17.8.17

एक भारत .. आखिर कब

L.L.B. में एडमिशन लिया आज। वजह्ह... वजह्ह... वही.. जो मेरी सहेलियां मुझे स्कूल में कहतीं थीं .. संज्ञा तू बहस अच्छी करती है वकील बनना बड़ी होकर। कल ये बात सीनियर एडवोकेट कनक तिवारी अंकल ने भी कही और उनका ऑफिस ज्वॉइन करने को भी कहा तो मना नहीं कर पाई। 😇🌸❤🙏

'बड़ी होकर' .. ये शब्द मुझे सम्मोहित कर देते.. पर कक्षा दूसरी से मुझे पक्का पता था कि मुझे तो डॉक्टर बनना था। बॉटनी की उलझाऊ फैमिली, फिजिक्स के दो रेलों के बीच पीसते न्यूमेरिकल, इनऑर्गनिक चैमिस्ट्री की डरावनी मिस्ट्री से अनजान पक्की मस्तीखोर मैं .. सबसे ज्यादा साइंस ही पढ़ती थी मन लगाकर 🌸😍🌸

मैं मन में खुश होती सोचकर कि आज कक्षा आठवीं में लोगों की नज़र में मैं वकील बनने की योग्यता तो रखती हूँ कम से कम 🤗🤗🤗 मेरे पापा वकील थे और उनका अनुभव अच्छा नहीं था तो उनकी बातों का मेरे ऊपर यह इंप्रेशन था के वकील गलत आदमी को जितवा देता है और यह काम अच्छा नहीं है तो इस लाइन में नहीं जाना है भविष्य से अनजान मैं यह बात बचपन से जानती थी।

साइंस ही मिले ग्यारहवीं में इसलिये अपने स्वभाव से विपरीत मैंने खूब पढ़ाई की। नतीजतन 84% प्राप्तांक मिले जिससे बायो लेने का रास्ता खुल गया। दो एक नंबर इशारेबाजी😉  से कमाए हुए काट सकते हैं आप मेरे।

अब आगे 11वीं कक्षा में पढ़ने लगे नए नए विषय इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन उत्प्लवन ब्रायोफाइटा टेरिडोफाइटा आंत आमाशय प्लीहा मतलब ऐसे ऐसे नाम जैसे कोई बम गिरा रहा हो आपके सिर पर 😣😣😣

उफ्फ ... पर क्या करते सारे बमों को सिर पर लेकर कभी इस कोचिंग से उस कोचिंग.. कभी उस ट्यूशन सेइस  टयूशन सुबह 4:30 बजे से जो घर से निकलते रात को 8:30 बजे तक यही चलता था। घर आकर भी राहत नहीं ...कल की तैयारी ...आज का  रीविजन ....रात को 2:00 कब जाता पता नहीं चलता था।  कैसे 2 साल निकले पता नहीं चला। PMT दी तो ठीक-ठाक मार्क्स आए परंतु सिलेक्शन नहीं हुआ।

अपने सिलेक्शन ना होने का दुख इतना नहीं था जितना इस बात से आतंकित ये मन था कि हमारी थ्रू आउट टॉपर बहन [डॉक्टर संगीता अग्रवाल] 80 पर्सेंट मार्क्स लाकर भी तीसरी बार पीएमटी में फेल हो गई थी। PMT के चक्कर में हम ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन बनाने सारा दिन युगबोध लिए बैठे रहते थे। इस चक्कर में बारहवीं में प्रश्नों के उत्तर अच्छे से एक्सप्लेन करके नहीं लिख पाए और रिजल्ट हमारी गरिमा के अनुकूल ना आया। पास तो खैर हो गए थे.. 😑

खैर, बहुत मनाने पटाने पर और अपने ट्यूशन के त्रिपाठी सर के दबाव में आकर मेरी बहन ने चौथी बार PMT दी और 84 पर्सेंट लाकर भी MBBS में एडमिशन नहीं ले पाई।कारण-  क्योंकि दीदी ने डर के मारे प्रायोरिटी बीडीएस भर दी थी। उसने मुझे एक सलाह दी कि मैं तो अपने 3 साल इस एग्जाम के चक्कर में बर्बाद कर चुकी हूं तू मत कर।  तू कितने भी अच्छे परसेंट ले आए... राज अब आरक्षित वर्ग का ही है भारत में ।

