24.7.12

आप सभी को नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं




उफ्फ्फ !!! हिन्दू होना कितना कठिन काम है.... ये करो वो करो , ऐसे करो वैसे करो. हे भगवान् !! आज की ही बात ले लीजिये... नाग पंचमी का त्यौहार है. एक दंश से ही प्राण हरने वाले  "नागों" की पूजा की जाएगी ताकि उनसे हम सुख-शांति प्राप्त कर सकें ?!! जैसा इतना अत्याचारपूर्ण कृत्य कम था कि बिच्छूओं की रक्षा के लिए भी एक कथा बना दी. आपने भी पढ़ी ज़रूर होगी ... एक संत थे जो नदी में संकट में पड़े बिच्छू की रक्षा के लिए बार-बार उसका दंश सहते थे. अर्थात आप अच्छे हैं तो उनसे भी अच्छे से व्यवहार करेंगे जो आपका अहित करते हैं . यही है सच्चे संत की पहचान .. यही ना ? नहीं, यह सच नहीं है... सत्य तो यह है कि भला व्यवहार  करने वाले को दुनिया मुंह पर सीधा और पीठ पीछे मूर्ख कहती है.

तो फिर हमारे ज्ञानी संत क्यों हमें मूर्ख की श्रेणी में डालना चाहते हैं ? शायद इसलिए कि उन्हें कर्मफल सिद्धांत का पूर्ण ज्ञान है. जो बुरा करेगा वो बुरा पाएगा. यह तो सत्य है पर उस विष को सहने के समय प्राप्त हुए कष्ट को तो सहना ही पड़ता है न. यहाँ एक तथ्य यह है कि सर्प विष हमारी जान भी बचाता है . यदि समस्त सर्प जाति का उन्मूलन कर दिया गया तो मानव जाति का ही नुक्सान होगा. वहीँ यदि बिच्छू के दंश निकाल दिए जाएँ तो वह संकट के समय अपने शत्रु का सामना नहीं कर पाएगा और मारा जाएगा. अतः किसी बिच्छू की सहायता हुई तभी मानी जाएगी जब आप वह काम कष्ट सहकर याने बिना बिच्छू का डंक निकाले करें .. वही होगा सच्चा परोपकार .

हमारी संस्कृति में सबका बचाव किया गया है .. मक्खी और मच्छर को छोड़कर. बात तो सही लगती है कि अगर यह परम्परा है तो कोई महत्त्वपूर्ण कारण तो अवश्य होगा पर वास्तविक जीवन में इस शिक्षा की कसौटी पर खरे उतरना बहुत कठिन लगता है कि प्रकृति के हर रूप से एकसार हो जाओ. एक बार तो जी में आता ही है कि निकाल दो सारा विष .. फिर देखते हैं परन्तु फिर कोई कसौटी ही नहीं बचेगी जिसपर खुद को कसा जा सके. हम अपने मन में सर्प के सर को कुचलने को उद्यत विष को अपने अन्दर फैलने से नहीं रोक पाएंगे. आज की तारीख में तो मैं इस कसौटी में फेल हूँ ... कल का पता नहीं.

भारतीय संस्कृति में आस्था के तहत " नागदेवता " को प्रणाम करती हूँ. 
हम्म....... शांति मिली .
तो चलिए अपने-अपने (सर्प और मैं ) रस्ते ... और जो टकरा गए तो .................

प्रणाम !!

14.7.12

अंतर्मन कहता है ..



स्वामी विवेकानंद से शिकागो प्रवास के दौरान एक अंग्रेज ने कहा - " क्या भारतीय ठीक से कपडे नहीं पहन सकते? " स्वामी विवेकानंद ने शांत रहते हुए जवाब दिया - " हमारी संस्कृति में कपड़ों से ज्यादा चरित्र को महत्व दिया गया है. "

भारत एकमात्र देश है जहाँ मुनिजन निर्वस्त्र घूमते हैं और लोग उन्हें श्रद्धाभाव से देखते हैं. बड़े से बड़े राजा-महाराजा उनके पाँव पखारते हैं और अपने कष्टों के निवारण के लिए आशीर्वाद के साथ ही राय भी लेते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि संसार में किसी पर भरोसा किया जा सकता है तो इन निर्मोही तत्वज्ञानियों पर ही. बाकी तो सब छल है ... रेशमी छल. हर चेहरा ऊपर से लिपा-पुता मुस्कुराता दिखता है, उसकी एक परत खुंरच के देखिये, घाव ही घाव दिखेंगे. घबराहट होने लगेगी और तय नहीं करते बनेगा कि किसे ज्यादा दुखी कहें और किसे खुशकिस्मत कहें ?

जैसे-जैसे समाज सभ्य होते गए उनकी कलात्मकता निखरती गई और मनुष्य केश वस्त्र से तंतु वस्त्र की ओर उन्मुख होने लगा. कालांतर में रेशों के प्रति उसका ज्ञान बढ़ गया और उसे सजा कर पहनने की दिलचस्पी भी. मुद्रा व्यवस्था ने ताकत के आधार पर बँटे समाज को आर्थिक शक्ति से  भी बांटने का कार्य किया. धीरे-धीरे लोग भूल गए कि  वो दिल से मानव हैं भले ही तन पर कपड़े हों या नहीं , क्या फर्क पड़ता है .

