28.3.18

एक पत्र का अवसान (९)


धावक की अगली टाँगे ज़मीन से टकराते ही ज़मीन में एक बड़ा दरवाज़ा खुला और अंधेरी सुरंग में दौड़ते हुए धावक आगे बढ़ने लगा। तेज़ी से टापों की आवाज़ सुरंग को और भयंकर बना रही थी। इस लंबी अंधेरी सुरंग से अनेक रास्ते निकल रहे थे... दाएँ हाथ पर सत्रहवें मोड़ पर ठाकुर जी ने लगाम खींची... ज़ोर से दौड़ते धावक के पैर हवा में उछले.. और उसने दायीं ओर छलांग लगाई..।

धावक दौड़ते-दौड़ते दौड़ता एक सुरंग से बाहर निकला जहां हल्के हरे रंग की घास थी और गगनचुंबी पेड़ .. आसमान को छूने का प्रयास कर रहे थे... यहां पेड़ों पर चढ़ती गिलहरियां खरगोश जितनी बड़ी और चीटियां पीले रंग की थी। कुछ फूल इंसान के चेहरे जितने बड़े और गहरे लाल रंग के थे। जगह जगह सफेद फूलों की लताएं पेड़ों को सुंदरता से सजाएं थीं।

धावक जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था ... पानी का शोर सुनाई पड़ रहा था...। ठाकुर जी को देखकर बकरे से मुंह वाला हिरण ठिठक जाता है कुछ देर तक ठाकुर जी को ध्यान से देखता है और दौड़ता हुआ एक गुफा की ओर चला जाता हैं। संभवतः वह किसी समाचार को सुनाने की तत्परता में था।

धावक को थपथपाते हुए ठाकुर जी कहते हैं,

" सोमल आता ही होगा... उसे हमारे आने का समाचार मिल गया होगा "

" सोमल ने दिव्यांगना को बताया होगा हमारे आने का प्रयोजन .. " आश्चर्य से धावक ने पूछा

" पता नहीं परन्तु बताना तो चाहिए " धावक को फिर से थपकाते हुए ठाकुर जी ने लगाम खीचा और तेजी से झरने की ओर निकल पड़े..।

सुंदर मायावी स्थान पर झरना बहुत विशाल  था ... झरने सेेे आता शोर इतना प्रचंड था कि लगता था कि जैसे किसी बड़े पहाड़ को ढूंढते हुए हाथियों का झुंड दौड़ा जा रहा है। झरने के २० फीट दूर तक पानी की बड़ी - बड़ी बूँदें चेहरे पर ऐसे थपेड़े मार रहीं थीं कि सामान्य मनुष्य तो अपने अश्व पर से संतुलन खोकर गिर ही जाए परंतु ठाकुर जी और धावक का कहना ही क्या.. !!!  वे दोनों पराक्रमी वीर अधिक तीव्रगति से गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रहे थे कि अचानक् सामने से ..............

                                                                       (क्रमशः)

#संज्ञा_पद्मबोध ©

आज का विमर्श :-
दृढ़ प्रण बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना करने का साहस देता है फिर क्या पशु और क्या मनुष्य ।

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27.3.18

एक पत्र का अवसान (८)


कोई हास परिहास नहीं है डेढ़ सौ फीट गहरी खाई में छलांग लगाना...।  पर वाह रे धावक और वाह रे ठाकुर जी.... एक पल को भी इनकी आँख न झपकी ... सांसें थामें जबड़ा भींचे ... दोनों कूद पड़े पाताल में...। नीचे जाते धावक और ठाकुर के कानों में चिंघाड़ती हवा जैसे अनिष्ट का संकेत कर रही थी.... पर धावक के फैले नथूने.... और तीव्र बुद्धि उन हवाओं की इस चाल से ज़रा भी विचलित न थे.... वो तो एकाग्र हो अपने लक्ष्य की ओर देख रहे थे...।

