂

मेरा ननिहाल २

बचपन में नानीजी के यहाँ हम सब बच्चे बड़े कभीकभार छत में सोने जाते और जो तेज पानी बरस जाए रात को तो छत से भीगते हुए अपना अपना तकिया गद्दा लेकर एक दूसरे पर गिरते पड़ते नीचे उतरते थे 😃😃😃  जिसको जहाँ जगह मिली टेढ़ा मेढ़ा गद्दा डालकर वहीं सो जाए। अब रात दो बजे बेस्ट तकिया मेरी फाईट करने की हिम्मत तो किसी में नहीं होती थी ... इस दौरान घर के पुरूष सदस्य जो छत नहीं जाते थे हम लोगों को ऐसे विजयी भाव से मुस्कुराते हुए देखते थे जैसे बहुत तोप मारी हो उन्होंने आराम से नीचे सोकर 😂😂😂

तो जब रात को सब सोएँ तो पैर घड़ी की दिशा में होता था पर सुबह उठें तो बाजू वाले कजि़न के मुँह पर घड़ी की विपरीत दिशा में होता था। मेरे ये समझ नहीं आता है कि जब हम छोटे थे तो पृथ्वी इतनी तेजी से क्यों घूमती थी .. साईड ही चेंज हो जाती थी ... 😃😃😃

वो तो भगवान का शुक्र है कि पहले नींद खुल जाती थी तो बाजू वाले को पहलेई धकिया देते थे कि उल्टा क्यों सोते हो वर्ना ... 😂😂😂   अगला भी नींद में अपनी गलती मान लेता और फिर सो जाता अपना सपना पूरा करने...

 😂😂😂

मेरा ननिहाल १


लू और धूप से याद आया... जबलपुर मप्र में हमारी नानीजी का घर ऊँचाई पर पड़ता है। सामने बड़ा और खूबसूरत तालाब है हनुमानताल । घर के आजू बाजू आगे पीछे चारों तरफ हनुमानजी के मंदिर हैं। गर्मियों में सारी बेटियों, नातिन नातियों के आने के बाद कुछेक पचास लोगों का परिवार हो जाता था हमारा। स्वाभाविक है कभी कभी पानी की कमी की समस्या हो जाती थी।

अब सब बच्चों को उनकी उमर के मुताबिक बाल्टी पकड़ाकर नीचे सुभाष टॉकिज के कुएँ में पानी लेने भेजा जाता। हमारी बारह पंद्रह बच्चों की फौज पूरे रास्ते में फैल जाती 😃 .. कभी हम पूरे रास्ते पानी ढोएँ तो कभी बाल्टी आगे पास कर दें। छोटे भाई बहनों के हाथ में छोटी सी बाल्टियाँ बहुत स्वीट लगती थीं  .. .   उधर बैकग्राउंड में मन ही मन साथी हाथ बढ़ाना बजे। उसके बाद सारे हौद में अपनी मेहनत से जमा किए पानी में खूब मस्ती करें 😃😃 मेरे नानाजी और नानीजी दोनों कड़क स्वभाव के थे पर उस दिन हम बच्चे डांट से बच जाते थे 😀😀 ये पूरा काम सब इतने उत्साह से करते थे कि न लू लगती थी न पैर जलते थे.. 😊😊

नानीजी के घर में मेरी बड़ी मामीजी साक्षात् अन्नपूर्णा हैं..  उनके हाथ का खाना इतना स्वादिष्ट होता है कि चाहे वह खिचड़ी ही बना दें आप उंगली चाटते रह जाएंगे पकवानों की तो बात ही क्या है 👌👌👌 .. मेरी दूसरे नंबर की मामी जी मर्मज्ञ हैं .. मतलब ..आपकी परेशानियां , आपकी खुशियां , सब आप उनसे बांट सकते हैं.. बहुत प्यार से जीवन का सार बताती हैं ... 😊  उन्होंने घर में फ्री सिलाई क्लासेज बहुत सालों तक चलाईं। इनके बाद आईं हमारी छोटी मामीजी ..😊 .. उस समय हमारी उम्र 14 -15 साल थी यह नई मामी बिल्कुल नए जमाने की थीं... खूब हंसतीं- हंसाती और नए नए पकवान बनातीं... और हमको दीदी बोलतीं ☺  हमको बहुतै शरम आती अपने लिए दीदी सुनकर.. 😅😅

