20.2.17

मेहनत क विकल्प नहीं

"मैम ! पहला पेपर आप सेट किए थे क्या .. वही पूछा है जो आप पढ़ाए  थे । मैम आप पढ़ाओगे तो रुकूंगा.. नहीं तो जा रहा हूं गांव वापस।" पिछले साल भी यही कहा था कि आप पढ़ाओगे तो रुकूंगा नहीं तो मैं जा रहा हूं वापस। पर.....

कोचिंग में अच्छी खासी क्लास चल रही थी कि इसी बीच अंकित श्रीवास्तव और टीना डाबी प्रकरण हो गया। मैंने अंकित का ज़ोरदार तरीके से पक्ष लिया और जिससे लगभग पूरी क्लास ज़बरदस्त मेरे खिलाफ हो गई। मुझे whatsapp पर और facebook पर खुलेआम बदनाम किया गया और अत्यंत कटु वचन सुनाए गए। बहुत बुरा समय था वह क्योंकि ना केवल इससे मेरे आर्थिक हितों का नुकसान हो रहा था बल्कि मेरी इंटीग्रिटी पर प्रश्न उठाए जा रहे थे जो कि एक ईमानदार इंसान होने के कारण मेरी बर्दाश्त के बाहर थे। *
 
पर मैं कहां मानने वाली थी ...जिद्दी की जिद्दी। मैंने साफ कर दिया था कि आरक्षण से सफलता लेना मेरे यहां नहीं चलेगा। आपको पढ़ना पड़ेगा। याद करके आना पड़ेगा । नहीं तो.. बाहर खड़े करवा दूंगी कान पकड़कर सबके सामने । सब देखेंगे और हंसेंगे कि यह हैं होने वाले ऑफिसर ।

क्लास में रोना-धोना मच गया । "नहीं मैम माफ़ कर दीजिए ..10 मिनट दे दीजिए ..याद करके बताते हैं। "  3 दिन यह प्रक्रम चला उसके बाद बच्चे खुद याद करके आने लगे। उस समय संविधान की क्लास चल रही थी और संयोग देखिए कि उन तीन दिनों में जो प्रिपरेशन कराई गई थी वही प्रश्न कल आयोग ने पूछ लिया। हाहाहा....

मैं मन ही मन सोचती थी कि ना तो मेरी ईमानदारी कम होती है ना मेरा तेवर कम होता है । कर चुकी मैं तो कोचिंग का बिज़नस । अब यह लोग बाहर जाते ही मेरी वो बुराई करेंगे कि एक बच्चा ना आने वाला । पर अंदर ही अंदर एक आवाज कहती "ईमानदारी तो नहीं छोडूंगी । एक दिन इनके जीवन में ऐसा आएगा जब यह महसूस करेंगे कि किसी ईमानदार से पाला पड़ा था ...कोई तो ईमानदार इनके जीवन में आया था । " पर आर्थिक कारणों से 3 दिन बाद मुझे थोड़ा शांत होना पड़ा जिसका असर बच्चों के चेहरे के हाव भाव में दिख रहा था । वह सर नीचे करके मुस्कुराते थे कि मैं ठीक से डांट नहीं पा रही हूँ। तो इस प्रकार मैंने बैलेंस बनाया ईमानदारी और अपने काम के बीच।

दरअसल , आरक्षण के लिए लोगों का नजरिया और ज्ञान दोनों ही सही नहीं है।  इस पर एक वीडियो डालूंगी जल्दी ही।आशा करती हूं इस बार बिना किसी पूर्वाग्रह के आप मेरी बात सुनेंगे और समझेंगे। गलती ना अंकित श्रीवास्तव की है ना टीना डाबी की । हमें दोनों को समझना होगा तभी बनेगा एक अच्छा भारत...  है ना.... 🇮🇳
 टेक केयर😊
【* उस समय मनीषा दहारिया, शाहिद अहमद , कुणाल शर्मा और प्रशांत रंजन ने मेरा साथ दिया था जिसको मैं कभी नहीं भूल सकती। यही वह वक्त था जिसने मुझे अच्छे से समझाया कि जाति और धर्म से ऊपर इंसान होता है । थैंक्स मनीषा.... आई लव यू ❤ अब कोई कितनी भी कोशिश करें आपस में बैर उत्पन्न करने की ... मेरी तरफ से तो उसे कभी सफलता नहीं मिलेगी।】

14.2.17

Hi mam !

