31.12.12

नववर्ष मंगलमय हो ... सबके लिए !

कैसे आगे बढ़ जाएँ उसे लिए बिना ?

'दामिनी' ....

तुम ही दो हौसला ..!


जिंदगी रूकती नही .. खींच लेती है ..... अभी तो जैसे जबरदस्ती धकेल रही है .. चलो , चलो ! ठीक है , तो फिर चलो. 'दामिनी' न बने कोई ... फिर कोई 'दामिनी' न बने कोई .. चलो !






ना बाँट सके कोई हमको  सत्ता से ... धन से ... लोभ से .. छल से ..
हो अब चीत्कार का सत्कार ...
न हो उपद्रव उपद्रवी का ऐसा हो सज्जन का वार 
कि भारत भारतीयों का है .. न बाँट सके इसे जात-पांत की दिवार ..


ढोल बजे नगाड़े बजें कानों में जोर के 
कि आते हैं रखवाले दयनीय के
कि  मानव हो ... मानव का, पशु - पक्षी का, इस वसुंधरा का
कि  हों निर्भय सब 'निर्भया' जैसे ...
कि अब झूठे समाज का डर नहीं ..

आदि शक्ति और रूद्र मिल जाएँ अब ..
कि अब कृष्ण अवतार ले चुके हैं
कि कण-कण में राम सीना तान धनुष उठाए खड़े हैं
कि मिटेगी मिट्टी अब रूद्र के पाँव तले
कि अब नवनिर्माण होने को है
कि शान्ति के पहले की क्रांति अब होने को है

ऐसा है इस वर्ष का आग़ाज़ !




29.12.12

दामिनी को श्रद्धांजलि !


दामिनी

मुक्ति मिली उसे ..
जिसने औरों की मुक्ति की राह बना दी .

एक सार्थक जुझारू जीवन ....... !

टी.वी. पर गृहमंत्री श्री सुधील कुमार शिंदे जी अपील कर रहे थे कि देश की शांति-व्यवस्था भंग न की जाए. सरकार इस घटना से दुखी है और आश्वासन दिलाती है कि व्यवस्था को स्त्री सुरक्षा के लिए और मजबूत बनाया जाएगा.

'अनामिका' की अपील है कि देश में अराजकता के हालात पैदा करने वालों से पूछें कि क्या वो अपने स्तर पर जिम्मेदारी लेते हुए रात को गश्त लगायेंगे ? क्या वो पुलिस को अपने लाभ के लिए दुरूपयोग न करने की कसम खायेंगे ? क्या वो ऐसे लोगों का साथ छोड़ेंगे जो बेहद प्रभावशाली हैं परन्तु स्त्री विरोधी व्यवहार करने के दोषी पाए गए हैं ?

आपको अपने प्रश्नों का जवाब नहीं मिलेगा यह बात आप भी जानते हैं. फिर भी, समय की मांग है सोचकर 'हाय-हाय' के नारे लगा रहे हैं. खुद सोचिये , इससे क्या होगा ? अब समय आत्मचिंतन करने का है अपने अन्दर देखिये कि हम देश के क्या काम आ सकते हैं ? कहीं हमसे मन,वचन, कर्म से हिंसा तो नही हो रही है ? हम स्वयं गलत करें और दूसरों को बुरा-भला कहें ये उचित नही है. जिन सोनिया गाँधी को पूरा देश कोस रहा है उन्होंने ने भी एक आतंकी हमले में अपने पति को खोया है. वे स्वयं सबसे कड़ी सुरक्षा - व्यवस्था में रहते हुए भी डरती होंगी कि सेंध तो इसमें भी लगती है .. क्या होगा मेरे बच्चों का .. कहीं उनके साथ भी .. पिता के साथ हुआ हादसा न पेश आ जाए . वो भी डरती होंगी.

जाहिर है, सुरक्षित कोई भी नहीं है ऐसे माहौल में जहाँ डर, असुरक्षा, असहयोग , द्वेष, संदेह, हिंसा की भावना हो. कोई भी सुरक्षित नहीं है ऐसे माहौल में.

ऐसा बार-बार देखने सुनने में आ रहा है कि जो लोग ऐसी किसी हिंसा के अपराधी होते हैं वो किसी न किसी डर का सामना कर रहे होते हैं. भेदभावपूर्ण वातावरण , चुभती बातें खाद-पानी होती हैं मन में द्वेष और हिंसा भरने के लिए अतः अपनी सम्पूर्णता को देखना सीखें. हम ऐसे युग में हैं जब आध्यात्म घर बैठे उपलब्ध है आपको आश्रम नही जाना है कुछ सीखने के लिए. ये बात दीगर है कि जब आप खुद में सुधार देखते हैं तो स्वयं ही आश्रम जाना चाहते हैं या अपने घर को आश्रम जैसे तरीकों में ढालने की कोशिश करते हैं.

जुड़िये सबसे , सम्मान और प्रेमपूर्वक. कोई बात नही कि आपको किसी ख़ास जगह से जहाँ से आपको उम्मीद थी विशेष तौर पर वहां से प्यार न मिला. कोई बात नही . आप अपना व्यवहार न बिगड़ने दें. स्वयं को राष्ट्र को समर्पित करें और वह कार्य अपने स्तर पर करें जो राष्ट्रहित में हो और आपके बस में हो. बहुत शांति मिलेगी और आपका अनुगमन करने वाले लोग भी मिलेंगे जो एक बेहतर भविष्य का आश्वासन है.

बलात्कार या स्त्री विरोधी अन्य अपराधों के लिए कड़ी सजा के साथ-साथ सामाजिक विचारों में परिवर्तन लाना अपरिहार्य है. लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं ऐसे में, ये कहना कि वो अमुक व्यवहार न करें स्त्रियों के मध्य हास्य का विषय बन गया है. देखिये , पहले स्त्री इस बात पर क्रोधित होती थी आज हंसती है. कोई तरीका नही की आज की स्त्री को आप पाँच सौ साल पुराने तरीके से रख सकें अतः अपने को मात्र पुरुष की तरह न प्रस्तुत कर मनुष्य बनें. स्त्री को स्त्री न मान मनुष्य मानें. यह जानें कि अब वो न हो पाएगा जो आजतक होता आया है. साथ ही, स्त्रियाँ भी संयम से रहें जिससे अनावश्यक रूप से परेशानी का सामना न करना पड़े. यदि कोई स्त्री कहती है कि स्त्रियाँ संयम से रहें तो यह स्त्री के सुरक्षा के लिए दी गई नसीहत है न की पुरुष सत्ता के भय के कारण कहे गए शब्द  ठीक वैसे ही, जैसे पुरुष कह रहे हैं की उन्हें अपने पुरुष होने पर शर्म आ रही है और यह बात वे मातृसत्ता से भयभीत होकर नही कह रहे हैं .  इसे समझिये .

यह समय है सबसे उपयुक्त समय है आत्मचिंतन करने का . पार्टी, लिंग, स्थान, देश, समय से परे जाने का . 'खून के बदले खून ' का नियम समय की मांग बन गया है परन्तु यह अल्पकालीन उपाय साबित होगा . यदि वाकई में हम देश की दुर्दशा से व्यथित हैं तो आवश्यक है कि एक ऐसा दिया हम अपने अन्दर जलाएँ जो हमारे साथ-साथ सबके जीवन को प्रकाशित करे . यही होगी दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि .


दामिनी को श्रद्धांजलि !



19.12.12

गुनगुनी धूप और तितली

छोटी तितली 
पुष्प पर डोलती 
पंख हिलाती 

नर्म सी धुप 
उसकी मुस्कान को 
छूने तत्पर

इतराती है 
धूप को मार ताली 
उड़ जाती है 

हरी पत्तियां 
देख रही हैं रास्ता 
पत्र फैलाए 

छोटे से पाँव 
हल्का तुम्हारा भार  
हमें प्यारा 

प्यारी तितली 
उडती हंसती है 
गहरा हल्का ............

नाचती उड़े 
रौशनी में तैरती 
श्वेत तितली 


10.12.12

प्रयास

'प्रयास' - एक
जोर से पानी आया
ठहर गया

फिर 'प्रयास'
मटका ले घुमाया
भंवर गति

पुनः प्रवाह
पंक सम 'प्रयास'
तीव्र घूर्णन

उच्छालन - दो
पुनः प्रक्रिया त्रास
घूर्णन धीमा

शांत 'प्रयास'
'प्रयास - पंक' श्वास
शांत - उष्णता

नीरव चित्त
मंथर कलकल
विष्णु शयन




9.12.12

स्पर्श

पैरों में चुभते कंकड़ का स्पर्श
बालों से दौड़ लगाती पवन का स्पर्श
बिन जाने पहचाने चेहरों की मुस्कराहट का स्पर्श
ठंडी हवा से आँखों में आंसुओं का स्पर्श
सूनी सड़कों में कानों में खड़खडाती पत्तियों का स्पर्श
कितना मनमोहक है प्रकृति का प्रकृति से स्पर्श

स्व का मिलन
कंकड़ की चुभन
अश्रू मिलन

अंतरतम
ग्रहों का चक्कर
सूफी मलंग

प्रकृति प्रेम
अव्यक्त अगाध
पूर्ण अद्वैत 



7.12.12

डस्ट बिन


वो डस्ट बिन
आइना दिखाता था
छुपे सच का

पुराने पल
किंचित मखमल
लोरी हैं आज

सिकुड़ा ख़त
तनकर बेलाग
फिर न खुला

टूटे केश थे
मुड़े हुए सपने
सहमे बैठे

चार माह का 
ममता का आँचल 
बिन सांस का 

एक टिकट 
पिचकी फुटबॉल 
धूमिल अश्रू 

स्वच्छ आँगन 
हो जाए डस्ट बिन 
जले दीपम

5.12.12

पञ्च तत्त्वं

शीतल चन्द्र
प्रतिबिम्ब तरण 
अमृत जल 

गंदली मट्टी
नदिया से सागर 
घुलती जाती

सरसों लेप
हल्दी औ कुमकुम
चन्दन की सुगंध

आकाश गण
जीवन अवसर
चन्द्र कमल

जलता चूल्हा
गाय का अग्रासन
कुटुम्बकम


4.12.12

झरोखा


जलते देखा
गरीब का झोपड़ा
अमीर दिल

झरोखे देखो
मुस्कुराते  दुपट्टे 
कंचन मन 

बूँद बूँद में
मुस्कुराती खुशियाँ
भीगी प्रकृति 

अग्नि तांडव
नख -शिख होकर 
वाष्पित तन 

ठठाती हंसी
बुदबुदाती दुआएं
नूरानी आँखें




22.11.12

जीवन की जीत और 'एक मौत' की हार

सोच रही थी कि  कसाब के बारे में कुछ न लिखूंगी ... बोर हो गए हैं - टी वी , नेट और मोबाईल हर जगह कसाब - कसाब से . पर आज कसाब की चाचीजी ने उकसा ही दिया कुछ बोलने को . 