छोटी ठकुराइन रसोई में भोजन की तैयारियाँ ज़ोरों से कर रहीं थीं और उन्हें प्रतिक्षा थी दीनू की... , वे मन ही मन सोच रहीं थीं...( न जाने कहाँ मर गया है... जब काम हो .. ये लोग दिखाई नहीं देते...अब इस बाल बुझक्कड़ कौसल (कोसू) से मैं क्या-क्या काम करवाऊँ ? कचरिन को भी अभी मौत आनी थी... झूठी कहीं की.. पड़ी होगी घर में आराम से ... बुखार हो गया है ठकुराइन.... झूठ बोला है उसका झुमकू.... अरे वही रुक जाता.... नहीं.... माँ की सेवा करूंगा ठकुराइन.... बड़ा आया सेवा करने वाला... ) इतना सोचते-सोचते ठकुराइन को अपनी भलमनसाहत पर स्वयं ही रोना आ जाता है।

हड़बडाहट और बड़बड़ाहट में ठकुराइन का पैर ताँबे के गंज से टकरा जाता है... एक ज़ोर की आवाज़ आती है रसोई से जो बड़ी ठकुराइन के कमरे तक पहुंच जाती है..... बड़ी ठकुराइन स्थिति की गंभीरता पर मनोविनोद कर चुपचाप हंसती हुई राम नाम की माला फेरतीं जाती हैं।

दीनू इस समय ठकुराइन की मानसिक व्याकुलता से अनभिज्ञ अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए एक नहर बनाने में लगा हुआ है। सहसा उसे मन में बरतन पटकने की ध्वनि सुनाई दी पर दीनू ने उसे मन का वहम समझकर अनसुना कर दिया। नदी के पा मिट्टी गीली होती है अतः कुदाल और फावड़े से जल्दी काम हो रहा है कि इतने में नारायण आ गया। बड़ी तेजी से उसने कुछ अपने हाथ से निकालकर दीनू की ओर बढ़ाया परन्तु गीली मिट्टी में फिसलकर दीनू को टक्कर दे मारी और उसी के ऊपर गिर गया... और सारा मही पकौड़े भी... दीनू के सिर का श्रृंगार बन गए।

" क्यों रे ! क्यों हो तुम ऐसे हड़बड़िए ? "

" मैं नहीं... तुम हो गड़बड़िए... इतने प्यार से दौड़े-दौड़े मही पकौड़े लाए और तुम ... सीधे खड़े भी न रह सके... किस काम का कूल्हा तुम्हारा जो हमारी एक ठोकर न सह सका...😂😂😂 "

दीनू के पास इस प्रश्न का उत्तर न था सो वो सिर से ही हाथ पोंछकर मही पकौड़े खाने लगा.....

इस दृश्य को देखकर हीरा को भी हंसी आ गई और वह दुम हिलाता दौड़कर दीनू के पास आ गया मही पकौड़े खाने...

[मतलब .... आपको विश्वास नहीं है मेरी बात का... तो हीरा की ज़ोर ज़ोर से हिलती पूँछ ही देख लीजिए... जबड़ा खुला और होंठ कान के कोर छूते .. साफ बता रहे हैं कि वो भी खूब हँस रहा था। ऊपर से पकौड़े देखकर टपकती लार ... 😂😂 ]

" दीनू ... कब तक तेरी नहर रानी लहराती खेतों तक पहुंच जाएगी कोई अनुमान.. "

" पहुंच तो आधे पहर में जाए पर .... मिट्टी बहुत चिकनी हो गई है यहाँ.. बार-बार गिर जाते हैं.. फिर उठते हैं.. फिर गिर जाते हैं... 😂😂😂 "

" 😂😂😂😂 "

ठाकुर जी से बेखबर... सब कुशलमंगल है यहाँ....... /


                                                                       (क्रमशः)

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आज का विमर्श -
मित्रता की नोंकझोंक और हास परिहास शारीरिक और मानसिक तनाव कम कर देते हैं।

26.3.18

🍃 एक पत्र का अवसान (७) 🍃


ठाकुर दामोदर प्रताप सिंह तैयार होकर अपने गांव की दशा देखने निकलने वाले हैं। काले रंग की शेरवानी और सफेद पैजामा पहनकर.. वे पगड़ी अपने सर पर बड़े करीने से रख रहे हैं। ठाकुर साहब अपनी खानदानी तलवार ले जाना कभी नहीं भूलते क्योंकि यह नक्काशीदार भारी तलवार उनके रौब में चार चाँद लगा देती है।

ठाकुर साहब की मनपसंद छाछ और लिट्टी चोखा बड़ी ठकुराइन ने बनवा दिया है। अपने बेटे को गरम-गरम नाश्ता परोसकर उन्हें आत्मिक शांति मिलती है। चौके में अपने पुत्र को देख मन ही मन अपने पति को याद करती रहती हैं तो.. कभी ठाकुर जी से बोल भी पड़ती हैं ..