कुछ चार-छह महिने पहले मिली थी उससे..
" Hi mam "
Confident, smiling n smart girl ... ऑफिस के सारे फै़सले वही लेती थी.. क्या लाना, कितने का लाना, स्टूडेंट्स को जानकारियाँ देना सब। जॉब लगने के पहले से ही सब कलीयर कर लीं मैडम... सैलरी, छुट्टी, काम आदि। पर हमारे बीच कुछ अजीब रिश्ता रहा। वो हर बात पर बहस करे और मुझे खीझ हो। पर मैं उसे नादान समझकर लंबेsss - लंबे explanations देकर समझाती थी। परंतु मैडम के कटु वचनों में कभी कमी न आई । ऊपर से नाटक देखो... जब आधे घंटे बाद भी मुझे गुस्सा न दिला पाती तो ऐसे प्यार और सम्मान से बोलती कि पूछिए मत। खैर, मैडम की तबियत खराब रहने के कारण उन्होंने जॉब छोड़ दी।

आज दो महिने बाद मैं उससे फिर मिली तो पहचान ही नहीं पाई... एकदम दुबली हताश। मैं बोल पड़ी " मैंने तो पहचाना ही नहीं तुम्हें ?" तो उसने बताया कि arthritis हो गया है। हाथ मुड़ गए हैं। फिर आदतन धाराप्रवाह बोलने लगी... "मैंने आपको बहुत दुख दिया और बुरा-भला कहा। मुझे लगता है ये उसी की सजा है। " मैंने कहा "नहीं बच्चे नासमझ होते हैं। उनकी बात बुरी नहीं लगती, ऐसा मत सोचो। मैं नाराज़ थी पर उतनी नहीं जैसा तुम सोच रही हो। भगवान करे तुम एकदम भली चंगी हो जाओ" कहकर मैंने उसकी पीठ थपथपाई। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ ऐसी पश्चाताप भरी आँखों से मुझे देखा कि क्या बताऊँ।

मुझे हंसी आ गई उसके वहम पर। बड़े-बड़े कलंतरी मजे से घूम रहे हैं और ये बच्ची... पागल...
काश ! सब इतने मासूम होते 😊😊😊

खैर, अभी मै नेट पर इस बिमारी का बचाव ढूँढ रही थी क्योंकि इसका कोई पक्का ईलाज नहीं है तो पता चला कि धूम्रपान, शराब, सोडा, नमक, शक्कर, वसा सबसे बचें। इतना पढ़ते ही मेरी भी जीने की इच्छा मर गई।
😂😂😂

Well, I know she is a fighter. वो फिर चहकती ऑफिस आएगी और फुल smile से बोलेगी ..." Hi mam ! "

God bless dear ... 😇
Sharing clip of ur whatsapp msg here ... Which v shared 2day with each other... 😊

Happy Valentine's Day all ☺☺☺

10.2.17

मेरे रोल मॉडल

सोचिये कैसा लगेगा जब आपका फोन बजे और स्क्रीन में आपके रोल मॉडल का नाम फ्लेश हो और ऊपर से ये भी कि कल आपको उनसे मिलने का मौका भी मिलने वाला हो ......