टी वी पर खबर सुनते ही चीख निकल गई " कसाब को फांसी हो गई ..." , बताइए , पता ही नही चला। मुझे कुछ ख़ास अच्छा नही लगा कसाब का मरना . पता नही क्यों ... मुझे यह भी हिंसा ही लगी शायद इसलिए। ऐसा विचार कसाब के मृत दोस्तों के लिए नही आया क्योंकि उन्हें कमाण्डो और पुलिस ने हमले के वक्त ही मार दिया था। तो कसाब के मरने का क्या ग़म ... शायद इतने दिन तक उसके बारे में पढ़ कर, उसके परिवार, उसकी बेरोजगारी के बारे में पढ़कर उससे सहानुभूति हो गई थी मुझे। 

विश्व के 127 देशों ने अपने देश में फाँसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। भारत में भी फाँसी की सजा ' दुर्लभतम में दुर्लभ सिद्धांत ' के आधार पर दी जाती है। स्वतंत्र भारत में अभी तक 54 लोगों को फाँसी की सजा दी गई है और लगभग 100 मामले ऐसे हैं जिनमे फाँसी  की सजा दी जाए की नही पर विचार हो रहा है। कसाब के मरते ही टी वी में उन लोगों का साक्षात्कार आने लगा जो 26/11 के हमले में हताहत हुए थे। वो दृश्य ... हमला . . . पुलिस अधिकारीयों की शहादत की ख़बरें ..... हल्ला .... धुंआ .... उफ्फ्फ ... ! क्या समझ कर ये आतंक फैला रहे थे भारत में ... कि मजा आएगा .... और क्या प्राप्त किया जा सकता है इस नृशंसता से ? चाचीजी , बताइए ज़रा .. क्या भला हुआ पाकिस्तान का इस हमले से ? क्या भला हुआ कसाब का इस हमले से ? आपने अपने भतीजे के अंतिम क्षणों में उसका साथ दिया अच्छी बात है परन्तु उसे ये दिन ना देखने पड़ते यदि आपने उसे भला-बुरा सिखाया होता। 'मौत' बना दिया उसे .. और जब वो मर गया अपनी करनी से ... तो हमें दुश्मन बना दिया। 

वहीँ पकिस्तान में एक आशा की किरण चमकी है मलाला युसुफजई के नाम से . कितनी प्यारी बच्ची है . उसे देखकर लगता ही नही कि  जिस तालिबान से आपके देश के बड़े-बड़े नेता काँप जाते हैं वह बच्ची नही डरती . कहती है " मैं पढना चाहती हूँ , भले ही मुझे पढने के लिए टेबले-कुर्सी न मिले, जमीन पर बैठना पड़े पर मैं पढूंगी ". ये हुई न बात जिसपर गर्व किया जाए। मलाला युसुफजई ने पाकिस्तान की इज्जत रख ली . उसे देखकर कह सकते हैं की बिरले ही हिरण्यकशिपु के यहाँ प्रहलाद जन्म लेते हैं। बिलकुल प्रहलाद जैसा हाल है मलाला का। अच्छी बातें करनी की सजा दी गई उसे और उसकी सहेलियों को। फिर भी , मलाला अडिग है अपने निर्णय पर और आगे की परीक्षा की तैयारी अस्पताल में ही कर रही है। 




पूरे आतंकवादी संगठन और पाकिस्तान सरकार जो नही कर सकती वो इस किशोरी ने किया है " पाक का मान बढ़ाया है पूरे विश्व में ". संयुक्त राष्ट्र ने 10 दीसंबर को 'मलाला दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की है। शायद कसाब ने मृत्यु पूर्व पढ़ा हो इस किशोरी के बारे में , सिर्फ यही एहसास दिला सकती थी कसाब को कि उसने रुपये और भावनाओं के बहकावे में आकर गलत निर्णय लिया और अपने जीवन को नष्ट करने का कारण वह स्वयं था। वहीँ मलाला सकारात्मक है , वह किरण है जो अन्धकार दूर कर प्रकाश की पुनर्स्थापना करने की क्षमता रखती है। मलाला का सर पर गोली लगने के बाद भी जीवित बचना 'एक जीवन' की जीत है और कसाब की फाँसी 'एक मौत' की हार है। 

ईश्वर मलाला को दीर्घ आयु दें और पकिस्तान को इस ताज़ा फुहार से तरबतर कर दें। 

आमीन ! 

कसाब ! कुछ तो ऐसे अच्छे कर्म रहे होंगे तुम्हारे कि  भारत भूमि में समा गए। 
अलविदा !   


12.11.12

शुभ दीपावली



आपकी दिवाली सुरक्षित हो और माता लक्ष्मी सदैव आप पर अपनी कृपा दृष्टि रखें. इन शुभ कामनाओं के साथ ....शुभ हो आपकी दीपावली ।

7.11.12

अहोई अष्टमी- लड़कों की ही आयु के लिए क्यों , लड़कियों की लम्बी आयु के लिए क्यों नही ?

नारी प्रकृति प्रदत्त कोमलमना होती है. एक सुन्दर सम्मिश्रण कोमलता और शक्ति का. जहाँ कोमल मन अपनों की सुरक्षा चाहता है वहीँ अदम्य साहस संकल्प लेकर कष्ट सहते हुए भी अपनों की रक्षा करता है. दीपावली के एक सप्ताह पूर्व स्त्री के इसी पूर्ण रूप का एक और पर्व आता है जिसे 'अहोई अष्टमी' कहते हैं. यह अहोई माँ को समर्पित एक व्रत है जिसे माताएं अपनी संतान की सुरक्षा की कामना हेतु करती हैं. ऐसा ही एक और व्रत 'सं
तान सातें' भी भारत में किया जाता है.

अहोई अष्टमी या होई आठे का व्रत विशेषकर पुत्रों की लम्बी आयु के लिए किया जाता है. प्रश्न उठता है की लड़कों की ही आयु के लिए क्यों , लड़कियों की लम्बी आयु के लिए क्यों नही ?

यह बात वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है की लड़कियां लड़कों की तुलना में ज्यादा मजबूत होती हैं शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूपों में. प्रकृति ने गर्भधारण करने की शक्ति नारी को ही दी है क्योंकि नारी दुःख, भूख और गर्भस्थ शिशु की संभाल कर सकने में पुरुषों से अपेक्षाकृत ज्यादा सक्षम है. जन्म के पश्चात देखा गया है की लड़कियां जीवन बचा जाती हैं परन्तु लड़के बिमारी या समयपूर्व जन्म में जीवित नही बच पाते हैं. सामाजिक रचना ऐसी है की स्त्री घर की देखभाल बच्चों की देखभाल करती है और पुरुष सदस्य धनार्जन करते हैं. यदि घर में पुरुष न हों तो स्त्रियों को ही कष्टों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में आवश्यक है की पुरुषों की विशेष देखभाल की जाये. और यह कौन करेगा.. निश्चित रूप से , जो स्वस्थ और कोमल मन होगा वह ही करेगा.

स्त्रियों का व्रत करना और व्रत पुरुषों ( भाई, पुत्र एवं पति ) के लिए करना स्त्री की शक्ति का प्रमाण है. व्रत की देवी भी माँ ही हैं. 'शक्ति' संसार की जननी हैं, "माँ" हैं. वे शक्ति होकर भी कोमलमना हैं, 'अन्नपूर्णा' हैं. यह कोई नियम नहीं है की स्त्रियाँ ही व्रत करें पुरुष नहीं और स्त्रियाँ अपने पुत्रों के लिए ही व्रत करें पुत्रियों के लिए नही. समस्त सृष्टि एक है. यहाँ कोई भेद नही. व्रत मात्र अपने रिश्तेदारों के लिए ही करें ऐसा भी आवश्यक नही है. सबके लिए व्रत करें, सबका उद्धार हो. अहोई माँ सबका भला करें और अपनी शीतलता से सभी संतानों ( समस्त चराचर जगत ) को सिक्त करें.






9.10.12

क्या लड़कियां खुद हैं बलात्कार की जिम्मेदार ?

लड़कियों की ज़िन्दगी किसी का मन भरने और असम्मानपूर्ण आज्ञा मान अपना परलोक सुधारने के लिए नही होती है. ज़िन्दगी प्रकृति प्रदत्त है और सबको अधिकार है अपनी पसंद की जिंदगी जीने का. हरियाणा खाप पंचायत चाहती हैं कि राज्य में बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं (एक महीने में 28 बलात्कार) को रोकने के लिए विवाह की उम्र घटा दी जाए. जैसे इंसान का जीवन मात्र विवाह सुख लेने के लिए हुआ है. देश में सबसे कम लिंगा
नुपात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ( 866) और हरियाणा (877) में है. क्या इस कारण बलात्कार की घटनाएँ बढ़ी हैं. नहीं. जहाँ स्त्रियों का सम्मान नही होगा वहां ऐसी ही घटनाएँ होंगी. बलात्कारी की मानसिकता अलग होती है और जब वह पकड़ा जाता है तो खुद को बचाने के लिए दोष लड़की के कपड़े, उसके चालचलन और निजी झगडे का बहाना बनाता है. बलात्कार की घटनाएँ पैदा हुई बच्ची से लेकर वयोवृद्ध महिलाओं के साथ तक होती है. ऐसे में आवश्यकता है कि देश के पिछड़े हुए राज्यों में लड़कियों को प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षा प्रदान की जाए और पुलिस को भी इसकी विशेष ट्रेनिंग दी जाए. साथ ही, कानून का उल्लंघन करने पर तुरंत दोषी पुलिस अधिकारी को बर्खास्त किया जाए ताकि थानों में होने वाली शर्मनाक घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके.