हम हट गये अपने बचपन के सपने और मेहनत से दूर। माइक्रोबायोलॉजी से ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने MPPSC की तैयारी की । तैयारी बहुत मन लगाकर की । रात को 8:00 बजे से सुबह 6:00 बजे तक पढ़ना... फिर 8:00 बजे कोचिंग जाना 10:00 बजे आना ...फिर 12 से 2 पढ़ना फिर 4 से 6 पढ़ना और पढ़ना और पढ़ना और पढ़ना... । नतीजतन, पहले ही प्रयास में प्रीलिम्स निकल गई  परंतु गलत तकनीक से पढ़ाई करने की वजह से और 'एक अन्य वजह' से फिर से हम प्रतियोगिता से बाहर हो गए।

फिर क्या हुआ वह एक अलग मैटर है आज जब सालों बाद LLB में एडमिशन लेने गई तो एडमिशन फॉर्म भरते समय एकदम से ठिठक गई और गुस्से से आंखें लाल हो गईं।

फॉर्म में राष्ट्रीयता का कॉलम अलग था और जाति का अलग ...

इतनी पढ़ाई कर चुकी हूं आज तक कि बता नहीं सकती। मेरी फील्ड से जुड़े लोग जानते हैं ... यहां पसंद का विषय कुछ नहीं होता .. । आप रॉकेट साइंस भी पढ़ते हैं और भारतीय और पाश्चात्य दर्शन भी पढ़ते हैं। अमेरिका की विदेश नीति भी पढ़ते हैं और खेलों की समस्याएं भी। आप अर्जेंटीना की जनजातियां भी पढ़ते हैं और दक्षिण अफ्रीका के पहाड़ भी।  आप देश की समस्याओं पर बड़े-बड़े निबंध भी लिखते हैं और संपादकीय पर प्रकांड पंडित की तरह अपनी राय भी दे सकते हैं। इसके लिए आपको ऑफिसर बनना जरूरी नहीं है। अगर आपने ढंग से पढ़ाई की है 2 साल या 3 साल तो इतना तो आप जानते ही हैं यह तो तय है।

पर आज फॉर्म देखने बाद लगा कि हम पिछले 5000 + 70 साल से अंग्रेजी मानसिकता के अधीन हैं। कैसे कह दें जय हिंद ... जब हम आज भी केवल भारतीय ना होकर अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक हैं, अगड़े और पिछड़े हैं, हिंदू और मुसलमान है , सिख है इसाई है , मूल निवासी हैं आर्य है....  और ना जाने क्या-क्या ?? ना जाने भारत कब जागेगा ... कब पढ़ा लिखा होगा ? हमें एकता, योग्यता और समरसता की ओर बढ़ना है न कि बँटवारे की ओर।

भारत !
अब नहीं तो कब ?

31.7.17

महामृत्युंजय मंत्र - एक अनुभव 🙏

मेरे चालीसेक वर्षीय भैया कोमा में थे। चाचाजी के आँसू नहीं रुक रहे थे। भाभी और बच्चे सब परेशान ... एक ऐसी मनोदशा से गुजर रहे थे जिसे.. न लिखा जाएगा ..। मैं चाचाजी के सामने गई ही थी कि सुपर कठोर वाणी वाली चाची मेरा हाथ पकड़कर धुआँधार रोने लगीं। कैसे चुप कराऊँ उन्हें मेरे समझ नहीं आया फिर भी संयत होकर बैठी रही। चाची बोलीं " बस स्टैंड वाले पंडित जी महामृत्युंजय मंत्र का जाप बिठा रहे हैं घर में। हम तो कुछ कर नहीं सक रहे । " ....(महामृत्युंजय..!!!...... ऊँ त्र्यम्बकं वाला... ? .. ये जाप तो मैंने दुर्ग में एक बस में सुना था.... अच्छा लग रहा था बहोत्त .... )

मैंने चाचीजी का हाथ पकड़कर ढाँढस बँधाया .. "कोई बात नहीं चाची... मैं हूँ न... मैं घर में जाप करुँगी .. जितना विधी विधान से कर पाऊँ। " हमारी टूट चुकी चाचाजी की आवाज थोड़ी ठीक हुई.." हाँ बेटा... तू कर ।"

हमारे घर में एक तुलसी की माला है जो 108 मनके फेरने पर चमत्कारी ढंग से मन मैं सात्विक भाव और अक्षुण्ण शांति के भाव भर देतीहै। उसे लेकर मैं भगवान शिव को मन में धरकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगी। जाप करते करते तीसेक मनके फेरी होंगी कि लगा ...जैसे ...भैया कह रहे हैं कि .. अब मैं आराम करना चाहते हूँ। बचपन से इन्ट्यूशन तेज रहे हैं मेरे तो ....भैया को सुन भी ली और समझ भी गई .. 😔 अब वो और नहीं लड़ना चाहते थे 😑

सत्तर के करीब मनके बाकी थे। सो जाप करती रही। पता नहीं कब और कैसे विश्व के 'एकम' रूप में प्रवेश कर गई......नीरव.... शांत.... स्टिल..................

ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम ।
ऊर्वारूकमिव बंधनाय मृत्योर्मुक्षीय अमामृतात ।।

विश्व में हर पल कुछ न कुछ घट रहा है एक व्यवस्थित क्रम में। सृजन और विध्वंस ऊर्जा के एक रूप से दूसरे रूप में निरंतर परिवर्तनशील हैं। एक शांत यंत्र है यह ब्रह्मांड जिसकी उत्पत्ति और सृष्टि मंत्र/ ध्वनि पर आधारित है (ऐसा वेद पुराणों में और गुरुओं द्वारा बताया गया है)। गुरुओं ने कहा है तो सही ही होगा इस निष्कर्ष पर पहुँच गई हूँ क्यूँकि आधे रास्ते तक तो मैं केवल आज्ञाकारिता और मूढ़ता के संयोजन से पहुंची हूँ। और ... इतना अनुभव काफी है यह समझने को कि बाकि भी सही ही बताया जा रहा होगा... 👍

हे भक्तों !
दूध, शहद, जलादि शिवलिंग को ही चढ़ाएँ। अगर न चढ़ा पाएं तो भी मंत्र तो बोल ही सकते हैं मन में .. क्या परेशानी है ? 😊

 🙏🙏🙏
ऊँ नम: शिवाय 📿
🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸🌼🌸

16.6.17

फिर वही सवाल ?

आपने कोचिंग क्यों खोली आप तो ऑफिसर नहीं हो...
हमेशा की तरह वही सवाल .. आपने कोचिंग क्यों खोली आप तो ऑफिसर नहीं हो....  मैं बोर हो चुकी हूं बता बता कर कि मेरे बच्चे ऑफिसर है और ऐज़ अ टीचर... यही मेरी जॉब है ... पर वह दो औरतें कहां मानने वाली थीं...  मुझे लगा वह बहुत ज्यादा फ्रस्टेटेड थीं और इस बात से काफी परेशान थीं कि पुरुष उनसे ज्यादा मुझ पर ध्यान दे रहे थे। वह हर कोशिश कर रही थी मुझे नीचा दिखाने की.... पक पक पक पक पक पक ...दिमाग खराब हो गया था मेरा.. बस फिर मैंने मौन व्रत ले लिया और टीटी के आने का इंतजार करने लगी.... 😑😑😑

टीटी के आते ही मैंने कहा ..... प्लीज मेरी जगह चेंज कर दीजिए .... ट्रेन में बैठी दोनों सहयात्रियों ने मुझे बड़े गुस्से से घूर कर देखा और TT ने उन्हें गुस्से में देखा ...... 1 सेकंड को लगा कि मैंने गलती की ... मुझे धैर्य दिखाना था... पर जल्दी ही अपनी बीमार बेटी को लेकर मैं दूसरी जगह बैठने चली गई । यहां अच्छे लोगों का साथ मिला और मेरी बेटी भी खुश होकर बात करने लगी 🐤🐤🐤 वहाँ कॉलेज के लड़के लड़कियां थे आपस में हंसी-खुशी बात कर रहे थे और मुझसे भी टिप्स लिए गए ..पीएससी क्लियर करने के .. that's so nice ..😊😊😊 👍👍👍

कहने का मतलब यह है कि हर समय बेवकूफों को झेलना कोई जरूरी नहीं है । आप अपने बैठने की जगह भी बदल सकते है क्योंकि कुछ लोग तो सुधारने से रहे...  हम क्यों अपना समय खराब करें उनपर... 😏

 कोचिंग खोलने के बाद से ऐसी घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं मेरे साथ जिसमें औरतें मुझे बहुत बुरी तरह टारगेट करती हैं और उनके मूर्ख मित्र भी चले आते हैं मुझे नीचा दिखाने ।।।।। क्या कर सकते हैं ...कुछ नहीं कर सकते..   उस वक्त को बस बीत जाने देते हैं बस। परंतु कालांतर में देखने में आया कि वह औरतें भस्मासुर साबित हुईं और बुरी तरह बेइज्जत करके अपने ही ग्रुप से निकाल दी गयीं ।  हाँलाकि कुछ बड़ी चालाक होती हैं...  लगता है उनका बड़ा इंतजाम किया जाएगा... पर यह तो मानना पड़ेगा 'जैसी करनी वैसी भरनी' । आज नहीं तो कल, अपनी जलन अपने ही लिए भारी पड़ेगी क्योंकि अच्छे लोगों का साथ खुद ईश्वर देते हैं।