Place - Commissioner Office,
               Bilaspur, CG
Date - 25/01/2016
Time - 09.30 am

Calm n serene atmosphere in office compund. सुंदर बगीचा, ठंडी हवा.... पर सर कहाँ मिलेंगे तो पता नहीं था न ... सो हम गलत तरफ चले गए। सामने कोई नहीं दिखा तो ससंकोच अंदर गए। दो कमरे बाद एक जनाब typing करते मिले। उनसे पुछा " बोरा सर कहाँ मिलेंगे? " बंदा typical simple n sober Indian type था। सादगी से बोला " उस तरफ "। हमारे कुछ समझ न आया । हमने फिर पुछा "किधर?" बाबू फिर खुद हमें रास्ता बताने बाहर तक आ गए। सुंदर गार्डन से गुजरते हुए हम main area में पहुँचे। वहाँ एक अधेड़ उम्र के प्यून से पुछा " सर से मिलना है। कहाँ जाएँ?" उन्होंने हमें सर के ऑफिस के बाजू में बने प्रतीक्षा कक्ष में बैठने की सलाह दी।
प्रतीक्षालय में एक सज्जन प्रतीक्षारत् व्याकुल से बैठे हुए मिले। हमें देखते ही आतुरता से पूछे " आप भी अपना transfer रुकवाने आईं हैं?" हमने थोड़ा सामान्य दिखने का प्रयास करते हुए खुशी छुपाकर कहा " नहीं। सर ने बुलाया है। 26 जनवरी को हमारा सम्मान करना चाहते हैं। " उन्होंने सपाट भाव से पूछा " क्यों?" हमने भी सपाट कह दिया "हमारी कोचिंग के लिए।"
इसी तरह बात करते-करते करीब पौना घंटे घड़ी की सुई आगे बढ़ गई और हम दोनों बार-बार सर के केबिन को निहारते बतियाते रहे। ( ये वाली गप्पें बाद में कभी)
कुछ समय बाद सर की गाड़ी सुंदर से सोने के रंग से रंगे चौखंबों के बीच आकर रुकी कि वातावरण में जान आ गई। पता नहीं कौन-कौन महानुभाव कहाँ - कहाँ से अचानक प्रकट हुए और सर की अगवानी को दौड़ पड़े। हमें बड़ा अजीब लगा ये सब। साफ-सुथरे सुसंस्कृत पढ़े-लिखे विनम्र बाअदब मुस्कुराते हुए एक बाबू गाड़ी का दरवाजा खोलते हैं। और गाड़ी से हमारे well  नहीं नहीं  very well maintained बोरा सर पूरी गर्मजोशी से बाहर आते हैं।
Wow !!! Wat an aura he created that time was beyond my imagination.
😇

सर ऑफिस में दाखिल होते हुए सजगता से जल्दबाजी में प्यून बाबू से पूछते हैं "ऑफिस साफ है अच्छे से!" ये उनकी आदत है या मेहमानों के लिए सतर्कता पता नहीं परन्तु जवाब "हाँ" में पाकर उन्होंने प्रतीक्षालय में हम दोनों प्रतीक्षारतों की ओर देखा। शिक्षाकर्मीजी तुरंत झुककर सर का अभिवादन किए। और हम ... चुपचाप बैठे रहकर ये छुपा ले गए कि हम तो सर को देखते ही रह गए। सर ऑफिस के अंदर चले गए। पता नहीं क्या सोचे होंगे कि कितनी अकड़ू है ये। बैठी रही । पर हमें लगता है कि भारत मे स्त्रियाँ न किसी से हाथ मिलाती हैं न उठकर अभिवादन करती हैं।  इसमें अशिष्टता नहीं है।