हरिजन की बेटी मेरी बेटी है


22.9.12

ममत्व से ओतप्रोत एक अबला पिता


कल ( 21 सितम्बर 2012) प्रधानमंत्री ने देश को हिंदी और अंग्रेजी में सन्देश दिया। सबको उम्मीद थी (क्यों थी ? पहले भी तो कांग्रेस अपने तेवर दिखा चुकी है) कि प्रधानमंत्री बढे हुए दामों से कुछ राहत देंगे और अपनी बात भी बना लेंगे मतलब जनता का विशवास जीत लेंगे कि उन्होंने जो किया वो ठीक किया।  इतना होनहार अर्थशास्त्री , याद करिए .. कैसे 2002 के चुनावों में भारतीय जनता टीवी में जोशोखरोश से कह रहे थे .." हम मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनते देखना  हैं (सोनिया गाँधी को नही)" क्योंकि 1991 में मनमोहन सिंह ने देश बचाया था (?)।  याद करिए .. 1991 में देश का सोना बेचा गया था और जो सुधर किये गए थे वो अवश्यम्भावी थे नाकि पूर्वनियोजित रणनीति का हिस्सा थे। लाइसेंस कानून सुधारे गए थे ... तो ऐसे कड़े कानून बनाए किसने थे जिनसे मदद मिलना तो दूर उल्टा भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता था ? आज भी जनता 200 साल पुराने कानूनों के नाम पर रोती है।

कल अच्छा लगा बंदी को ईज्जत पाकर .. आखिर हमारे दुनिया में माने हुए मनमोहन सिंह हमसे सीधे कुछ कहने वाले थे ... सो सब काम छोड़कर मूर्खों की तरह ( होशियार पहले खुद को रखता है बाद में किसी और को ) बैठ गए टी वी देखने. भाषण शुरू हुआ ... और जी खुस्स हुआ .. (येह्ह .. ममता दीदी ने इतना तो किया .. जाते-जाते हमारी ईज्जत बढ़ा गईं :P ) पर थोड़ी ही देर के लिए. ज्यों-ज्यों भाषण बढ़ता गया लगा बात तो ठीक है ..  पर मनन करने पर कुछ यूँ लगा जैसे हमलोग बच्चे हैं जो रात को मम्मी से डांट खा रहे थे और मन ही मन जो फीलिंग उस वक़्त आती है और जो भावार्थ एक -एक वाक्य के पीछे  होता है , उसका बयान कुछ इस तरह है - 

"लोग गुमराह कर रहे हैं आपको , यही काम है उनका " 
( 'तुमने' *मुझपर* उंगली उठाई ? मैंने इतना किया तुम्हारे लिए , तुम्हें दिखता नही क्या ? लोकतंत्र जाए तेल लेने। तुम सिर्फ मेरी सुनो)
" पैसे पेड़ पर नही उगते हैं "
(= नो जेबखर्च, सब्सिडी बंद, वाह ! क्या डायलोग मारा है मैंने. अब होगी इसकी बोलती बंद :D)

"तुम्हें दूध पीने मिलता है तो इतराते हो"
(= पाक, नेपाल,बर्मा को देखो, उनके माँ-बाप से हम कितने अच्छे हैं :D )

"मुझे तुम्हारी सूझबूझ पर भरोसा है"
(= मेरी बात मानो और अपने दिमाग का इस्तेमाल मत करो, वर्ना बुद्धू कहूँगी :D आखिर दुनिया ने मेरा लोहा माना है )

"हम हमेशा तुम्हारा भला चाहते हैं"
(= जो  कहा जा रहा है उसे मानो )


"हमने तब ... सही निर्णय लिया था , देखा !
(= हम गलत हो ही नही सकते और तुम हमारे अनुभव की बराबरी कर नही सकते :P)


"शर्माजी के बेटे को देखो , उससे सीखो कुछ "
(= तुम पर भरोसा ?? कभी नही , ऍफ़ डी आई ही है सब )

और अंत में अनकही घुड़कियाँ -

=> रात हो गई है. 

      (उम्मीद की कोई किरण नहीं है )

=> जबान मत लड़ाओ।
     (तुम्हारी क्या औकात कि हमें सही-गलत बताओ )
=> सो जाओ !
     (दिमाग लगाना बंद कर मीठे-मीठे सपने बस देखो , उसे पूरा करने की बातें कर मेरा दिमाग ना खाओ। मैं एक मजबूर अबला हूँ। तुम्हें क्या ? तुम तो आ जाओगे सुबह खाली कटोरा लेकर .. उसे भरने की जद्दोजहद तो मुझे करनी है न. ये सब उतना आसन नही बेटा जितना दिखता है।) 
=>सो जाओ ..वर्ना .... पापा को बता दूंगी/दूंगा और वो तुम्हारी सारी हेकड़ी निकाल देंगे. 
    (राष्ट्रपति धारा 356 लगा देंगे )

एक सामान्य परिवार की तरह सपनो और सच्चाई के बीच झूलता सरकार और जनता का रिश्ता . रोज वही झगडा - रोज वही मनाना। 

इस झगडे का अंत हो सकता है यदि -

- सरकारें जनता की सुनें।
- सरकारें जनता पर विश्वास करे।
- नई पीढ़ी को भावी परिस्तिथियों के लिए तैयार करें।
- जनता का पैसा विदेशों से भारत वापस लाये।
- नए-नियम कानून बनाये जाएँ।
- भ्रष्टाचारियों से पैसे जल्दी वसूले जाएँ और कड़ाई भ्रष्टाचारियों पर की जाए ना की गरीब जनता पर। 
- पंचवर्षीय योजनाओं की जगह वार्षिक योजनायें बनाई जाएँ। 
- भारत में योजनाओं पर नये सिरे से विचार हो।
- ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- समस्या को चुनौती मानकर देश के लोगों पर भरोसा कर उद्यम, तकनीकी , कृषि, वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोत,पर निवेश नागरिकों को उपलब्ध कराया जाए। 
- नई पीढ़ी को अक्षर ज्ञान से ज्यादा रोजगार परक पढ़ाई कराई जाए और जातीय भेदभाव ख़त्म करने कड़े कदम उठाये जाएँ। 
- अब वैकल्पिक ऊर्जा क्रांति की जाए ताकि हमें किसी पर निर्भर न रहना पड़े। 
- और, साथ ही सरकारी खर्चों में भी कटौती की जाये। 

सरकारें ध्यान रखें, हमने कम्पूटर तकनीक, मिसाईल तकनीक, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, देश की रक्षा अपने दम पर की है नाकि विदेशी मदद से। अगली बार जब प्रधानमन्त्री देश को संबोधित करें तो एक नेता की तरह करें नाकि अबला मदर इंडिया की तरह जो अपने ही बच्चे की जान ले लेती है। खुद ही सोचिये , ऐसा करके क्या फायदा जबकि हम सिर उठाकर आगे बढ़ सकते हैं। भारत में सम्भावनयें हैं आगे बढ़ने की। भारत को आगे ले जाने के लिए राजनेता दृढ इच्छाशक्ति दिखाएँ और मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे बुद्धिजीवियों को विदा करें क्योंकि इन्हें यही नही समझ आ रहा है कि नीतियाँ देश के लिए बनाई जाती हैं। यह मात्र आंकड़ों का खेल नही है वरन इन नीतियों से ही गरीब जनता को लाभ मिलता है। अगर आप निचले तबके के बारे में ना सोचकर केवल उपरी तबके की बढ़ोतरी के बारे में सोचेंगे तो वही हालात आयेंगे जो आज हैं। इसके लिए सब्सिडी नही भ्रष्ट नेता-अफसर गठजोड़ और बासी नीतियाँ जम्मेदार हैं। देश को सादगी से भरे साहसी जननायक की आवश्यकता है नाकि किसी ऐसी कठपुतली की जो केवल विदेशों में नाचती है और देश में आकर मौनी बाबा हो जाती है। 


नूर नीरव 
©

19.9.12

गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई !





ऐसा क्यों होता है कि हम अपने देवी-देवता की स्थापना करते हैं , उनकी पूजा करते हैं और फिर ......... उनका  विसर्जन कर देते हैं ?
यह प्रश्न कल ही मेरे मन में आया और आज इसका उत्तर या कहें इस सन्दर्भ में एक दृष्टिकोण मुझे अपने मित्र से मिला।
मेरे मित्र का कहना है कि जैसे हम निराकार से साकार रूप लेते हैं , अपने जीवन की व्यवस्था करते हैं और अंत में संसार सागर में पुनः निराकार रूप में समा जाते हैं वैसे ही हमारे प्यारे गजाननजी भी मिटटी से गढ़ साकार रूप लेते हैं और पूरे पूजन-भोग इत्यादि के उपरान्त हमसे विदा ले लेते हैं यह बताते हुए कि हम अनंत से निर्मित हैं और अनंत में ही निराकार रूप में  समाहित हो जायेंगे. हम फिर आयेंगे साकार रूप में और फिर निराकार में मिल जायेंगे। अतः हमें अपने निराकार रूप को पहचानना चाहिये और साकार रूप को 'रिद्धि-सिद्धि' से पूर्ण कर ज्ञानपूर्वक जीवन जीना चाहिए। 

हे मंगलमूर्ति गणाधिपति देव !
आप ज्ञान के देवता हैं और धन के भी। अर्थात आपके साकार रूप द्वारा दिए गए ज्ञान को अपनाकर हमें माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी दोनों का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है। हे देव ! आपको अनेक रूपों में जाना है। आज आप मेरे लिए नश्वरता का ज्ञान लेकर आये। धन्यवाद !

आप सभी को श्री गणेश चतुर्थी की मंगल कामनाएं ! श्री गणेश की कृपा सब पर सदैव बनी रहे।

ॐ गं गणपतये नमः


वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरुमेदेव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

18.8.12

नूर नीरव - इन्द्रियातीत अस्तित्व


मेरी पहली सब्सक्राईबर नूर लाहोर थीं ... उनके बाद परसों तक कोई और मुस्लिम सब्स्क्राइबर नहीं था. कल से अचानक ही मुस्लिम सब्स्क्राइबर की संख्या बढ़ गई है. क्या वो मुझे मुस्लिम समझ रहे हैं या माइल्ड हिन्दू ? 

 पता नहीं , खैर.... मैं संज्ञा अग्रवाल हूँ . मुझे मुस्लिम नाम बहुत अच्छे लगते हैं परन्तु चाह कर भी मैं अपना नाम मुस्लिम नहीं रख पा रही थी क्योंकि ऐसी हिमाक़त घर में पहले किसी ने नहीं की थी कि माता-पिता का दिया नाम ही बदल दें. 

 मैंने वेद, पुराण, रामायण , गीता आदि का गहन अध्ययन नहीं किया है. जो कि हिन्दू होने के नाते मुझे करना चाहिए था. तो फिर मैं हिन्दू क्यों हूँ ? क्योंकि मेरे माता-पिता , दादा-दादी आदि हिन्दू हैं. उन्होंने भी  वेद - पुराण नहीं पढ़े हैं . फिर वो हिन्दू क्यों हैं ? मुझे बचपन से ही गौतम बुद्ध अच्छे लगते हैं. मैं बौद्ध होना चाहती थी पर ऐसा करने के पहले ही मुझे हिन्दू धर्म अच्छा लगने लगा और मैं धर्म से हिन्दू ही रह गई. या कहें कि अब ख़ुशी-ख़ुशी हिन्दू हूँ नाकि आरोपित तौर पर . 

परन्तु नाम 'नूर' रख लिया तो क्या हो गया  ? 'नूर' का मतलब होता है 'प्रकाश' , मेरे लिए नूर का मतलब है ईश्वर का प्रकाश. कई और भी विकल्प थे जैसे- फिजा, गुल, नूरी, परवीन, शमा, ग़ज़ल ... कितने अच्छे शब्द हैं ना .... परन्तु नूर जितना नूर किसी और शब्द में ना था. इसलिए मैंने नूर ही चुना. 

फेसबुक ने मुझसे सरनेम पूछा तो मैंने 'नीरव' लिख दिया. एकदम शांत ...गहरा.... शांत ... ऐसा ही लगा था जब पहली बार सद्गुरु से मिली थी. सो , नीरव मेरा चित्त हुआ. 

