31.12.12

नववर्ष मंगलमय हो ... सबके लिए !

कैसे आगे बढ़ जाएँ उसे लिए बिना ?

'दामिनी' ....

तुम ही दो हौसला ..!


जिंदगी रूकती नही .. खींच लेती है ..... अभी तो जैसे जबरदस्ती धकेल रही है .. चलो , चलो ! ठीक है , तो फिर चलो. 'दामिनी' न बने कोई ... फिर कोई 'दामिनी' न बने कोई .. चलो !






ना बाँट सके कोई हमको  सत्ता से ... धन से ... लोभ से .. छल से ..
हो अब चीत्कार का सत्कार ...
न हो उपद्रव उपद्रवी का ऐसा हो सज्जन का वार 
कि भारत भारतीयों का है .. न बाँट सके इसे जात-पांत की दिवार ..


ढोल बजे नगाड़े बजें कानों में जोर के 
कि आते हैं रखवाले दयनीय के
कि  मानव हो ... मानव का, पशु - पक्षी का, इस वसुंधरा का
कि  हों निर्भय सब 'निर्भया' जैसे ...
कि अब झूठे समाज का डर नहीं ..

आदि शक्ति और रूद्र मिल जाएँ अब ..
कि अब कृष्ण अवतार ले चुके हैं
कि कण-कण में राम सीना तान धनुष उठाए खड़े हैं
कि मिटेगी मिट्टी अब रूद्र के पाँव तले
कि अब नवनिर्माण होने को है
कि शान्ति के पहले की क्रांति अब होने को है

ऐसा है इस वर्ष का आग़ाज़ !




29.12.12

दामिनी को श्रद्धांजलि !


दामिनी

मुक्ति मिली उसे ..
जिसने औरों की मुक्ति की राह बना दी .

एक सार्थक जुझारू जीवन ....... !

टी.वी. पर गृहमंत्री श्री सुधील कुमार शिंदे जी अपील कर रहे थे कि देश की शांति-व्यवस्था भंग न की जाए. सरकार इस घटना से दुखी है और आश्वासन दिलाती है कि व्यवस्था को स्त्री सुरक्षा के लिए और मजबूत बनाया जाएगा.

'अनामिका' की अपील है कि देश में अराजकता के हालात पैदा करने वालों से पूछें कि क्या वो अपने स्तर पर जिम्मेदारी लेते हुए रात को गश्त लगायेंगे ? क्या वो पुलिस को अपने लाभ के लिए दुरूपयोग न करने की कसम खायेंगे ? क्या वो ऐसे लोगों का साथ छोड़ेंगे जो बेहद प्रभावशाली हैं परन्तु स्त्री विरोधी व्यवहार करने के दोषी पाए गए हैं ?

आपको अपने प्रश्नों का जवाब नहीं मिलेगा यह बात आप भी जानते हैं. फिर भी, समय की मांग है सोचकर 'हाय-हाय' के नारे लगा रहे हैं. खुद सोचिये , इससे क्या होगा ? अब समय आत्मचिंतन करने का है अपने अन्दर देखिये कि हम देश के क्या काम आ सकते हैं ? कहीं हमसे मन,वचन, कर्म से हिंसा तो नही हो रही है ? हम स्वयं गलत करें और दूसरों को बुरा-भला कहें ये उचित नही है. जिन सोनिया गाँधी को पूरा देश कोस रहा है उन्होंने ने भी एक आतंकी हमले में अपने पति को खोया है. वे स्वयं सबसे कड़ी सुरक्षा - व्यवस्था में रहते हुए भी डरती होंगी कि सेंध तो इसमें भी लगती है .. क्या होगा मेरे बच्चों का .. कहीं उनके साथ भी .. पिता के साथ हुआ हादसा न पेश आ जाए . वो भी डरती होंगी.

जाहिर है, सुरक्षित कोई भी नहीं है ऐसे माहौल में जहाँ डर, असुरक्षा, असहयोग , द्वेष, संदेह, हिंसा की भावना हो. कोई भी सुरक्षित नहीं है ऐसे माहौल में.

ऐसा बार-बार देखने सुनने में आ रहा है कि जो लोग ऐसी किसी हिंसा के अपराधी होते हैं वो किसी न किसी डर का सामना कर रहे होते हैं. भेदभावपूर्ण वातावरण , चुभती बातें खाद-पानी होती हैं मन में द्वेष और हिंसा भरने के लिए अतः अपनी सम्पूर्णता को देखना सीखें. हम ऐसे युग में हैं जब आध्यात्म घर बैठे उपलब्ध है आपको आश्रम नही जाना है कुछ सीखने के लिए. ये बात दीगर है कि जब आप खुद में सुधार देखते हैं तो स्वयं ही आश्रम जाना चाहते हैं या अपने घर को आश्रम जैसे तरीकों में ढालने की कोशिश करते हैं.

जुड़िये सबसे , सम्मान और प्रेमपूर्वक. कोई बात नही कि आपको किसी ख़ास जगह से जहाँ से आपको उम्मीद थी विशेष तौर पर वहां से प्यार न मिला. कोई बात नही . आप अपना व्यवहार न बिगड़ने दें. स्वयं को राष्ट्र को समर्पित करें और वह कार्य अपने स्तर पर करें जो राष्ट्रहित में हो और आपके बस में हो. बहुत शांति मिलेगी और आपका अनुगमन करने वाले लोग भी मिलेंगे जो एक बेहतर भविष्य का आश्वासन है.