सर पहले transfer वाला मामला निपटाना चाहते थे सो पहले हमारा नंबर न आया। दो मिनट बाद हमारा नंबर आया। हम एक बड़े से सुंदर ऑफिस में दाखिल हुए। सर से नमस्ते की और सामने की पंक्ति वाली कुर्सी में बैठ गए। सर ने पूछा " संज्ञा.. आप अपना बायोडाटा लाईं हैं, हमारे रेकॉर्ड में लगेगा। " हमने हाँ सर कहा और बायोडाटा सर को सौंप दिया। जब तक सर बायोडाटा पढ़ रहे थे हम उनके ऑफिस वो तमाम तस्वीरें खोज रहे थे जिनको हमने फेसबुक में देखा था... पूर्व पी.एम. मनमोहन सिंह पुरुस्कार देते हुए, सर की विदेश की मीटिंग्स की पिक्... पर कुछ न दिखा। जहाँ तक याद आ रहा है सर की माताजी की एक अति स्नेहपूर्ण तस्वीर थी। इतने में सर ने बाहर इंतजार कर रहे कुछ और लोगों को भी अंदर भेजने को कहा। एक वृद्ध महिला प्रथम दो अन्य कन्याओं के साथ अंदर आईं जो बाहर बगीचे में अपनी बारी का इंतजार कर रहीं थीं। वे सब पीछे वाली पंक्ति की कुर्सियों में बैठ गईं। उन बुजुर्ग महिला ने भी सर को बायोडाटा दिया। हमें तो वो बुक लगा। सर उनके बायोडाटा को पढ़ ही रहे थे कि एक बुजुर्ग महिला द्वितीय अपने पति के साथ तमतमाते हुए अंदर आईं और आते ही सर की कुर्सी वाले जोन में जाकर सर की क्लास लेनी शुरु कर दीं एकदम नारेबाजी वाले अंदाज में... "हमने NGT से बात की है....अरपा की उत्पत्ती की जगह बेजा कब्जा कर लिया है...." सर ने शांति से कहा " मैंने खुद वहाँ एक बोर्ड लगवाया है " .. महिला थोड़ा पीछे हुईं "हाँ .. है तो बोर्ड" फिर आगे की ओर लपकीं... तब तब उनके श्रीमानजी और पीछे बैठकर "हाँ-हाँ"  का हुँकारा दिए जा रहे थे बीच बीच में ...महिलाजी द्वितीय पुन: फरमाईं... फरमाईं क्या .. क्लास लेने लगीं " वहाँ बेजा कब्जा हो गया है ... अरपा के उद्गम को बाधित किया जा रहा है। " सर ने तुरंत संबंधित अधिकारी को फोन लगाकर वस्तुस्थिती पूछी। वहाँ से भी जवाब मिला कि ऐसा कुछ नहीं है। जो जगह दूसरी आंटीजी बता रही थीं उसे अरपा का उद्गम माना ही नहीं जाता। बस इतना सर का कहना था कि वो और नाराज हो गईं। "मै यहाँ की पहली महिला प्रिंसीपल हूँ। भूगोल मेरा विषय है। मेरे कॉलेज से इतने IAS निकले हैं.....आदि आदि। " और बीच बीच में हाँ हाँ की हुँकारी ....
सर ने उनसे कहा आपको हम सम्मानित करना चाहते हैं इसलिए बुलाया है। वो थोड़ा ठिठक गईं। सम्मानित?
बताइए उनको पता ही नहीं था। फिर भी ...वो जारी रहीं ...और मेरे कुछ समझ न आया infact कई बार उनके प्रश्न और तरीका हास्यास्पद और objectionable भी लगा।

