8.12.13

जन गण मन की जीत हुई

टेलीविजन पर जैसे - जैसे आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों के जीतने के और दिल्ली के तीन कार्यकालों को सँभालने का व्यापक अनुभव रखने वाली शीला दीक्षित जी के बुरी तरह हारने के समाचार आ रहे थे उनसे देश की राजनीति तो स्तब्ध थी परन्तु जनता का उत्साह तो जैसे हिलोरें मार रहा था।  मात्र चौदह माह पुरानी पार्टी डेढ़ सौ साल पुरानी पार्टी के साथ जैसे दूध - भात का खेल खेल रही थी।  इस आश्चर्यजनक घटना के साक्षी बने हमसब जो उन दिनों के भी साक्षी थे जब सत्ता के मद में चूर नेता आम आदमी को धूल चटा रहे थे।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के प्रमुख किरदार अरविंद केजरीवाल थे।  परन्तु इस जीत के पीछे दो आंदोलन हैं जिन्होंने जनता को जगाया और ये याद दिलाया कि उठो, जागो और विरोध करो इस व्यवस्था का जो जनता के द्वारा , जनता के लिए चुनी तो जाती है परन्तु शासन सिर्फ अपने भले के लिए करती है। शासक दल का तो जैसे बुरा वक्त आ गया था या कहें कि पाप का घड़ा भर गया था जो जनता कि शक्ति को समझने की बजाए इन आंदोलन के नेताओं अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को सताने में लग गया और इतना ही नहीं इनके और इनके साथियों के साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार करने लगा। कांग्रेस के समझ में ही नहीं आया कि जनता इसे अपने अपमान की तरह ले रही थी।  सोशल मिडिया में लगातार आग सुलग रही थी कि हम तो बस अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं। और देखिये, विधानसभा चुनावों में देश की सबसे पुरानी पार्टी और शासक दल कांग्रेस का सफाया हो गया।

सबसे पहले देश की राजधानी दिल्ली
दिल्ली में पंद्रह वर्षों से चल रही शीला सरकार से लोग स्थानीय कारणों के अलावा केंद्रीय नेतृत्व कि असफलता के कारन भी नाराज थे।  बिजली, पानी , गैस की बढ़ी दरें और बेतहाशा बढ़ता भ्रष्टाचार देश अब और सहन नहीं कर सकता था उसमे करेला नीम चढ़ा हो गया अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का अनशन और दामिनी बलात्कार काण्ड।  शीला सरकार की नाकामियाबी खुलकर सामने आ गई परन्तु सरकार का दम्भी चेहरा देख जनता ठगा सा महसूस करने लगी।
अरविंद केजरीवाल का अपनी पार्टी बनाना और जनता को एक बेहतर विकल्प देना तो जैसे मुंह मांगी मुराद थी. जनता ने तुरंत ही इस मौके को लपका और अरविंद केजरीवाल की साफ़ सुथरी छवि और साधारण राजनीतिक कार्यशैली जनता के दिल में उतरी। भाजपा ने अपना नेतृत्व और उम्मीदवार तय करने में देरी दिखाई जिसका फायदा भी ' आप ' को मिला।  भाजपा बड़े दल के रूप में सामने तो जरुर आई परन्तु दिल तो ' आप ' ने जीता और अब वह एक सशक्त विकल्प के रूप में जनता के सामने आ गई है।

राजस्थान
राजस्थान में हर चुनाव में सरकार बदलने का रिवाज रहा है इसका फायदा वसुंधरा राजे को मिला।  फिर अशोक गहलोत अपने कार्यकाल में वायदे पूरे कर पाने और नवाचार देने में असफल रहे जिसका नतीजा रहा बेहद शर्मनाक हार।  गहलोत सरकार के मंत्री ही अपनी सीट नहीं बचा पाए तो अन्य का क्या कहना ? राजस्थान में भाजपा एक टीम के तौर पर सामने आई और पूरा खेल अपने घेरे में ले लिया। इस चुनाव में कॉंग्रेस २०० में से मात्र २१ सीटें ही बचा पाई।  मात्र एक कार्यकाल में यह हाल चिंताजनक है क्यूंकि अन्य राज्यों में सरकारें अपने दो -दो कार्यकाल पूरे कर चुकी थीं।  ऐसे में केंद्र सरकार के सर हार का दोष मढ़ना नकारात्मक सोच ही दिखाता है।