" बिल्कुल .. अपने पिताजी...  के जैसे हो .. "

यह कहते ही बड़ी ठकुराइन की आँखों के कोर कुछ नम हो जाते और वे सिर दूसरी तरफ घुमाकर पलकें झुकाती हुईं... पल्लू से चेहरा छुपा लेती हैं। वहीं ठाकुर जी भी पलकें झुकाकर क्रोध से लाल अपनी आंखों को छुपा लेते हैं ताकि माँ के मन की शाँति भंग न हो।

छोटी ठकुराइन कुलवंती देवी वातावरण हल्का करने के लिए कुछ और चीज़ें खाने की परोसने लगती हैं परंतु इस विचित्र दुखदायी स्थिति में स्वयं पर नियंत्रण रखने के लिए पैरों की अंगुलियों को अंदर की ओर सप्रयास मोड़ती हैं। पर आँखों के क्रोध और दुख को ठाकुर जी से छुपा नहीं पाती हैं।

आज ठाकुर जी अपने अश्व पर बैठकर संभावित लगान का अनुमान लगाने निकले हैं पर मन क्रोध और विचार कुटिलता से भरे हैं। वे तेज गति से घोड़ा दौड़ा रहे हैं और उससे भी द्रुतगति और गहन भाव से अपने पूर्व मित्र और पड़ोसी ठाकुर शैलेन्द्र प्रताप सिंह से प्रतिशोध लेने को उतावले हो मन में सोच रहे हैं..

" माँ ! मैं कुछ भूला नहीं हूँ .. बस्स.... सही अवसर की प्रतिक्षा में हूँ....।"

ठाकुर जी के मनोभावों से परिचित उनका अश्व 'धावक' ज़ोर से हिनहिनाता अपनी पूरी शक्ति से और तेज़ से दौड़ता है और रुदमति नदी से लगी पूरन घाटी में ज़ोर से छलांग लगा कूद जाता है...।

                                                                        (क्रमशः)

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आज का विमर्श :-
अतीत के घाव परिवारों को ऊपर से शाँत और अंदर से शक्तिशाली बना देते हैं।

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25.3.18

एक पत्र का अवसान (६)

बिहार में एक गांव है बिसाख .. जोकि रुदमती नदी के किनारे स्थित है। जनश्रुति है कि एक बार शिव और माता पार्वती यहाँ मिले थे अत: गांव का नाम बिसाख (विशाखा) और नदी का नाम रुदमति (रूद्र देव) पड़ा। यह जगह ठाकुर दामोदर प्रताप सिंह और उनके परिवार के दरबार के लिए विख्यात है.. या कहें.. कुख्यात है।

ठाकुर दामोदर प्रताप सिंह के तीन पुत्र हैं - ठाकुर रघुबर प्रताप सिंह, ठाकुर नरहरि प्रताप सिंह और ठाकुर बलदेव प्रताप सिंह। ये तीनों पुत्र अपने सज्जन पिता की छत्रछाया से विरक्त रहने वाले उद्दंड नवयुवक हैं जिनके अत्याचार से बीर गांव के लोग सदैव आतंकित रहते हैं।

ठाकुर दामोदर प्रताप सिंह की भार्या कुलवंती देवी सिंह ठाकुर बेहद शालीन और ममतामयी स्त्री हैं परंतु इनकी ममेरी बहन जो अनाथ हो गई थी और समझ लीजिए कि दहेज में इनके साथ बिसाख आ गई है... न केवल कलही है अपितु ठाकुर जी के पुत्रों को बिगाड़ने में अपनी मुख्य भूमिका निभाती है।