😇😇😇

हमारा पर्यावरण

घर की हौद में कमल के फूलों के बीच सुंदर सुंदर चिड़ियाँ नहातीं, फड़फड़ातीं और सावधानी से चलती हुईं पानी के कीड़े खातीं बहुत प्यारी लगती हैं। मन करता है ये यूं ही संध्याजी की तरह पंख होते तो उड़ आती रे जैसी भंगिमाएँ बनातीं रहें और हम छुपकर चुपचाप इन्हें देखते रहें। मन करता है फोटो लूँ पर हमारी कोई भी हरकत इनके सामान्य जीवन में अड़ंगा न बने सोचकर ....

इधर धूप ऐसे तेज़ होती जा रही है जैसे बच्चों ने होड़ लगा ली हो कि किसका झूला सबसे ऊपर जाएगा। कभी रायपुर, कभी चाँपा, कभी बिलासपुर ... गजब प्रेस्टीज इश्यू बन गया है जनसामान्य में कि हमारा शहर सबसे गरम था कल... पेपर में आया है .. तुम्हारा 42° होगा .. हमारा 42.5° है .. और रूको थोड़ा 45° होना भी कोई बड़ी बात नहीं है.. पर इतना बोलते वक्त रूतबा 'दुखता' में बदल जाता है।

सोचती हूँ हमारी क्यूट गौरैया का क्या होगा अगर उसके आसपास पानी न हुआ और हुआ भी तो अगर उस स्त्रोत के पास अहीर याने शिकारी हुआ तो ? हमारी अरपा नदी इनकी समस्या का हल हो सकती है .. वहाँ चिड़ियों को आसरा मिल सकता है प्राकृतिक शरणस्थली के रूप में। ओह्ह.. याद आया ... हमें पहले तो अरपाजी को बचाना होगा पर कैसे? हम तो अपने घरों में पेड़ उगाते हैं अरपा तट पर नहीं फिर पूजा भी घर में करते हैं अरपाजी की नहीं। यहाँ तक की हमने कभी अरपा को अरपाजी तक नहीं कहा.. मतलब... हम बिलासपुर की प्राण शक्ति से ही कभी नहीं जुड़े तो अब ... सहिए 46.5° ताफमान हर साल।

हमारे अहम् ने हमें हमारी संस्कृति से विमुख किया है। अहम् को स्वार्थ भी कह सकते हैं। न नदियाँ बचीं न गायें बचाइए.. न चिड़ियाँ बचेंगी न पेड़ ... और सच - सच बताऊँ ... किसी बम के मदर और फादर की जरूरत नहीं है .. हम खुदही धीमी आत्महत्या के चरम को .....

तो क्या करें.. भई... वेदों को गरियाना ही पढ़े लिखे होने का सबूत है.. समाज सुधारक होने का सबूत है .. सबने किया ये तो... । मेरी दादी कहतीं थीं कि तेरी सहेली कुएँ में कूदी तो तू भी कूदेगी क्या ? भई जब आप रिज़ल्ट देख रहे हो सामने तब भी आँख बंद किए रहोगे क्या ?  अब तो नवाचार अपनाइए ... कब तक सौ साल पुराने ट्रेंड पर चलेंगे..।  आज का ट्रैंड 'वेदों की ओर लौटो' ही है मानो या न मानो ..
एक बात और, स्नेह और देखभाल भी गंगाजल की तरह तरल और पवित्र हैं। इनका प्रयोग भी भरी गर्मी में ज़रूर करिएगा ...  सूर्यदेव का प्रकोप कम मालूम पड़ेगा  ...

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳

Queen Kangana

एक वक्त था जब मुझे कंगना रानौत सख्त नापसंद थी..
पर हुआ यह कि एक दिन youtube पर मैंने ट्रेलर देखा""' मैं अकेली घूम रही हूं...  मेरा हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं.... मैं अकेली एफिल टावर देख रही हूं मेरे साथ फोटो खींचने वाला कोई नहीं .... मेरी जिंदगी तो झंड हो गई है... और उसके बाद पीछे गाना बजता है... तूने जो पिलाई तो हंगामा हो गया ..हां हंगामा हो गया.... "

तनु वेड्स मनु मुझे कुछ खास अच्छी नहीं लगी थी हीरो पसंद है पर हीरोइन कुछ खास नहीं...