आज यह हाल है कि मानवीयता अपनी गरिमा के लिए मानव मूल्यों पर नहीं कपड़ों पर निर्भर हो गई है. जिसने कपड़े पहने हैं वह इज्जतदार और जिसने नहीं पहने वह लूज़र है. हद्द है !! यह क्या बात हुई ?! आये दिन खबरें आ रही हैं .. प्रेमी ने प्रेमिका का एमएमएस बनाया, गाँव में सबके सामने महिला को निर्वस्त्र कर घुमाया, पब में जाकर स्त्रियों के बाल खींचे और कपड़े उतार कर विडियो यु-ट्यूब में डाल दी . करो .. और कर भी क्या सकते हो ... लूज़र !!! बात नहीं मानती है ... उड़ा दो इज्जत ... वाह क्या बात है ... ! लड़की हो या लड़का .. अपनी इज्जत के लिए वह कपड़ों का मोहताज नहीं है , कदापि नहीं. उतार दो कपड़े ... और उतरवा लो अपनी खुद की इज्जत क्योंकि इज्जत चरित्र से होती है कपड़ों से नहीं .

गुवाहाटी में सोमवार को हुई घटना की जिसप्रकार लड़कों ने भर्त्सना की है उसे देखकर लगता है कि आज के युवा असभ्य परम्पराओं और मान्यताओं को एक मिनट भी चुप होकर नहीं देख सकते. गुवाहाटी के दरिंदों में से एक को नौकरी से निकलवा दिया युवकों ने. पता नहीं ये लड़के रामभक्त हैं या कृष्ण भक्त, नानकभक्त हैं या यीशु भक्त या अल्लाह के बन्दे ... सब एक लग रहे थे ... सिर्फ अच्छे इंसान लग रहे थे. लिंग से परे, धर्म से परे , देश से परे सब एक आवाज में खड़े होकर पीड़ित लड़की के हक में बोल रहे थे. एक स्त्री के रूप में कह सकती हूँ " धन्यवाद आपका ! डरने की कोई बात नहीं है, सारी उंगलियाँ एक सी नहीं होती ."  अतः यह दुर्भावनापूर्ण कृत्य एक न एक दिन बंद होगा.

Link : Guwahati molestor shamed on facebook

5.7.12

श्रद्धांजलि : एक अनामिका को


कल बिलासपुर के बस स्टैंड में एक सूनी जगह से आ रही तेज दुर्गन्ध ने लोगों का ध्यान खींचा. उस दुर्गन्ध का पीछा करते हुए वे लोग उस जगह पहुंचे जहाँ से दुर्गन्ध आ रही थी. उन्हें वहां एक महिला की नग्न लाश आपत्तिजनक स्तिथि में मिली. महिला के गले में खरोंच के निशान थे. मृत देह के पास ही चप्पलें और शराब की बोतलें पड़ी थीं. पुलिस की तफ्तीश में पता चला की वह एक विक्षिप्त महिला थी जो भिक्षावृत्ति कर जीवनयापन करती थी. महिला की उम्र २५ वर्ष के आसपास थी. पुलिस इसे अनाचार के बाद हत्या का मामला मान रही है. 

अनाचार के बाद हत्या , मतलब महिला भले ही विक्षिप्त थी परन्तु नशेड़ियों से सम्बन्ध बनाने को  तैयार नहीं थी और विरोध कर रही थी. शायद उसके उग्र रूप को देखकर ही भारत के उन भले मर्दों ने यह निर्णय लिया होगा कि अब इस विक्षिप्त जीवन से उक्त महिला को सदा के लिए मुक्ति दे दी जाये. इस बात की एक रत्ती भी उम्मीद नहीं है कि उन भले मर्दों को उनके इस पुनीत कार्य के लिए खोजकर पुरुस्कृत किया जायेगा. बात पुलिस की नहीं है , बात मेरी भी है . क्यों बहाऊँ मैं आंसू ? मुझे क्या हक है ? आह्ह ! ये ढोंग है जो अब और नहीं होता....नहीं होता. माफ़ी मांगना भी ढोंग लग रहा है. मैं जानती नहीं थी क्या कि ऐसा हो सकता है. सब जानती थी. "भूल जाओ" मत कहियेगा. ऐसी घटनाएँ सबक होती हैं न कि भूल जाने के लिए होती हैं. तो आगे क्या ? यह प्रश्न मेरे सामने खड़ा है जिसका उत्तर जल्दी नहीं मिलेगा परन्तु मिलेगा ज़रूर. यह प्रश्न मेरे लिए आत्मिक है न की सांसारिक....!

एक अनाम ज़िन्दगी को मेरी श्रद्धांजलि !
प्यार और आदर , तुम्हारे इस जीवन के लिए !