नाम सिर्फ टैग है... जिससे हमें पहचाना जाता है . धर्म वो है जिसकी अपनी मान्यता होती है, किताबें होती हैं , नियम होते हैं आदि. पहले मैं वो हूँ जो मैं हूँ ..  " नीरव " ... फिर हिन्दू हूँ , फिर भारतीय हूँ , फिर अग्रवाल हूँ ,फिर संज्ञा हूँ और अब " नूर " हूँ.

"नूर"  सिर्फ टैग है . मेरे पसंद का टैग. इसमें कौन सी बड़ी बात है कि आप अपनी पसंद का नाम रख लेते हैं प्रचलित नाम छोड़कर ... बिलकुल साधारण बात है. परन्तु मैं ना समझती इतनी से बात जो सद्गुरु ने मुझे शरीर और मन से अन्य  "नीरव" से ना मिलवाया होता. कहाँ है ये नीरव ... कितना बड़ा है , कैसा दिखता है.... नहीं पता ... पर है जरूर !  जो आप भी मिलना चाहते हों अपने नीरव से तो सद्गुरु की शरण में जाएँ... मन , बुद्धि , अहंकार में निहित या परे .. पता नहीं ...परन्तु आपको अपना अनंत प्राण 'नीरव' मिलेगा ज़रूर, ये वादा है. 

प्रणाम सद्गुरु !  


3.8.12

Dear Anna



हमारे देश की परम्परा के अनुसार मुझे आपको प्यारे अन्ना नहीं आदरणीय अन्नाजी कहना चाहिए.डिअर अन्नाजी, हमें आपकी पीढ़ी ने क्या दिया ? आप कहेंगे हमने देश को आजादी दी पर कैसी  आजादी , कैसा अधिकार ?लुटने का अधिकार ..... शिकायत करने का अधिकार ... आन्दोलन करने का अधिकार ... यही ना ! काश इसकी जगह दिया होता शिक्षा का अधिकार, सम्मानित जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, ऊंचे से ऊंचा उड़ने का अधिकार .  क्यों बने हैं हम एक असंतुष्ट कौम ? .. ताकि बड़े लोगों के 'अनुभवी बच्चों' की जय-जयकार कर सकें ? नीचे रहें ताकि वो ऊपर रह सकें ? भीड़ अनेक से बनी पर एक है .. क्योंकि उसकी समझ और दुःख एक है. आप जानते हैं यह मर्म इसलिए आप महामहिम किसन बाबूराव हजारेजी नहीं .. अन्ना हैं. बस , यही बात चुभ रही है सबको . सबने ज्ञान की तलवार से अपना खेल सेट कर रखा था.. कि आप आ गए और सब गड़बड़ हो गया.  आपने अनशन कर दिया .. जो इन भ्रष्ट लोगों के सपने में भी संभव नहीं है.. ऊपर से  आपने यह अनशन जनता के लिए कर दिया...  आज के स्वार्थी दौर में इतना सोचने भर में खाया-पिया बाहर आ सकता  है .


इसलिए आप डिअर अन्ना हैं अन्नाजी :)


आप जानते हैं कि चुनाव धन-बल से जीते जाते हैं . राजनीति जोड़-तोड़ का खेल है परन्तु उनके लिए जो कमजोर खिलाडी हैं. जो मजबूत होते हैं वो अपना खेल ईमानदारी से जीतते हैं. आप निश्चिन्त हैं क्योंकि आप जानते हैं कि जनता को ठग नहीं ईमानदार व्यक्ति चाहिए. ऐसा व्यक्ति अपने काम में फेल भी हो सकता है परन्तु भ्रष्ट और काईयाँ बिलकुल नहीं.. फिर अन्यायी होना तो दूर की बात है. इतने दिनों का अनुभव बताता है कि राजनीति में आते ही आप पर कीचड़ उछालने का कार्य और तेज हो जाएगा परन्तु आपको इसकी परवाह नहीं.  हमें भी नहीं है.. हमें भी पता है यह होगा. कोई बात नहीं.


आपका प्रचार जनता करेगी ... धन की क्या आवश्यकता है ? हार गए तो हार गए... कम-से-कम अब भारतवासी यह बहाना तो नहीं बना पाएंगे कि कोई अच्छा विकल्प ही नहीं था ..किसे वोट देते ? यह बहुत बड़ा परिवर्तन होगा आपके द्वारा. मैं अपने स्तर पर आपके लिय प्रचार करुँगी और इसके लिए बहुत मेहनत नहीं लगेगी... आपकी मधुर मुस्कान, ईमानदारी और निर्णय लेने की क्षमता सबको मोहित कर चुकी है. आप वामपंथियों की तरह सरकार की आलोचना मात्र नहीं करते हैं अपितु समय की नजाकत देखते हुए आन्दोलन को नए स्तर पर ले जा रहे हैं.  इस उम्र में इतनी साफ़ दृष्टि, जोश और नवाचार देखकर सभी खुश और उत्साहित महसूस कर रहे हैं.




रही बात विदेश नीति और वित्तीय नीति की तो आज जो नीतियाँ बना रहे हैं उनसे हम संतुष्ट नहीं है. ऐसा लगता है कि आज के नीतिनिर्माताओं को अपने देश पर भरोसा है ही नहीं.  देश के लिए डंडा और विदेशियों के लिए नम्र कालीनें . स्वदेशी की अवहेलना करना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना और नेतृत्व की कमजोरी को दिखाता है. हम सबको उम्मीद है कि हम कम पढ़े-लिखे (देश को चूना लगाने का ज्ञान भी नहीं ), कम  साहसी ( बेईमानी और ऊपर से धौंस दिखाने के साहस का नितांत अभाव ), ईमानदार लोग देश को अपने संकल्प से वह दे पाएंगे जो हमसे आने वाली पीढ़ी उम्मीद करती है.


डिअर अन्ना आप आगे बढ़ें , हम आपके साथ हैं.

24.7.12

आप सभी को नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं




उफ्फ्फ !!! हिन्दू होना कितना कठिन काम है.... ये करो वो करो , ऐसे करो वैसे करो. हे भगवान् !! आज की ही बात ले लीजिये... नाग पंचमी का त्यौहार है. एक दंश से ही प्राण हरने वाले  "नागों" की पूजा की जाएगी ताकि उनसे हम सुख-शांति प्राप्त कर सकें ?!! जैसा इतना अत्याचारपूर्ण कृत्य कम था कि बिच्छूओं की रक्षा के लिए भी एक कथा बना दी. आपने भी पढ़ी ज़रूर होगी ... एक संत थे जो नदी में संकट में पड़े बिच्छू की रक्षा के लिए बार-बार उसका दंश सहते थे. अर्थात आप अच्छे हैं तो उनसे भी अच्छे से व्यवहार करेंगे जो आपका अहित करते हैं . यही है सच्चे संत की पहचान .. यही ना ? नहीं, यह सच नहीं है... सत्य तो यह है कि भला व्यवहार  करने वाले को दुनिया मुंह पर सीधा और पीठ पीछे मूर्ख कहती है.

तो फिर हमारे ज्ञानी संत क्यों हमें मूर्ख की श्रेणी में डालना चाहते हैं ? शायद इसलिए कि उन्हें कर्मफल सिद्धांत का पूर्ण ज्ञान है. जो बुरा करेगा वो बुरा पाएगा. यह तो सत्य है पर उस विष को सहने के समय प्राप्त हुए कष्ट को तो सहना ही पड़ता है न. यहाँ एक तथ्य यह है कि सर्प विष हमारी जान भी बचाता है . यदि समस्त सर्प जाति का उन्मूलन कर दिया गया तो मानव जाति का ही नुक्सान होगा. वहीँ यदि बिच्छू के दंश निकाल दिए जाएँ तो वह संकट के समय अपने शत्रु का सामना नहीं कर पाएगा और मारा जाएगा. अतः किसी बिच्छू की सहायता हुई तभी मानी जाएगी जब आप वह काम कष्ट सहकर याने बिना बिच्छू का डंक निकाले करें .. वही होगा सच्चा परोपकार .

हमारी संस्कृति में सबका बचाव किया गया है .. मक्खी और मच्छर को छोड़कर. बात तो सही लगती है कि अगर यह परम्परा है तो कोई महत्त्वपूर्ण कारण तो अवश्य होगा पर वास्तविक जीवन में इस शिक्षा की कसौटी पर खरे उतरना बहुत कठिन लगता है कि प्रकृति के हर रूप से एकसार हो जाओ. एक बार तो जी में आता ही है कि निकाल दो सारा विष .. फिर देखते हैं परन्तु फिर कोई कसौटी ही नहीं बचेगी जिसपर खुद को कसा जा सके. हम अपने मन में सर्प के सर को कुचलने को उद्यत विष को अपने अन्दर फैलने से नहीं रोक पाएंगे. आज की तारीख में तो मैं इस कसौटी में फेल हूँ ... कल का पता नहीं.

भारतीय संस्कृति में आस्था के तहत " नागदेवता " को प्रणाम करती हूँ. 
हम्म....... शांति मिली .
तो चलिए अपने-अपने (सर्प और मैं ) रस्ते ... और जो टकरा गए तो .................

प्रणाम !!

14.7.12

अंतर्मन कहता है ..



स्वामी विवेकानंद से शिकागो प्रवास के दौरान एक अंग्रेज ने कहा - " क्या भारतीय ठीक से कपडे नहीं पहन सकते? " स्वामी विवेकानंद ने शांत रहते हुए जवाब दिया - " हमारी संस्कृति में कपड़ों से ज्यादा चरित्र को महत्व दिया गया है. "

भारत एकमात्र देश है जहाँ मुनिजन निर्वस्त्र घूमते हैं और लोग उन्हें श्रद्धाभाव से देखते हैं. बड़े से बड़े राजा-महाराजा उनके पाँव पखारते हैं और अपने कष्टों के निवारण के लिए आशीर्वाद के साथ ही राय भी लेते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि संसार में किसी पर भरोसा किया जा सकता है तो इन निर्मोही तत्वज्ञानियों पर ही. बाकी तो सब छल है ... रेशमी छल. हर चेहरा ऊपर से लिपा-पुता मुस्कुराता दिखता है, उसकी एक परत खुंरच के देखिये, घाव ही घाव दिखेंगे. घबराहट होने लगेगी और तय नहीं करते बनेगा कि किसे ज्यादा दुखी कहें और किसे खुशकिस्मत कहें ?

जैसे-जैसे समाज सभ्य होते गए उनकी कलात्मकता निखरती गई और मनुष्य केश वस्त्र से तंतु वस्त्र की ओर उन्मुख होने लगा. कालांतर में रेशों के प्रति उसका ज्ञान बढ़ गया और उसे सजा कर पहनने की दिलचस्पी भी. मुद्रा व्यवस्था ने ताकत के आधार पर बँटे समाज को आर्थिक शक्ति से  भी बांटने का कार्य किया. धीरे-धीरे लोग भूल गए कि  वो दिल से मानव हैं भले ही तन पर कपड़े हों या नहीं , क्या फर्क पड़ता है .