पर क्वीन का ट्रेलर देखने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाई और फिल्म देखने चली गई । एक ऐसी फिल्म जिसके हीरो हीरोइन से मुझे कोई मतलब नहीं था। मैं बस यह देखना चाहती थी कि हिरोईन अकेले हनीमून पर क्यों गई थी ?

 फिल्म शुरू हो गई.. एक साधारण लड़का स्क्रीन पर आया और इतना बुरा व्यवहार अपनी होने वाली पत्नी के साथ किया कि हॉल में बैठी हुई लड़कियां क्या लड़के तक सन्न रह गए। हम सर खुजलाने लगे कि फिल्म तो खत्म हो गई अब यह दिखाएगा क्या ?

इसके बाद फिल्म शुरू होती है पेरिस में ... जहां कंगना को बहुत अच्छे दोस्त मिलते हैं... लड़के हो या लड़कियां ... देश कोई भी हो... रंग कोई भी हो.. होते सब इंसान हैं। एक अजीब सी जर्नी कंगना की शुरू होती है जहां अनजान लोग उस का हौसला बन जाते हैं और उसे पूरी तरह रियल पर्सन बना देते हैं।

फिल्म में कंगना का नाम रानी था जो शुरू में अजीब लगता है..  परंतु फिल्म खत्म होने के बाद .. आज तक..  मुझे कंगना Queen ही लगी हैं। उसके बाद आई तनु वेड्स मनु पार्ट 2 ... अच्छी फिल्म थी हीरो तो पसंद है ही .. पर इस बार हीरोइन भी अच्छी लगी even ज्यादा अच्छी लगीं।

उत्तराखंड के लोग दिल के सरल होते ऐसा मेरा इलाहाबाद के हॉस्टल का अनुभव है । कंगना को भी छल कपट पूर्ण व्यवहार करते नहीं देखा। हमेशा यही पढ़ा कि उनका मजाक उड़ाया जाता है , उनकी बहन रंगोली पर एसिड अटैक हुआ और उसके बाद ताजा प्रकरण ऋतिक विवाद हो गया।

कंगना हमेशा अपने बोल्ड अवतार में सामने आती है इन सब विवादों को अपने क्लियर कट अंदाज में उन्होंने निपटाया जिसकी वजह से वे लड़कियों की रोल मॉडल बन गई।

इस बीच अचानक हालाकि मैं पढ़ती नहीं हूं परंतु भास्कर में है कोई नाम याद नहीं आ रहा... और इंफेक्ट ...चौरसिया जी.. हां.. मैं उनका नाम याद करना भी नहीं चाहती थी.... चलिए अब याद आ गया ...उन्होंने लिखा के रितिक कितने महान परिवार के हैं और कंगना की औकात ही क्या है ...कभी इसके साथ रही कभी उसके साथ रही... स्टेशन में सोई... मुझे बहुत बुरा लगा। उन्होंने ऋतिक के बचाव के लिए कंगना की इज्जत की वह धज्जियाँ उडा़ईं ..   कि पूछिए नहीं । एक कलेक्टर की पोती जो अपने दम पर अकेले खड़ी होती है बिना किसी पुरुष का नाम लिए तो उसको कोई कुछ भी बोल सकता है ... और जब वह ऐसा बोल रहा होता है यह भूल जाता है कि इज्ज़त बोलने वाले की उतरी। कंगना तो हमारे लिए क्वीन है और रहेंगी।

कल अचानक फिर नजर पड़ गई पेपर पर जिसमे चौरसियाजी ने नरगिस की माताजी के संघर्ष को बड़े अच्छे से बताया । क्यों... डरते हो संजय दत्त से... कंगना के बारे मे लिखते समय नहीं  ध्यान आया  यह कंगना का संघर्ष था क्योंकि आपको कंगना का डर नहीं है। यही सोच है भारतीय पुरुषों की ...ऋतिक हों.. चौरसिया हो ...असफल बेटे के बाप शेखर सुमन हो .. सफल करण जोहर .. सब चिढ़े हुए अटैकिंग लोग.

कंगन कभी बदलेंगीं भी नहीं..  क्यों कि उन्होंने यह छोटा सा मुकाम अपने दम पर हासिल किया है। कंगना आप हमारे दिल में हो इज्जत से हो और हमेशा रहोगी।

शेखर सुमनजी आसमान पर मत थूकिए और अपने बेटे की असफलता अब पचाइए... क्यों अपनी हँसी उड़वा रहे हैं...