इधर आंटी द्वितीय कुछ शांत सी हुईं ही थीं कि एक वृद्ध अंकल आए। वे सर से पहले भी मिल चुके थे। उनकी पैंशन किसी सक्षम अधिकारी ने घूस की लालच में अटका दी थी। सर ने कहा "अंकल, आप लिखित शिकायत दे दीजिए। उस अधिकारी की बहुत शिकायत आ रही है। हम तत्काल उस पर कार्यवाही करेंगे।"  अंकल प्रसन्न होकर चले गए। सर ने फिर हम सबका परिचय आपस में कराया।
आंटी प्रथम दिव्यांगों की एक संस्था अपनी इन दोनों सहयोगियों के साथ चलाती थीं। wow....
आंटी द्वितीय तो अपना परिचय खुद दे चुकी थीं।
अंत में मेरा परिचय देते हुए सर ने कहा " इनको देखिए... इतनी कम उम्र में इनकी अपनी खुद की खड़ी की IAS Academy है। इनसे सीखिए और नए बच्चों को सामने लाईए। very impressive bio data ... " इतना सर ने कहा कि आंटीजी दोनों कन्याओं को लेकर सामने बैठने आ गईं। कन्या प्रथम ने पूछा " हम चाहते हैं ये बच्चे IAS बनें। आप सुझाव दें। " हमने इस अनोखे खूबसूरत सपने को पूरा करवाने में अपनी असमर्थता जता दी। भविष्य की संभावनाओं को हालाँकि कोई नहीं जानता है।
इस प्रकार सर के साथ मीटिंग समाप्त हुई। हम सब बाहर आए। मैंने दोनों आंटियों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। आंटी द्वितीय से कुछ और भी बाते हुईं । वे अपने संस्थान में मुझे एक लेक्चर के लिए बुलाना चाहती थीं।

मैंऑफिस से निकलते हुए सोच रही थी...
Officer तो बहुत हैं पर Role Model वो बनता है जो विनम्र हो और जनता की परेशानियों को दूर करे । भई हमें तो गर्व है अपने रोल मॉडल बोरा सर पर ।

अब फिर ये सवाल कि रोल मॉडल के जैसी खुद क्यों नही बनी तो इसका जवाब Sonmoni Borah Ias  सर के शब्दों में देंगे फिर कभी।

- संज्ञा अग्रवाल
भारत की प्रथम महिला IAS Academy संचालिका
स्वयं के प्रयासों के द्वारा