आज यह हाल है कि मानवीयता अपनी गरिमा के लिए मानव मूल्यों पर नहीं कपड़ों पर निर्भर हो गई है. जिसने कपड़े पहने हैं वह इज्जतदार और जिसने नहीं पहने वह लूज़र है. हद्द है !! यह क्या बात हुई ?! आये दिन खबरें आ रही हैं .. प्रेमी ने प्रेमिका का एमएमएस बनाया, गाँव में सबके सामने महिला को निर्वस्त्र कर घुमाया, पब में जाकर स्त्रियों के बाल खींचे और कपड़े उतार कर विडियो यु-ट्यूब में डाल दी . करो .. और कर भी क्या सकते हो ... लूज़र !!! बात नहीं मानती है ... उड़ा दो इज्जत ... वाह क्या बात है ... ! लड़की हो या लड़का .. अपनी इज्जत के लिए वह कपड़ों का मोहताज नहीं है , कदापि नहीं. उतार दो कपड़े ... और उतरवा लो अपनी खुद की इज्जत क्योंकि इज्जत चरित्र से होती है कपड़ों से नहीं .

गुवाहाटी में सोमवार को हुई घटना की जिसप्रकार लड़कों ने भर्त्सना की है उसे देखकर लगता है कि आज के युवा असभ्य परम्पराओं और मान्यताओं को एक मिनट भी चुप होकर नहीं देख सकते. गुवाहाटी के दरिंदों में से एक को नौकरी से निकलवा दिया युवकों ने. पता नहीं ये लड़के रामभक्त हैं या कृष्ण भक्त, नानकभक्त हैं या यीशु भक्त या अल्लाह के बन्दे ... सब एक लग रहे थे ... सिर्फ अच्छे इंसान लग रहे थे. लिंग से परे, धर्म से परे , देश से परे सब एक आवाज में खड़े होकर पीड़ित लड़की के हक में बोल रहे थे. एक स्त्री के रूप में कह सकती हूँ " धन्यवाद आपका ! डरने की कोई बात नहीं है, सारी उंगलियाँ एक सी नहीं होती ."  अतः यह दुर्भावनापूर्ण कृत्य एक न एक दिन बंद होगा.

Link : Guwahati molestor shamed on facebook

5.7.12

श्रद्धांजलि : एक अनामिका को


कल बिलासपुर के बस स्टैंड में एक सूनी जगह से आ रही तेज दुर्गन्ध ने लोगों का ध्यान खींचा. उस दुर्गन्ध का पीछा करते हुए वे लोग उस जगह पहुंचे जहाँ से दुर्गन्ध आ रही थी. उन्हें वहां एक महिला की नग्न लाश आपत्तिजनक स्तिथि में मिली. महिला के गले में खरोंच के निशान थे. मृत देह के पास ही चप्पलें और शराब की बोतलें पड़ी थीं. पुलिस की तफ्तीश में पता चला की वह एक विक्षिप्त महिला थी जो भिक्षावृत्ति कर जीवनयापन करती थी. महिला की उम्र २५ वर्ष के आसपास थी. पुलिस इसे अनाचार के बाद हत्या का मामला मान रही है. 

अनाचार के बाद हत्या , मतलब महिला भले ही विक्षिप्त थी परन्तु नशेड़ियों से सम्बन्ध बनाने को  तैयार नहीं थी और विरोध कर रही थी. शायद उसके उग्र रूप को देखकर ही भारत के उन भले मर्दों ने यह निर्णय लिया होगा कि अब इस विक्षिप्त जीवन से उक्त महिला को सदा के लिए मुक्ति दे दी जाये. इस बात की एक रत्ती भी उम्मीद नहीं है कि उन भले मर्दों को उनके इस पुनीत कार्य के लिए खोजकर पुरुस्कृत किया जायेगा. बात पुलिस की नहीं है , बात मेरी भी है . क्यों बहाऊँ मैं आंसू ? मुझे क्या हक है ? आह्ह ! ये ढोंग है जो अब और नहीं होता....नहीं होता. माफ़ी मांगना भी ढोंग लग रहा है. मैं जानती नहीं थी क्या कि ऐसा हो सकता है. सब जानती थी. "भूल जाओ" मत कहियेगा. ऐसी घटनाएँ सबक होती हैं न कि भूल जाने के लिए होती हैं. तो आगे क्या ? यह प्रश्न मेरे सामने खड़ा है जिसका उत्तर जल्दी नहीं मिलेगा परन्तु मिलेगा ज़रूर. यह प्रश्न मेरे लिए आत्मिक है न की सांसारिक....!

एक अनाम ज़िन्दगी को मेरी श्रद्धांजलि !
प्यार और आदर , तुम्हारे इस जीवन के लिए !

5.6.12

भारत रत्न का खेल



वाह रे जनतंत्र मेला है रंगबिरंगा. कोई भगवा रंगा तो कोई नीला रंगा और सब मिलकर हो गए काला.मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि अन्ना संसद को ना कोसे, बल्कि चुनाव जीतकर राजनीति में आयें. फिर ही देश के भले की कोई बात कहें. कांग्रेस पार्टी ने बाबा रामदेव के साथ देश का धन विदेश से लाने के लिए अहिंसक विरोध कर रहे लोगों पर रात को लाठियां चलवाईं. कांग्रेस को राजबाला और उनके गुरु किसी सम्मान के काबिल नहीं दिखते हैं परन्तु देश हित पर कभी कुछ न बोलने वालों को पद्मश्री और संसद की मानद सदस्यता दी जाती है.


दिल्ली के उपचुनावों में मिली हार के कारण अब जाकर केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को बस्तर दौरे की याद आई है. आनन्-फानन में राहुल गाँधी भी प्रदेश का दौरा करके गए पर लेश मात्र भी किसी को प्रभावित नहीं कर पाए. बस एक ही बात का रोना रोते गए " गुटबाजी बंद करिए तभी कांग्रेस जीतेगी" . हम इन नेताओं से क्या उम्मीद करें कि विश्व स्तर पर और घरेलू स्तर पर ये हमें उचित नेतृत्व दे पाएंगे.


छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार स्वास्थ्य मंत्रालय की गड़बड़ियों की वजह से हमेशा आलोचना की शिकार होती है. कभी यहाँ मोतियाबिन्द का ओपरेशन थोक में लोगों की दृष्टि छीन लेता है तो कभी कुंवारी लड़कियों तक के गर्भाशय बिना किसी कारण निकाल दिए जाते हैं. परन्तु कांग्रेस जनता के लिए खड़े होने की बजाये आपसी गुटबाजी करती दिखती है. हालांकि कभी-कभी सरकार को घेरने का स्वांग भी किया जाता है ताकि आलाकमान की नज़रों में जगह बने रहे.


छत्तीसगढ़ राज्य की सबसे प्रमुख समस्याएँ हैं - कृषि का पिछड़ापन, बेरोजगारी, प्रतिभा का पलायन, बढती अराजकता और नक्सली समस्या. राज्य सरकार इन समस्याओं से निपटने के लिए कुछ ख़ास रणनीति नहीं बना पाई है परन्तु कमजोर विपक्ष के कारण रमन सरकार की सभी कमियां बदस्तूर जारी हैं. ऐसे हालात में यह जरूरी होगा कि राज्य की जनता स्वयं इन कमियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करे. छत्तीसगढ़ का विकास के मामले में बिहार के बाद दूसरा स्थान बताया गया है जो कि सत्य नहीं प्रतीत होता. मजदूरों का पलायन, गुमशुदा बच्चों की बढती संख्या, पुलिस का अपराध रोक पाने में असफल होना, बेरोजगारी बढ़ना, भ्रष्टाचार बढ़ना इंगित करता है कि राज्य केवल आंकड़ों में आगे बढ़ा है न कि वास्तविकता में. प्रदेश की जनता पक्ष और विपक्ष दोनों की निष्क्रियता से त्रस्त है पर क्या करें ? सब जनतंत्र के मेले में अपना तमाशा बनते देख रहे हैं पर कब तक ?


आप बाबा रामदेव और अन्ना हजारे से सहमत हों या नहीं, आपके पास देश चलाने के लिए दिल्ली मेट्रो के पूर्व प्रमुख ई.श्रीधरन जैसे कुशल नेता नहीं हैं. ऐसे में बाबा रामदेव को संपत्ति के लिए और अन्ना को उनके सहयोगियों के लिए कोसने की बजाय हमें उनका साथ देना चाहिए और अपने स्तर पर खुद नेता बन देश के लिए काम करना चाहिए. इस देश में एक खिलाड़ी को भारत रत्न देने के लिए नियम बदले जाते हैं और देश के साधू-संत रात में लाठी खाते हैं. कुछ अभागे संत तो गंगा की पवित्रता बचाए रखने के लिए उपवासे ही दम तोड़ देते हैं. अब आप ही तय करें आगे की रणनीति. हमारे देश की राजनीति तो जंग खा गई है.


हमारे देश की जनता ही भारत रत्न है न कि कोई एक व्यक्ति विशेष जो अपने क्षेत्र में पारंगत है. मिट्टी में सोना उगाने वाला किसान भारत रत्न है, पिछड़ों की आवाज बनने वाले अनाम सरदार भारत रत्न हैं, चिड़ियों को निःस्वार्थ भाव से दाना डालने वाले भारत रत्न हैं, देश की रक्षा करने वाले सैनिक भारत रत्न हैं. इन्हें कम ना आंकें बल्कि इनकी ताकत से देश चलता है जानें.

4.6.12

हरी - भरी धरा सबके लिए





कुछ साल पहले मैंने ईशा फाऊंडेशन नामक एक गैर सरकारी सहायता प्राप्त संस्था को "प्रोजेक्ट ग्रीन हैण्ड" के लिए १ हजार रुपये का योगदान दिया. यह संस्था सद्गुरु जग्गी वासुदेव के द्वारा स्थापित की गई है जिसके द्वारा मानव उत्थान के अनेक कार्य किये जाते हैं. प्रोजेक्ट ग्रीन हैण्ड का नाम 'लिम्का बुक ऑफ़ रेकोर्ड्स ' में दर्ज हुआ है और इसे दो बार इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरुस्कार भी मिला है. स्पष्ट है कि प्रोजेक्ट ग्रीन हैण्ड में अपने ओर से किये गए छोटे से योगदान के लिए मैं बेहद गर्वित महसूस करती हूँ. 