बलात्कार या स्त्री विरोधी अन्य अपराधों के लिए कड़ी सजा के साथ-साथ सामाजिक विचारों में परिवर्तन लाना अपरिहार्य है. लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं ऐसे में, ये कहना कि वो अमुक व्यवहार न करें स्त्रियों के मध्य हास्य का विषय बन गया है. देखिये , पहले स्त्री इस बात पर क्रोधित होती थी आज हंसती है. कोई तरीका नही की आज की स्त्री को आप पाँच सौ साल पुराने तरीके से रख सकें अतः अपने को मात्र पुरुष की तरह न प्रस्तुत कर मनुष्य बनें. स्त्री को स्त्री न मान मनुष्य मानें. यह जानें कि अब वो न हो पाएगा जो आजतक होता आया है. साथ ही, स्त्रियाँ भी संयम से रहें जिससे अनावश्यक रूप से परेशानी का सामना न करना पड़े. यदि कोई स्त्री कहती है कि स्त्रियाँ संयम से रहें तो यह स्त्री के सुरक्षा के लिए दी गई नसीहत है न की पुरुष सत्ता के भय के कारण कहे गए शब्द  ठीक वैसे ही, जैसे पुरुष कह रहे हैं की उन्हें अपने पुरुष होने पर शर्म आ रही है और यह बात वे मातृसत्ता से भयभीत होकर नही कह रहे हैं .  इसे समझिये .

यह समय है सबसे उपयुक्त समय है आत्मचिंतन करने का . पार्टी, लिंग, स्थान, देश, समय से परे जाने का . 'खून के बदले खून ' का नियम समय की मांग बन गया है परन्तु यह अल्पकालीन उपाय साबित होगा . यदि वाकई में हम देश की दुर्दशा से व्यथित हैं तो आवश्यक है कि एक ऐसा दिया हम अपने अन्दर जलाएँ जो हमारे साथ-साथ सबके जीवन को प्रकाशित करे . यही होगी दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि .


दामिनी को श्रद्धांजलि !



19.12.12

गुनगुनी धूप और तितली

छोटी तितली 
पुष्प पर डोलती 
पंख हिलाती 

नर्म सी धुप 
उसकी मुस्कान को 
छूने तत्पर

इतराती है 
धूप को मार ताली 
उड़ जाती है 

हरी पत्तियां 
देख रही हैं रास्ता 
पत्र फैलाए 

छोटे से पाँव 
हल्का तुम्हारा भार  
हमें प्यारा 

प्यारी तितली 
उडती हंसती है 
गहरा हल्का ............

नाचती उड़े 
रौशनी में तैरती 
श्वेत तितली 


10.12.12

प्रयास

'प्रयास' - एक
जोर से पानी आया
ठहर गया

फिर 'प्रयास'
मटका ले घुमाया
भंवर गति

पुनः प्रवाह
पंक सम 'प्रयास'
तीव्र घूर्णन

उच्छालन - दो
पुनः प्रक्रिया त्रास
घूर्णन धीमा

शांत 'प्रयास'
'प्रयास - पंक' श्वास
शांत - उष्णता

नीरव चित्त
मंथर कलकल
विष्णु शयन




9.12.12

स्पर्श

पैरों में चुभते कंकड़ का स्पर्श
बालों से दौड़ लगाती पवन का स्पर्श
बिन जाने पहचाने चेहरों की मुस्कराहट का स्पर्श
ठंडी हवा से आँखों में आंसुओं का स्पर्श
सूनी सड़कों में कानों में खड़खडाती पत्तियों का स्पर्श
कितना मनमोहक है प्रकृति का प्रकृति से स्पर्श

स्व का मिलन
कंकड़ की चुभन
अश्रू मिलन

अंतरतम
ग्रहों का चक्कर
सूफी मलंग

प्रकृति प्रेम
अव्यक्त अगाध
पूर्ण अद्वैत 



7.12.12

डस्ट बिन


वो डस्ट बिन
आइना दिखाता था
छुपे सच का

पुराने पल
किंचित मखमल
लोरी हैं आज

सिकुड़ा ख़त
तनकर बेलाग
फिर न खुला

टूटे केश थे
मुड़े हुए सपने
सहमे बैठे

चार माह का 
ममता का आँचल 
बिन सांस का 

एक टिकट 
पिचकी फुटबॉल 
धूमिल अश्रू 

स्वच्छ आँगन 
हो जाए डस्ट बिन 
जले दीपम

5.12.12

पञ्च तत्त्वं

शीतल चन्द्र
प्रतिबिम्ब तरण 
अमृत जल 

गंदली मट्टी
नदिया से सागर 
घुलती जाती

सरसों लेप
हल्दी औ कुमकुम
चन्दन की सुगंध

आकाश गण
जीवन अवसर
चन्द्र कमल

जलता चूल्हा
गाय का अग्रासन
कुटुम्बकम


4.12.12

झरोखा


जलते देखा
गरीब का झोपड़ा
अमीर दिल

झरोखे देखो
मुस्कुराते  दुपट्टे 
कंचन मन 

बूँद बूँद में
मुस्कुराती खुशियाँ
भीगी प्रकृति 

अग्नि तांडव
नख -शिख होकर 
वाष्पित तन 

ठठाती हंसी
बुदबुदाती दुआएं
नूरानी आँखें