एक दिन दोपहर का खाना बनाते समय नाना जी आ गए कि तुरंत खाना खाना है और ऊपर से संज्ञा के हाथ की ही रोटी खानी है यह भी प्यारभरा  फरमान आ गया  ..  उन दिनों चौके में मिट्टी के चूल्हे होते थे । हम थोड़ा डर भी गए और खुश भी हो गए कि आज तो रोटी सेकने मिलेगी..  इतने में हमारे छोटे मामा जी भी आ गए और उन्होंने भी कह दिया कि हमें पापड खाना है और पापड़ संज्ञा सेंकेगी 😀😀😀  बस फिर क्या था मामीजी ने रोटियां बेलीं और चूल्हे का काम हमें पकड़ा दिया । बड़ी मुश्किल से हमने मामीजी के मार्गदर्शन में रोटियां और पापड़ सेके। हालाँकि वे थोड़े कच्चे - जले थे पर हमारे नाना जी अपने स्वभाव के विपरीत बहुत तारीफ करके पूरा खाना खाए 😇😇

यह तो जैसे हमारी लॉटरी ही निकल गई थी 😀 उसके बाद हमने सबको खूब होशियारी झाड़ी कि नाना जी को हमारे हाथ की रोटी और पापड़ अच्छे लगे . यहां तक कि दादाजी के घर में भी सब को चुप करा दिया यह कहकर कि नाना जी तक ने हमारे खाने की तारीफ की है 😃😃😃 बस फिर क्या था ... दौड़-दौड़ के रोटी परसो वाले काम से मुक्ति मिली और हमारे हाथ में किचन का चूल्हा आ गया...  मतलब...
..  प्रमोशन 😎😎😎
जल्दी ही हमने नरम रोटियाँ और बढ़िया पापड़ सेंकने शुरू कर दिए .. अपने नानाजी की बदौलत .. आपकी ट्रेनिंग में डाँट, प्यार और विश्वास तीनों था ... 😇😇

May U Rest in Peace in Heaven Nanaji  .. 🙏🙏🙏

मिस भार्गव

स्कूल के दिनों में सबसे ज्यादा इंपोर्टेंट होती है कक्षा के बाहर का नजारा दिखाती खिड़की 🤗 ... नहीं वहां देख नहीं सकते थे क्योंकि वहां पर तो मैम बैठती थी जिन्हें हम 'मिस' कहते थे । सबसे पहले मिस नाग का पीरियड होता था। रसायन शास्त्र से कक्षा प्रारंभ हो , जिसे अंग्रेजी में केमिस्ट्री बोलते हैं । शुरू के 1 हफ्ते तो कुछ समझ में नहीं आया... किताब पढ़े. उलट-पुलट की। लगा कि रसायन का भौतिक वाला पोर्शन मजेदार है... उसके बाद ऑर्गेनिक केमिस्ट्री बेंजीन के सुंदर-सुंदर चित्र के कारण अच्छी लगने लगी पर ... इनऑर्गेनिक 'तमस' सीरियल की पुकार के 'हाय रब्बा' जैसी भयानक लगती थी।

हे..हे... कुछ स्कूल की टीचर्स से मैं अब फेसबुक के माध्यम से जुड़ी हुई हैं... लिखूं कि नहीं लिखूं ....लिखी देती हूं ... सभी मुझे माफ करेंगे .. मैं जानती हूं ☺☺

मिस नाग के बाद हमारी फेवरेट टीचर मिस परवीन आती थीं । मिस परवीन हमको बायोलॉजी पढ़ाती थीं.. और क्योंकि .... हम उनको बहुत पसंद करते थे इसलिए पूरा जोर लगाते थे सभी बच्चों की तरह... कि हम पर विशेष ध्यान दिया जाए .. इसलिए बराबर पूछना... बताना ...मैम के काम में उनकी मदद करना हर चीज का पूरा ध्यान रखते थे 😀😀

इसके बाद शार्ट लंच होता था जिसमें हम लोग कुछ खास नहीं करते थे । तीसरे और चौथे पीरियड फिजिक्स के और इंग्लिश के होते थे। फिजिक्स की क्लास में बहुत मजा आता था .. न्यूटन के नियम पढ़ो ,लेंस पढ़ो ,नेत्र पढ़ो, चुंबक के प्रयोग करो, हमारा लैब बहुत अच्छा था.. हम लोग बहुत एंजॉय करते थे वहाँ.. पहले पढ़ते थे और फिर 6th और 7th पीरियड में लैब में सब सीखते थे 👍👍

आप सोच रहे होंगे इसमें क्या खास है ऐसा तो सभी स्कूल में होता है पर हमारे यहां खास कक्षा होती थी लंच के बाद 5th पीरियड...