एक दिन इस बारे में मेरी अपनी मित्र से बात हो रही थी कि उसने मुझसे बड़ा विचित्र प्रश्न किया , " वो लोग तमिलनाडु में पेड़ लगायेंगे न ... तो तूने उन्हें दान क्यों किया ? छत्तीसगढ़ में लगाते तो दे देती रुपये. " उफ्फ्फ ..... !!! मेरे दिमाग में ये लाख टके की बात कभी नहीं आई . सो मुझे इस प्रश्न का उत्तर भी नहीं पता था पर बस उसे शांत करने के लिए मैंने यों ही कह दिया " मेरी बेटी कभी तमिलनाडु जाएगी तो उसे फ्रेश हवा मिलेगी सूंघने इसलिए किया हा हा हा ! " मेरी मित्र ने मेरी तरफ यों घूरा जैसे हम किसी निपट मूर्ख को हंसते देख घूरते हैं. 


बहुत लोगों ने डांटा " तुम्हे पैसे की क़द्र नहीं है ... तुम भरोसे के लायक नहीं हो ...आदि आदि " . मैं टस से मस ना हुई. माना कि मैं सर्वश्रेष्ठ नहीं पर निरी मूर्ख ..... नो वे  ! मैंने सबकी बात सुन ली और याद कर लिया कि ये वे व्यक्ति हैं जो पैसे को भगवान् समझते हैं. सबकी अपनी - अपनी सोच है परन्तु भारत में असहिष्णुता बढती जा रही है. कोई किसी को सुनना समझना ही नहीं चाहता. खासकर जैसे अनुजों की बात मानना राष्ट्रीय मूर्खता घोषित कर दिया गया है. 


कुछ वर्षों बाद एक अन्य दिन फिर मेरी उसी मित्र से मुलाक़ात हुई. मेरी मित्र ने  पूरी दृढ़ता से अपनी बात बताई " वे  बहुत अच्छे हैं. भले ही वो मेरी बेटी के असल पिता नहीं हैं परन्तु बहुत अच्छे हैं. वो जरूर मेरी बच्ची के भविष्य की जिम्मेदारी ख़ुशी ख़ुशी उठाएंगे. " वो ठीक कह रही थी. मेरी मित्र के पहले पति की मृत्यु हो गई थी. जिन सज्जन ने उससे शादी की वे दयालु व्यक्ति हैं . वे  स्त्रियों और जीवन के प्रति तुच्छ सोच नहीं रखते हैं. 


हम नहीं जानते कब हमें किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता पड़ जाएगी. मेरा-तेरा का चक्कर सबको डुबो देता है. भारतीय परम्परा के पालक-पोषक ऋषि-मुनि अपने विशाल ह्रदय और अनुभव से हमें बताते रहे हैं, सबसे अच्छी नीति " वसुधैव कुटुम्बकम " है जो सबके हित में है. आज पर्यावरण दिवस है. प्रकृति को हरा-भरा बनाए रखने के लिए कुछ प्रयास करने चाहिए यह याद दिलाने का दिन है आज. इस जून पर्यावरण की रक्षा हेतु आप जो कर सकते हैं करें, अच्छा लगेगा . 


सुनो भई साधो



सब्सिडी समाप्त - हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े-लिखे को फारसी क्या
भ्रष्टाचार समाप्त - रानी बोलेगी अपना सुहाग लूटेगी 
अरविन्द केजरीवाल - कौव्वो की सभा में कोयल की आवाज का क्या मोल ?
कैग रिपोर्ट - बेईमान के सामने सबूत पेश करना या कुछ सिद्ध करना समय की बर्बादी है.
सत्तादल - सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का 
सीबीआई के छापे - ऊँट के मुंह में जीरा

जनता - इधर कुआं उधर खाई
विपक्ष - दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर का फायदा 
बाबा रामदेव - जग कहे जोगी मूरख , जोगी कहे जग मूरख 
अन्ना - एक और एक ग्यारह होते हैं 

2.6.12

Rowdy Rathore



Prabhudeva Rockkkkkssssssssssss !!!
First time in my life I give standing ovation to any scene of d movie in theater.  If u love masala movies then must c Mister Rathore in theater.  
Prabhudeva is a tremendous director. He knows very well that how to take work frm his artists. zabardastt acting by Akshay Kumar. He always mesmerize u by his versatile talent. Handsome Sonakshi ( i find her handsome always...) also rocks. 
Dances in d movie r up to d mark as this is a "Prabhu of dance`s" movie. 
Zabardast fighting scenes, good songs and nice story. A total paisa vasool movie.
A cute li`l girl is also there to steal ur heart and wet ur eyes. 
There is also a good msg  in d movie.
Tell me ur own and hall`s experience after watching this movie. 
Akkie - The Baap of all Khans. 
don like my language na ... haha u will also use this language with laugh.  
What else do u want  in any movie ??? Just go n watch d movie ........................ now. 

30.5.12

दो ना रि यां



नारी - कैसा विचित्र शब्द है ये जिसका मतलब  है 'नहीं रे' ।
बच्चे पैदा करे "हाँ री" , खाना पकाए "हाँ री" , सितम सहे "हाँ री" , रीति-रिवाज  निभाए "हाँ री" , पति और बच्चों की फिक्र में उपवास करे "हाँ री", गाय-बैल ना हों तो हल खींचे "हाँ री", अंतरिक्ष पर जाये "हाँ री",  देश चलाये " हाँ री"  .. पर नाम है ना री ? स्त्री  सूचक इस शब्द 'नारी' से मुझे आपत्ति है।


कल  का अखबार रोज़ की तरह एक दर्दनाक घटना बलात्कार की जानकारी दे रहा था। रायपुर में एक महिला पुलिस कर्मी के साथ गाँव के कुछ बदमाश युवकों ने सामूहिक बलात्कार किया। इस दौरान बुरी तरह पीटा गया पीड़ित महिला का पुरुष सहकर्मी थाने से पुलिस बल लेकर आया और रात को खोजबीन के बाद २ बदमाश युवकों को शिनाख्त के आधार पर पकड़ा गया। आज उन युवकों को उनके गाँव में घुमाया गया । दोनों युवकों के परिवार वाले सदमे में थे और बार-बार कह रहे थे " तूने हमें कहीं का ना छोड़ा। ये दिन देखने के लिए पैदा किया था तुझे ?" पूरा गाँव शर्मिंदा हो रहा था इस घटना के कारण। पर पता नहीं क्यों पत्रकार बंधू बलात्कार की खबरों को हमेशा ऐसे छापते हैं ' एक अबला की अस्मत लुट  गई'।


जब अपराध महिला का नहीं है तो उसकी इज्जत क्यों गई ? हाँ , निजता भंग हुई है, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना भी मिली है उसे। जिसे वह महिला कैसे सहे कोई नहीं बता सकता। पर जो गुनाह उस  महिला का नहीं उससे उसकी इज्जत कैसे चली गई ? गाँव वाले ठीक कह रहे हैं , इज्जत उन लड़कों की गई है ना की पीडिता की। पत्रकार वर्ग को इस दिशा में सोचना चाहिए। ऐसी खबर से लड़की पर और उसके घर वालों पर क्या गुजरती होगी । एक तो शारीरिक - मानसिक प्रताड़ना और ऊपर से समाज की दकियानूसी सोच । हमें इस बात को ध्यान में रखकर आवश्यक कदम उठाना चाहिए।


मेरी पसंदीदा 'हाँ रियों' में से एक म्यांमार की लोकप्रिय नेता आंग सां सू की  का दल NLD म्यांमार (बर्मा) के उपचुनाव जीत गया है। दो दशकों तक नजरबन्द यह नेता अपने देश में बेहद लोकप्रिय हैं और देशवासी इन्हें "मम्मा" बुलाते हैं । यह बात नज़रंदाज़ नहीं की जा सकती है कि जहाँ विकासशील राष्ट्रों श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल में नेता अपने देशवासियों का समर्थन खो रहे हैं वहीँ एक महिला अत्यंत कठिन परिस्तिथियों में अपने परिवार से दूर, देश-दुनिया से दूर होकर भी इतना सम्मान पा रही है। 


देश और जीवन के इस कठिन दौर में वे निश्चित ही भारत से सहयोग और समर्थन की आशा करती रही होंगी परन्तु भारत ने कभी खुलकर उनका समर्थन नहीं किया। भारत में म्यांमार के सैनिक प्रशासकों का स्वागत किया जाता रहा है। परन्तु यह भी सत्य है कि पिछले २५ वर्षों में एक भी प्रधानमंत्री म्यांमार के दौरे में नहीं गया। इस वर्ष २५ वर्षों बाद भारत के प्रधानमन्त्री म्यांमार गए और उन्होंने ऑंग सां सू की से भी मुलाक़ात की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनसे बड़ी आत्मीयता और विनम्रता से मिले जैसे कह रहे हों कि भारत की ओर से आपका सम्मान।


क्या महिला किसी दायरे में बंधी है ? हमें उसके लिए तय करना होगा कि वह क्या करे और क्या नहीं। वह क्या कह सकती है और क्या नहीं ? जवाब है , 'नहीं'। प्रत्येक मानव स्वतंत्र है उस हद तक जहाँ से दूसरे की स्वतंत्रता शुरू होती है। दुर्घटनाएं घर बैठे भी होती हैं । सावधानी और सुरक्षा आवश्यक है परन्तु इस आधार पर पूर्णतः बंधन लगाना  भी अव्यवहारिक होगा। आज के दौर में लड़कियां खुद को साबित कर चुकी हैं। वे 'हाँ री'  हैं नाकि मात्र अबला नारी । 

29.5.12

जेठ की भीनी -भीनी तपिश


इस वर्ष जेठ के महीने में रुपये की घटती कीमत और पेट्रोल के बढ़ते दामों ने सोने और चाँदी को भी पतली गली दिखा दी। लोग भूल गए भ्रष्टाचार को अचार न बनने देने की बातें और दौड़ पड़े लड़े -भिड़े जैसे भी गाड़ी  में पेट्रोल भरवाने। घर में दूध हो या न हो गाड़ी में पेट्रोल ज़रूर हो ताकि चीनी,सब्जी, गैस, सुबह के अखबार वगैरह का इंतज़ाम तो किया जा सके। अब कौन चलाये इस जमाने में साईकिल-वायकिल ?भाड़ में जाए महंगाई, हम और कमाएंगे।



आर्थिक जीवन की ही तरह सामाजिक जीवन की भी दुर्गति हुई है जेठ के महीने। चारों तरफ से बलात्कार, अपहरण की खबरें ऐसे उफन कर आ रही हैं जैसे कोसी नदी में बाढ़ आती है। हाय-हाय मची है । कहाँ जाएँ, क्या करें औरतें ? क्या यही है औरतों की ज़िन्दगी ? बेबस चिल्लाती,बेसुध कॉलेज के बाहर ज़िंदा लाश की तरह पड़ी औरत। 


सोच रही हूँ क्या लिखूं ? किसके बारे में लिखूँ ? नकारात्मकता को जीतने देना मेरा स्वभाव नहीं है और सच कडवा है। हाँ,सत्य कडवा तो है पर गरल तो नहीं। और गरल हो भी तो हम हिन्दुस्तानी उसे कंठ आभूषण बना लेते हैं। इधर 45.4 डिग्री  तापमान ने सबके पसीने छुड़ा दिए हैं। सारी बाहरी खुशियाँ नवतपा की विदाई का इंतज़ार कर रही हैं। पर कुछ बातें घर बैठे ही ठंडक का एहसास करा रही हैं। 