शरणार्थी

भारत किसका है, असल में हकदार कौन है यह प्रश्न आज मन में आया। अंतर्मन में संग्रहित तमाम सूचनाआओं का मनचित्र ललाट के डेढ़ इंच दूर प्रोजेक्टर की भांति चलने लगा। निश्चित ही सूक्ष्म शरीर जागृत हो सक्रिय हो गया। छठवीं कक्षा की मानव का विकास क्रम वाली छवि जिसमें सबसे पहले उभरी। कॉर्डेट्स (मत्स्य)से लेकर ड्रायोपिथीकस जो कपिरूप के अधिक निकट था और रामापिथेकस जो मानवरूप के निकट था से लेकर बुद्धिमान मानव होमो सेपियन्स तक सभी किसी जंगल में निर्बाध भ्रमण करते दिखे। स्थान अफ्रीका, नर्मदा घाटी, ऑस्ट्रेलिया, ईरान कहीं भी हो सकता था। न धर्म का बंधन न समाज का न ही राजनीतिक व्यवस्था का कोई तानाबाना।
15 करोड़ वर्ष एक से तो न गुजरते सो परिवर्तन हुए। जैसे-जैसे प्रकृति से तारतम्य बढ़ा वैसे-वैसे जनसंख्या बढ़ी अर्थात् प्रकृति का दोहन बढ़ गया। बढ़ते अनुभव ने अच्छी उपजाऊ जगह की पहचान करा दी। अब यहाँ से परिवार और समाज दोनों की आवश्यकता आन पड़ी परंतु स्वभाव से जिज्ञासु और लोभी मनुष्य इतने से संतुष्ट न हुआ। उसने राज्य की कल्पना की। ताकि खुद को और शक्तिशाली बना सके। कालांतर में उत्तर वैदिक युग में धर्म का भी रस राज्य सुख में घोला गया ताकि समाज के भिन्न-भिन्न एककों को मजबूती से एक किया जा सके।
यहाँ तक तो सब ठीक था परंतु बढ़ती जनसंख्या और लालसा ने पहले मनुष्य के संयम को हर लिया फिर विवक को। अब विभिन्न क्षेत्रों की नृजातियाँ आपस में बेहतर जीवन की तृष्णा में एक दूसरे पर अपनी प्रमुखता दिखाने लगीं। हिमालय पार के क्षेत्रों से भारत पर अनेक यायावरों ने हमले किए। कुछ लूटपाट तक सीमित रहे कुछ यहाँ के निवासी बन गए। अलग-अलग कालक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों से आए इन लोगों और यहाँ के स्थाई निवासियों में आपस में ब्याह भी हुए और युद्ध भी। इन सभी स्वाभाविक घटनाक्रमों के मध्य एक बड़ी भयंकर दुर्घटना हो गई जिससे पृथ्वी का यायावरी का स्वाभाविक चक्र थम सा गया।
द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिरा दिया। युद्ध की ऐसी विभीषिका कि सारी पृथ्वी वहीं की वहीं ठहर गई। सारे अवाक् ! स्तब्ध!  मानव के एकाएक निम्नतम स्तर पर पहुँचने के गवाह बने रह गए। चारों ओर त्राहिमाम् के दृश्य। इस युद्ध से कोई अछूता न था। धन - जीवन सब की हानि। इस विभीषिका से बचने के उपाय खोजने संयुक्त राष्ट्र ने नियम बनाए। सभी देशों की राजनीतिक सीमाएँ स्पष्ट की जाने लगीं और इन सीमाओं का उल्लंघन करने वाले देशों को सजा के तौर पर सहायता से वंचित करने का प्रावधान रखा गया।
और बस यहीं से समस्त जीवद्रव्य अनेक देशों के अपने-अपने तालाब के नियमों में सड़ने लगा। हिंदू पाकिस्तान में फंस गया, उन्मुक्त ख्याल होमो सेपियंस अरब देशों में फंस गया, भारत का सच्चा मुसलमान भारत में फंस गया, सीरिया, यमन के समाचार और चित्र तो रोंगटे खड़े कर देते हैं। परंतु कभी सबके प्रिय आश्रयदाता देश अमेरिका, भारत, ब्रिटेन अब और अप्रवासी नहीं चाहते तो ये कहाँ गलत हैं ?  अपने देश की सीमाओं की रक्षा करना राज्य का प्रथम कर्तव्य है । परंतु उन नागरिकों का क्या जो बिना कसूर वहशी दरिंदों के क्षेत्र में फंस गए हैं। क्या यही है अब उनका भाग्य ? क्यो अब स्थानांतरण इतना कठिन हो गया है ? कभी भारत और अमेरिकी संस्कृति अपने भातृभाव और व्यापक दृष्टिकोण के लिए जानी जाती थीं। 'काबुलीवाला' की रचना आज का रचनाकार कैसे कर पाएगा? वो परदेस का जल जो अपनी जलमाला को तरोताजा़ कर संस्कृति को पोषित करता था अब केवल डिजीटल दुनिया का अंग बनकर रह गया है। सीरिया का हाल तो हमें पता है परंतु उनकी समस्या का निवारण किसी के पास नहीं है।
इस संसार को गतिहीन करने की सुविचारित समझ असल में मनुष्य की नासमझी है। मनुष्य और जल का प्रवाह रोका जा रहा है कल वायु और पक्षी भी रोकिएगा। हमें ऐसे समाधान खोजने होंगे जिससे शरणार्थी समस्या हो ही न क्योंकि यह वसुंधरा किसी अलकायदा या किसी राष्ट्रपति की जागीर नहीं है। वस्तुत: हम सब यहाँ कुछ पल के यात्री मात्र हैं। ऐसे में सच्चे मानव का प्रयास यही होना चाहिए कि सहयात्रियों को भी समान सम्मान और अधिकार दिया जाए। बस इतनी सी समझदारी ही तय करेगी कि हम होमो सेपियंस बुद्धिमान थे और हैं , कि हम भारतीय और अमेरिकी महान थे, हैं, और रहेंगे।

17.12.14

एकता में शक्ति है

पाकिस्तान के सैनिक स्कूल में हुए बच्चों के नृशंस हत्याकांड ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। सबके मन में एक ही प्रश्न है कि बच्चों को निशाना क्यों बनाया गया ? क्या हासिल हुआ ये रक्तरंजित खेल खेलकर इन हत्यारों को ? क्या इनके बच्चे महफूज़ हो गए इस कत्लेआम से ?