यह कक्षा हिंदी विषय को समर्पित होती थी । खाने के बाद और 4 क्लास हैवी हैवी देखने के बाद किसी का मन ना हो हिंदी पढ़ने का ... पर हिंदी की मैडम वैसे ही होती है जैसे की हिंदी की मैडम होती हैं.... मिस भार्गव। टिपिकल हिंदी की मैडम एक गंभीर चेहरा ... आंखों पर चश्मा .... और एक पाठ की व्याख्या 1 से 2 महीने तक करना । अब आप सोचिए.. हिंदी में 50 में 48 ऐसे ही नहीं आते थे हमारे.. इसके लिए हमारी टीचर ने बहुत मेहनत की थी।

मिस भार्गव अक्सर पढ़ाते-पढ़ाते खिड़की के बाहर देखती थीं और हम इतने बदमाश थे कि मिस भार्गव के बिल्कुल अपोज़िट साइड में ... सबसे पीछे बैठते थे ...परंतु जब मिस भार्गव बाहर देखें... तो हम भी अपनी जगह से थोड़ा सा उठकर खिड़की से झांकने की कोशिश करते थे कि वे बाहर क्यों देख रही हैं... क्या देख रही हैं 😂😂😂😂 अरे ...क्यों नही देख सकते थे ... हमारी क्लास सेकंड फ्लोर में थी... थोड़ा बहुत तो ऐसे भी दिख ही जाता तो बाहर का 😃😃 उसके बाद जब मिस वापस हमारी तरफ देखें तो जल्दी से बैठ कर ऐसे भोलेपन से मुस्कुराते थे कि बाल कृष्ण भी हमसे हार जाते भोलेपन में 😀😀

मिस भार्गव की तरफ से कोई रिएक्शन कभी नहीं मिलता। ऐसा लगता जैसे हम लोगों का कोई अस्तित्व ही नहीं है... exist ही नहीं करते। ना नमस्ते का जवाब देती ... ना कभी हालचाल पूछती .. कुछ नहीं । तो हुआ यूँ कि हम शादी अटेंड करने रायपुर गये कुछ दिन को और लौट के आए तो हमारी सहेली ने आश्चर्यचकित बम फोड़ दिया यह कहकर की मिस भार्गव पूछ रही थीं कि संज्ञा कहां है... आ क्यों नहीं रही है ?  हम बड़ी- बड़ी गोल आंखों से अपनी सहेली को देखने लगे के मिस भार्गव हम को कैसे याद करने लगीं ???

टिफिन के बाद फिर क्लास की घंटी बजी और फिर 5th पीरियड शुरु हुआ । मिस भार्गव फिर वही गंभीर अंदाज़ लिए क्लास में आईं और पढ़ाने लगी हमारा फेवरेट पाठ ...आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निबंध 'क्रोध'। फिर वही उसी लाइन की व्याख्या शुरू हुई कि बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा होता है। मतलब क्रोध धीरे धीरे मन में बैर बनके बस जाता है जैसे कोई मुरब्बा समय के साथ और तैयार होता जाता है। हम शादी में जाने के पहले ही क्लास इसी लाइन पर छोड़कर गए थे ।बताइए पूरी शादी निपट गई ..आना-जाना निपट गया और क्रोध का फिजिकली..  यदि हो सकता होगा तो.... मुरब्बा बन गया.....  😂😂😂

शादी से लौटने के बाद हमने एक बात नोटिस की कि.. हिंदी की क्लास में सब बैग के पीछे मुंह छुपाकर या किताब के नीचे मुंह छिपाकर सोते थे। सिर्फ हम थे जो मिस भार्गव से पढ़ते थे ... उनका पढ़ाया समझते थे...  और उनको ..और उनकी खिड़की को देखते थे... वह भी .. प्यार से .. मुस्कुराकर  ...............।

😇😇😇😇😇

रेत के टीले पर III

वो मुसाफिर कोई और था
जो चला गया छोड़कर...
ये मुसाफिर कोई और है
जो खड़ा है साथ ईंट की दीवार से टिककर..
वो मुसाफिर कोई और होगा
जो आएगा इसके बाद
मेरे कश के धुँए के खत्म होते-होते
इस रेत के टीले पर....

* धुँए - प्राण
©पद्मबोध संज्ञा अग्रवाल