पहली,सत्यमेव जयते को मिलने वाला जन प्रतिसाद अन्ना और रामदेव बाबा के आन्दोलन की जगह भर रहा है। आखिर कब तक हम नेहरु-गाँधी की समर्थन और विरोधी टीमों की तरह आपस में खेलते रहेंगे ? हमें उस समय को छोड़कर  इस समय क्या सही है और क्या गलत तय करना होगा । अपने-अपने स्तर पर देश के लिए और मानवता के लिए समय चक्र को अच्छाई की ओर घुमाये रखना होगा। इसके लिए विशेष प्रयास करने पड़ेंगे। बैठे रहने से काम ना चलेगा । प्रकृति का नियम है कि वह व्यवस्था को अव्यवस्था में और अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलती रहती है। ऐसे में अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति के लिए हमें प्रयास करने ही होंगे। 


दूसरी, न्यायालय ने आरुषि हत्याकांड में तलवार दंपत्ति पर केस दर्ज करने की इजाजत सीबीआई को दे दी। हालात और सबूत इशारा कर रहे हैं कि तलवार दंपत्ति ही अपनी बेटी की कातिल हो सकती है। मुझे याद है जब आरुषि की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के इंतज़ार में डॉक्टर तलवार अपने भाई के साथ हॉस्पिटल के बाहर खड़े थे। उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। मुझे नहीं पता सच क्या है ?  अच्छा ही होगा यदि यूपी पुलिस की रिपोर्ट गलत साबित हो पर कभी सोचा है कि यदि यूपी पुलिस सही कह रही थी तो उनकी बात ना मानकर आरुषि के साथ सब अन्याय कर रहे थे। 


तीसरी, मेरे शहर में 'आकार-2012' का आयोजन हुआ जिसमे मैंने पहली बार रंगों के प्रयोग कर चित्रकारी की। जी हाँ ! मैंने पहली बार रंगों का प्रयोग किया। बहुत मज़ा आया। मई की गर्मी और रंगों और लकीरों की मेरी नासमझी की जोड़-तोड़ ने पूरे मई को जुलाई बना दिया। ज़िन्दगी में कितना भी बुरा वक़्त हो, जंग हो, बेरूखी हो, धोखा हो, हताशा हो सब भूल जायेंगे अगर दो बूँद ज़िन्दगी की पी लेंगे। किसी गुरूद्वारे माथा टेक कर , रंगों से दीवार और आँगन के कैनवास को सँवार कर, ताल-तलैय्या में तैर कर, किसी रक्त दान , नेत्र दान शिविर में शामिल होकर, किसी सफ़ेद शेर की आँखों को देखकर,बहुतेरे हैं मार्ग। आपके अपने मार्ग। चुनिए एक-एक कर और डूब जाइए इस जेठ की भीनी -भीनी तपिश में जीवन के रंगों से घुलने-मिलने।
आकार-२०१२
मधुबनी चित्रकला 

15.5.12

कायर


नक्सलियों की एक और कायराना हरकत - ७ जवान शहीद .

पहले मुझे समझ नहीं आता था कि इसे कायराना हरकत क्यों कहते हैं पर अब समझ आ गया .

- ये करना कुछ नहीं चाहते और  सरकार  को भी विकास  करने से रोकते हैं . पर ... सब अपने हाथ में चाहिए . 
- डराओ, धमकाओ, मारो और पैसा वसूलो. 
- अपने जैसे बिच्छूओं  को संरक्षण दो और पकडे जाओ तो एक दर्दभरी झूठी कहानी सुना दो ताकि सही व्यक्ति ही फंस जाये.
- ये कभी कोई समझदारी की बात नहीं करेंगे , होने ही नहीं देंगे तब तो चलेगी इनकी नक्सल  दूकान.
- इन्हें जंगल, भूमि, खनिज, वन  संपत्ति की चिंता तो है परन्तु मानव संसाधन  की  नहीं  क्योंकि मानव अपनी रक्षा स्वयं करेगा. जमीन-खनिज  की रक्षा या कहें कब्ज़ा तो नक्सलियों को ही करना पड़ेगी वर्ना वो सब चला जायेगा हाथ से.
- कब तक चलेगा ये तांडव ? मरने वाले मेरे सगे रिश्तेदार न सही पर इंसानियत का रिश्ता पुकारता है.
- नेताओं पर भरोसा किसी को नहीं है पर ऐसी हिंसक व्यवस्था देश में कहीं नहीं है जैसी समझदार  और भले नक्सली भोले भाले आदिवासियों और सरकारी कर्मचारियों को अपनी ज़मीन पर उपलब्ध करा रहे हैं.
- नक्सली अपनी कायराना हरकतों से सिवाय अपने किसी और का भला नहीं कर रहे हैं, यह स्पष्ट है.

और नक्सली प्रेमी प्लीज़ ... आप खुद जाकर नक्सलियों की सेवा करें. हमसे उम्मीद न करें कि हम इन हिंसाप्रिय दुष्टों को अब और सहेंगे डर-डर कर और आप अपने भले होने को भुन्जाते रहेंगे बिना कुछ किये. भले तो सब हैं पर मूर्ख नहीं इसलिए बात भर ना करें बल्कि मुख्यधारा में शामिल  हों. ये विनती नहीं सुझाव है.

14.5.12

पद्म्बोध

पंक में रहकर भी ' स्वयं ' का प्राकट्य है पद्म्बोध ।


पहले की ही तरह आपसे मुलाकातों का सिलसिला चलता रहेगा पद्मबोध में । 
पुराने सदस्यों का बहुत आभार एवं नए सदस्यों का आह्वान है ।  
शुभकामनाओं हेतु धन्यवाद ! 

आभार आपका !





आज ब्लॉगर के रूप में मेरा एक वर्ष पूर्ण हुआ। शौक में शुरू किया ये सिलसिला मुझे इतना प्रिय लगने लगा जैसे कि मैं सदा से यही करना चाहती थी। यकीन नहीं होता  कैसे मैं एक -एक लेख के बाद पाठकों की संख्या देखती थी । कभी सोच भी नहीं सकती थी कि एक वर्ष में एक अनजान नाम, चलती-फिरती हिंदी और विषय का अल्पज्ञान होते हुए भी यह सम्मिश्रण ३७०० पेज  व्यूज़  का आंकड़ा छू लेगा। 


'परिष्कार' नाम पर अपना हक़ ना समझते हुए मैं ब्लॉग का नाम परिवर्तित कर रही हूँ। साथ ही आपसे अपनी पहली स्वप्रकाशित कविता 'ख़ुशी' के साथ ही मेरी और आपकी इस सहयात्रा को  अपनी कविता ' कारवां '  में प्रस्तुत कर रही हूँ।


ब्लॉग के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक बार पुनः अपनी ख़ुशी के लिए आपको परिष्कार के आंकड़ें बता रही हूँ । आशा करती हूँ  कि बोर महसूस करने के बाद भी आप यह आंकड़ें वैसी ही तन्मयता से पढने का अभिनय करेंगे जैसे कि एक माँ अपने बच्चे की प्रशंसा करने में फूली नहीं समाती है और हम उसे धैर्य से 'सुनने' का अभिनय करते हैं। धन्यवाद ! मुझे आपसे यही उम्मीद थी।


कुल दृष्टिपात - ३७००
       भारत - १७०७
       अमेरिका - ११५१


सर्वाधिक पढ़े गए लेख -
१ बोल मेरी मछली कितना पानी - १३८
२. चलोगी अकलतरा के पागलखाने ...! एक मर्मस्पर्शी अनुभव - १२०
३. राजा वही जो प्रजा का ख्याल रखे - ४५


ब्लॉग में लेखन का उद्देश्य धनार्जन नहीं था।अलग -अलग  पृष्ठ जैसे 'उन्मुक्त आकाश' और 'जानिए ' आपको  अच्छे लगे इस  हेतु आभार स्वीकार करें। सर्वाधिक ख़ुशी तब होती है जब आपकी प्रतिक्रिया ब्लॉग में या फेसबुक में पढने को मिलती है। उम्मीद है कि आप आगे भी अपनी मूल्यवान प्रतिक्रियाएं देंगे।


इस सफ़र के दौरान हुई धृष्टता को श्री राहुल गाँधी, श्री लालकृष्ण  आडवाणीजी और श्री मनीष तिवारी क्षमा करें। उनसे स्वयं बात करने की हैसियत मेरी नहीं है परन्तु जो भी  विचार प्रस्तुत किये 'सर्वजन हिताय ' जानकार ही प्रस्तुत किये।


विशेष आभार -
मेरी पुत्री 'सौम्या ' को आभार जिनकी ताजगी ने मुझे नवजीवन दिया। साथ ही, दरिद्र नारायण 'अनामिका' को भी धन्यवाद जिनका मेरे जीवन में पदार्पण जैसे मुझे मुझसे मिलाने के ही लिए हुआ था।   


ख़ुशी


दिल आज खुश है कि बहार आई, दिल आज खुश है कि धूप की चादर है छाई
Dil aaj khush hai ki bahaar aaii, dil aaj khush hai ki dhoop ki chadar hai chhaii
बहोत दिनों से पसरा था अँधेरा, कितने दिनों बाद उम्मीदों की हरियाली है छाई
Bahot dinon se pasra tha andhera, kitne dinon baad ummeedon ki hariyali hai chhaii


कितने अरमानों से देखे थे सपने, उन सपनों की आहट है आई
Kitne armanon se dekhe the sapne, un sapnon ki aahat hai aaii
अंगडाई लेकर मुस्कान आई, अब नैनों में जान है आई
Angadaii lekar muskaan aaii, ab nainon me jaan hai aaii


कब से उम्मीद के बादल दे रहे थे धोखा, अब जाकर बरसात है आई
Kab se ummeed ke badal de rahe the dhokha, ab jaakar barsaat hai aaii
भीग गई ये सूखी धरती, विश्वास की कोंपल फिर से उग आई
Bheeg gai ye sukhi dharti, vishvaas ki konpalen fir se ug aaiin


बालों का पकाना सिखा गया कि, ग्रीष्म के बाद बहार ही आई
Balon ka pakna sikha gaya ki, grishm ke baad bahar hi aaii
याद रहेगा ये सबक सोच कर ही आँखों में चमक है आई
Yaad rahega ye sabak soch kar hi aankhon me chamak hai aaii


दिल आज खुश है कि बहार आई, फिर से वो सपनों की रंगीन दुनिया लाई
Dil aaj khush hai ki bahar aaii, fir se wo sapnon ki rangeen duniya lai
पत्थर पे घिस घिस के हिना खुशबू वाला रंग है लाई
Patthar pe ghi-ghis ke heena khushbu wala rang hai lai


इसके सिवा और ईश्वर से क्या चाहेगा कोई, आज' उनकी ' बहोत याद आई
Iske siwa aur Ishwar se kya chahega koi, aaj 'uski' bahot yaad aai
हल्का हुआ दिल, होठों पे है मुस्कान और आँखों में श्रद्धा आंसू भर लाई
Halka hua dil, hothon pe hai muskaan aur, aankhon me shraddha aansoon bhar lai .