पेशावर में हुई इस घटना के दो पहलू सामने आ रहे हैं - पहला, कि यह एक बदलवार हमला था और दूसरा, कि आतंकियों के हौसले बढ़ गए हैं।  यदि हम पहले पहलू को देखें तो पाएंगे कि तालिबान सही कह रहा है।  ड्रोन हमले में अनेक बेगुनाह मारे गए हैं और इसमें तालिबानों के निर्दोष बच्चे भी शामिल हैं। इन बच्चों को मारना भी किसी प्रकार से सही नहीं ठहराया जा सकता है।  परन्तु इस दयनीय दशा के लिए तालिबान स्वयं दोषी है।  इसलिए जहाँ तालिबान दुनिया की ओर एक उंगली कर रहा है वहीँ उसकी ओर अनेक उंगलियां उठा रही हैं।  इस घटना का दूसरा पहलू पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। सभी प्रमुख विश्व सम्मेलनों में भर्त्स्ना होने और अनेकानेक आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद आतंकवाद की विषबेल तेजी से फलफूल रही है।  इसका  कारण है आतंकवादियों पर स्वार्थी निर्मम सत्तासीन लोगों का वरदहस्त होना। ये शक्तिशाली सुमुखि साम दाम दंड भेद धर्म अधर्म हर नीति का पालन करते हुए तालिबानियों के शैतान आकाओं को हर सुविधा मुहैया कराते हैं।  

इस घटना की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए पूरे विश्व को एक होना होगा।  सभी प्रमुख मंचों जैसे यू एन, डब्ल्यू टी ओ , आई एम ऍफ़ , जी - ट्वेंटी , सार्क , ब्रिक्स आदि  पर सभी देश एक दूसरे से साथ चलने का और आतंकवाद से नीतिपूर्वक निपटने का वादा करें।  इसके लिए कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर ध्यान देना होगा जैसे -
१] सभी देश एक साथ इन आतंकी संगठनों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाएं। 
२] आवश्यक सूचना साझा करें। 
३] आर्थिक प्रतिबन्ध लगाकर इन संगठनों पर लगाम लगाएं। 
४] इन संगठनों के नेट पर बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इंटरनेट पर लाइसेंस प्रक्रिया शुरू की जाए।  प्रत्येक संगठन और इसके सदस्यों का पूरा डेटा मेन्टेन किया जाए। 
५] अपने पडोसी देशों से बेहतर रिश्ते बनाए और पड़ोसियों के खिलाफ साजिश करने वाले संगठनों के प्रमुखों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाए। 
६] एक विश्व पुलिस या विश्व सेना तैयार की जाए जो अत्याधुनिक हथियारों और उपकरणों से लैस हो।  ताकि समस्त आतंकवादी संगठनों से एक होकर लड़ा जा सके। 

आतंकवाद दरअसल एक व्यक्ति एक सोच नही है अपितु पूरे विश्व में फैले विकृत मानसिकता के लोगों की अलग अलग समय पर उपजी सोच और कार्यवाही है।  इस विषबेल को उखाड़ने के लिए वैसे ही प्रयास करने होंगे जैसे श्रीलंका ने लिट्टे का समूल नाश किया था। इस समस्या से निजात पाना है तो समस्त धर्मों , विचारों , सरकारों और शांतिप्रिय लोगों को सेना और पुलिस के साथ खड़ा होना होगा।