इन्हें शकुनि और मंथरा का मानसिक मेल माना जाता है। अपनी बहन के प्रेम का कैसे दुरुपयोग किया जाता है गांव के लोग यही बातें करते हैं शकुन के बारे में। शकुन सुंदर तो हैं परंतु मन में क्लेश काजल की तरह चिपका रहता है और जब तक यह गांव वालों का रोना गिड़गिड़ाना न सुन लें इनके मन में संतोष का भाव नहीं आता है।

ठाकुर दामोदर प्रताप सिंह की खेती पूरे गांव में फैली है और सभी खेत ठाकुर जी को तय समय पर लगान देते रहते हैं। ठाकुर जी की हवेली किसी महल से कम नहीं है ... बीच में एकाध एकड़ का चबूतरा है ... निस्तार और पीने के पानी के लिए हवेली के अंदर ही बीस फीट गहरा कुँआ भी है ... दो तरफ कमरे हैं ... एक तरफ रसोई और शौचालय और गायों की गौशाला है जहाँ बेहद ह्रष्टपुष्ट बीस गाये और उनके बछड़े रहते हैं। इस पूरी महलनुमा हवेली को एक बड़ी मजबूत दीवार से घेरा गया है जिससे यह हवेली किसी महल सा आभास देती है।

ठाकुर जी की हवेली से सबसे करीब पूर्व दिशा की ओर दीनानाथ के पिता कल्याण की खेती बाड़ी है। कल्याण ठाकुर जी का सबसे पुराना विश्वस्त है। ठाकुर जी के आँखों के संकेत भर की देर है और कल्याण पूरी बात समझ भी लेता है और गांव वालों को समझा भी देता है। उसकी बदले में ठाकुर जी से कल्याण की बस यही आशा है कि वे दीनू पर अपनी कृपा बनाए रखें।

                                                                     (क्रमशः)

#संज्ञा_पद्मबोध

23.3.18

एक पत्र का अवसान (५)

दीनानाथ अपनी कलाइयों सी पतली जंघा पर काँपते हाथ से सहारा लेकर 'आह्' की आवाज़ करता खड़े होता है। धीमे-धीमे आगे बढ़ते कदम हल्के सूखे गोबर पर कब पड़ते हैं .. कमज़ोर दृष्टि के दीनानाथ को पता भी नहीं चलता है... और यहाँ से हमारा जीर्ण शीर्ण पत्र दीनानाथ के शरीर के बोझ तले दबे...  चला जाता है अपने जीवन के अगले पड़ाव पर।

जैसे-जैसे गौतम का अरण्य दूर होता जा रहा है दीनानाथ को अपना शरीर बोझिल मालूम पड़ रहा है। क्या है जो घट रहा है जिसके कारण शरीर भारी हो रहा है.. शरीर के रोम-रोम में कष्ट सुई की भांति चुभ रहे हैं समझा नहीं जा सकता है।

पर हमारे जीर्ण शीर्ण पत्र को तो पर्णकुटीर में चारपाई में जा बैठा  दीनू उतना ही भारी लग रहा है जितना वह बोधगया के अरण्य में था। मन की व्यथा यह पत्र क्या जाने ... !!!

दीनू को थका हारा देख अहाते में खड़ी धेनु व्याकुल हो गई है परंतु क्या कर सकती है वह... दीनू की पत्नी अंबाला तो ...... है नहीं दीनू की सेवा सुश्रुषा करने... । यही कारण दीनानाथ को दिन रात खाए जाता है पर वह अपनी विवशता कैसे कहे ?

दीनू अपनी पादुका पहने ही चारपाई पर निढाल हो जाता है..। धेनु दूर खड़ी और व्याकुल हो उठती है अपनी माँ सी अंबाला को याद कर। क्या करे वह कि अंबाला को उस पीड़ा से मुक्ति दिला सके... यह सोच वह ज़ोर से रंभाने लगती है .. परंतु दीनू ह्रदय की गहराइयों तक पीड़ासिक्त हो ... नीरव अश्रु बहाकर चुपचाप करवट बदल देता है।

                                                                       (क्रमशः)

#संज्ञा_पद्मबोध ©