कारवां


कारवां जुड़ता गया
राह में बढ़ते-बढ़ते


छोड़ चले थे जिन मुकामों को
आज उन्हीं की तलाश है


जैसे रास्ता कोई गोल बना गया
मिलते हैं तो लगता है "तुम?"


नहीं मिलते तो न पता चलता
दुनिया 'उसकी' , राह 'उसकी'


जिसे मैं समझी थी अपना
वह मंजिल भी 'उसकी'


हंसती हूँ, मैं यहाँ क्यों?
बचपन का खेल याद आ गया


गोल-गोल रानी , इत्ता-इत्ता पानी
बोल मेरी मछली कित्ता पानी


खुश हूँ, गोल-गोल-गोल रानी .....
इत्ता इत्ता पानी... तैरना जानती हूँ अब



13.5.12

Ring a Bell - It Works !



दुष्टों के कॉमन लक्षण इस प्रकार हैं-


१ . पहले भरोसा जीतो।
२. फिर रंग बदलो।
३. डराओ, हर तरह से उन लोगों से दूर कर दो जो उसकी मदद कर सकते हैं।
४. फिर अपनी अच्छी इमेज का वास्ता दो और बताओ कि तुम्हारी कोई नहीं सुनेगा ।
५. हीन भावना भर दो।
६. निरपराध को बदनाम कर दो पर खुद भले बने रहो।
.
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.
.
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७. और..... वो  अपनी चाल में कामयाब हो जाते हैं ।


क्या यही है सत्यमेव जयते ?!!


८. नहीं ! ऐसा नहीं होता है ।
९. अन्याय सहने की एक क्षमता होती है , उसके बाद निश्चित ही विद्रोह होता है ।
१०. विद्रोह करने वाला अकेला पड़ जाता है।
११. मजबूत व्यक्ति लम्बी लड़ाई अपने हौसले के दम से जीत जाता है पर कमजोर व्यक्ति ...भाग्य  को कोसता है या  आत्महत्या कर लेता है ।
१२. इससे पहले कि कोई बेगुनाह मरे ............ आइये , हम सत्य का साथ दें ।
१३. क्योंकि अन्याय सबके साथ कहीं न कहीं होता है .... इसे यूँ ही होने मत दीजिये ।
१४. 'रिंग अ बेल' - अन्याय रोकिये ..... हर स्तर पर ।
१५.अनावश्यक तौर पर खुद को खतरे में ना डालें.. ये दुश्मन की चाल भी हो सकती है।
१६. सत्य की लड़ाई लड़ने से सम्मान बढता है... डरिये नहीं, आगे आइये।
१७. अन्याय सहने से सम्मान नहीं बढता , न ही उसे सामने लाने से घटता है। जो अपराध आपका नहीं उससे आपकी इज्जत क्यों कम होगी। और कोई ऐसी बातें करे तो उसे उसकी हद समझा दीजिये, स्पष्ट शब्दों में ।
१८. बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो ....सत्यम  एव जयते !


अच्छाई को हराने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ?


उसे बुराई से भी बदतर साबित कर दो ।

परिणाम - खुद की बैंड बजाई 


आखिर, 


!!! सत्यमेव जयते !!!


आप सहमत हैं या नहीं : )




अगर आप इससे सहमत हैं तो इसे अपने दोस्तों से साझा करिए ।





1.5.12

Will you accompany me to the Akaltara Asylum .....! A heartrending experience

It`s a bright sunny day, at about noon I left my house to catch up on my daily chores. Only a short distance away from my home, I spotted a disturbed woman roaming around. She was short haired, balding at the center, with blistered bare feet and numerous wounds on the body. She was barely dressed in a short green piece of fabric and was fearlessly roaming around as people around watched her with awe. I found this strange. I felt like helping her, but carried on with my rather urgent work and decided to check on her, on my way back. After hurriedly taking care of my work, I came back looking for her at Satyam Chowk (road name). I saw her near Big Bazaar. I then quickly proceeded to a nearby shoe shop and asked for a pair of slip-on slippers, but they did not seem to have any. I then, pointed to this lady and asked the shopkeeper if he had a suitable pair for her. He immediately showed a slipper for her but i could not decide, " whether to get them, what if she did not wear them ? I will only buy them if she agrees to wear them. Let me check the woman before buying them." I told to shopkeeper to wait a minute and walked up to the woman a little apprehensive not knowing how she might react to me. I crossed the road and softly asked her " listen ! I will let you purchase a slipper, will you wear it ? " She did not respond, but continued to hurriedly sort a pile stones, and made me wonder, if she would hit me with one. I again asked her, " I will get you a pair of slippers, will you wear them? " - she nonchalantly retorted, " yes" !

I took her to the shopkeeper for the measurement and she immediately started expressing her choice. " I only wear the Lakhani brand ... how much will you charge for it.... 30 or 40 rupees ? " I tried to cajole her  to buy the only pair shopkeeper had, saying, " see ! this has Lakhani written on it and, it will serve you in this heat." She agreed to me. The kind shopkeeper charged me only the half the price of his own accord. After this, I asked the woman, " will you wear clothes if i buy for you ? " She agrees, and so i left my vehicle near the shoe shop and walked over to buy a comfortable light dress 'nightie' for her. Meanwhile, Anamika ( the nameless woman) now started telling me all sorts of tales and repeatedly addressed me as "Sangeeta". Well, we reached a garment shop and looking at her plight condition, I asked her to wait out side on the stairs of the shop. I asked to the Lady shopkeeper to show me an in-expensive nightie for Anamika. She checked with me,-" Do you know her, Is she your relative ? " I said, " no, I saw her on Satyam Chowk and I could not bear to see her like this". The shopkeeper frowned her nose and asked her employee to show the cheapest one. The employee said, " the cheapest one costs 330 rupees". We left the shop because i did not have the necessary cash. The only option I had that I lived close by, I can give her one of my used dress. So we proceeded towards the house. along the way,   Anamika kept collecting trash and putting it in the drain, while telling me her life-story.

" Sangeeta! I was only 12 when I was married to a 30 year old man. I lost my daughter who was the same age when I got married. You know how in-laws treat if you give birth to a baby girl.... I then asked ( she mentioned a name which I have forgotten ) - you fast and pray to the Devi (Goddess Durga) - ask her to give us a son ...tell Hanumanji (God) to give us a son. Do you know Sangeeta ! I gave my kidney to my sister`s daughter (showing me her belly) - I got 12 stitches here ( I saw a major surgery in her belly) ... this area is filled with plastic.... ha ha ha ...plastic. Do you know there is a mental asylum in Akaltara, would you like to go there ? Ha ... ha.... ha !!! Sangeeta ! My daughter passed away she was the same age as when I got married......There was an offering of food when my man died - you were the one who offered the kheer (sweet rice pudding) to me ...... ha.....ha...ha !!! " I looked at the expressions of the passerby and scolded her, " keep your cloth properly". She immediately listened to me and bowed down to touch my feet ( An Indian tradition to show respect).

She then fished out a blue pajama from some corner of the street and showed it to me saying " I have a pajama too". I smilingly asked her " how will you wear it ? It has not drawstring to tie ! " She aggressively stood in front of me and confidently started knotting her pajama some how. Then she continued to clean-up the road side and said to me " Sangeeta ! " I smiled and told her " Do you know, my elder sister`s name is Sangeeta ?" She just ignored my statement and continued with her life-story, then said " serving mad people is a good deed and god will give you virtue for this, that`s why you are helping me, Isn`t it ? ....ha....ha..ha !!! " Same things ....again and again.

We reached home after a short walk, I asked her to sit outside in the shade. Restless with thirst, she asked, " Please give me some water... I am very thirsty ." I gave her a bottle of water and an old nightie which she ignored. So I put it on her myself. She then bowed down to me, touched my feet and blessed me," you may have a son like Sankar ." I was stumped ! (Sankar means, half woman and half man person). " What do you mean by Sankar like? "  She explained " Sankar (originally, 'Shankar' not sankar) is my father`s name ( and then got lost in her memories and started smiling). I interrupted her and clearly told her, " I do not differentiate between boy or girl . " She became pensive after listening to my comment - like she had never heard something like this before. Just then my daughter stepped out and she looked at her and said, " she is your daughter, Isn`t it ? You must become like your mother. " Anyways, I said to her, " there is a temple of Sai Bada close to here. Meet me there in the evening. You will surely get food there." She innocently smiled  at me and I was surprised to see her immaculate teeth. she had told me on the way that she was a beauty, and to me that explained her confidence in her self.

Thus ended my chance meeting with Anamika. Her words....laughter ... and her craziness ...still flashed in front of my eyes. Anamika..... a forthright woman, accepting her madness and knowing fully well that the world is selfish and help others for their own interests and well-beings. I don`t know if she willingly gave her kidney to her sister`s daughter or was she cheated. But I want to tell you a truth, and the truth is.... I liked her. The only thing I do not like in her is .... accepting her defeat by the world and cursing her fate. While leaving she expectantly looked and said, " Punnu and Puniya are in Calcutta ...can you dropped me there? " Ahhh....!! I ignored her as I could not support her needs. It has been eight hours since Anamika left but her words are still haunting me. Sadhguru ( an enlightened saint and teacher of life)  aptly says -" these people need our help with love, respect and care, but not pity at all. " Anamika thought I helped her to be blessed, but the truth is that right from my childhood I could never bear to see someone walking bare foot in the scorching heat. Today is the first time I acted on it. Anamika doesn`t know, how she helped me relieve myself of this pricking pain which I have now suffered for many years. Thank you Anamika ! Today I am feeling that my life is going in right direction. May goddess Durga bless you !

Anamika may most likely forget me, but I will always remember this experience of mine and will continue to share it all along for the rest of my life, so that we may be able to help anyone in need without the slightest of hesitation. I have never seen a mad person abort a girl child, cause a dowry death or rape someone. These mad people only harm their own selves and not anyone of their own. I don`t know how true she was, but I can understand this, that though she had childlike bright eyes, laughed and spoke openly, she was duped and thus lost her balance. Which is natural to happen.

The reason for me to illustrate the incidents of her bowing down was to elaborate and explain that everyone understands words of love and respect. Though we talked about many other things, but they seem irrelevant to the current context. What will the single person Sangya Agrawal ( Sangeeta according to Anamika) be able to achieve ? Only if all the benevolent folks decide to do something then something could be achieved. The important thing is what we can do for these people, big or small.... is not a big issue. If you have not thought about this till now, please give some time today and look at this matter in a positive way for the sake of Anamika and many more like her.

Thank you !