मध्यप्रदेश
अपने कुशल प्रशासन के साथ ही सौम्य और मिलनसार छवि ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लगातार तीसरा कार्यकाल पूरा करने का मौका जनता ने दिया। कॉंग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एंटी इन्कम्बेंसी का फायदा नहीं उठा पाए और राज्य में बुरी तरह पराजित हुए।  ज्योतिरादित्य और राहुल गांधी ने पूरे प्रदेश में जबर्दस्त चुनाव प्रचार किया परन्तु वे कुशल और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का भरोसा नहीं दे पाए।  वहीँ नरेंद्र मोदी की लहर ने हवाओं का रुख पूरी तरह से शिवराज सिंग चौहान के पक्ष में कर दिया।  अब कांग्रेस क्या आत्मावलोकन और विश्लेषण करेगी पता नहीं परन्तु दिग्विजय सिंह जी के बोले शब्द अब वापस भी तो नहीं हो सकते हैं न।

हमार छत्तीसगढ़
स्वच्छ छवि और विकास को मुद्दा बनाने वाले चाऊर वाले बाबा के लिए इस बार की जीत उतनी सरल नहीं थी क्योंकि दरभा घाटी कांड, महिलाओं की सुरक्षा, मजदूरों का पलायन, बढ़ती बेरोजगारी और धीमा विकास ऐसे मुद्दे थे जिनसे निपटना सरल नहीं था।  परन्तु रमन सरकार की खुश किस्मती देखिये कि कांग्रेस एक बार फिर छग में भीतरघात की शिकार हो गई और ३९ सीटों पर सिमट गई। दिनभर चली टिक - टॉक के बाद आखिरकार गेंद भाजपा के पाले में आ ही गई और रमन सिंग सरकार की हैट्रिक तय हो गई और एक अदद जीत का इंतज़ार करती कॉंग्रेस फिर से हाथ मलती रह गई।

जनता खुश है इन परिणामों से क्योंकि ये जन गण का मन है।  एक चुनाव ही वह तरीका है जिससे सत्ता कांपती है और सर झुकाकर जनता के आदेश को स्वीकारती है।  पांच सालों में केवल एक बार जनता अपना अस्तित्व साबित कर पाती है। ऐसा नहीं है कि जनता ने अपने शासक को पुकारा नहीं परन्तु लोकतंत्र में आश्चर्यजनक रूप से शासक स्वयं को जनता का सेवक न समझकर स्वामी समझने लगता है और जनता की हर पुकार अनसुनी कर देता है।  ऐसे में लाचार जनता के पास चुनाव में विपक्ष को चुनने के सिया चारा भी क्या बचता है ? परन्तु इस बार भारत वर्ष के चुनाव कि तस्वीर कुछ अलग थी।  सबकी निगाहें थीं अन्ना हजारे के अर्जुन अरविंद केजरीवाल पर और सबकी उम्मीदों से कहीं आगे बल्कि अपने गुरु कीउम्मीदों से भी बहुत आगे जाकर इस ' मैंगो पीपल ' पार्टी ने जैसे पूरे देश कि जनता को झूमने को मजबूर कर दिया। हर तरफ केवल ' आप ' की चर्चा। क्यों न हो ? आखिर वर्षों बाद भारतीय जनता को कोई ऐसा चेहरा मिला जिसने आजादी की लड़ाई के दौरान गांधीजी के जनता से जुड़ने और उनके लिए लड़ने वाले योद्धा की याद दिल दी।  जी उठे वो आदर्श जो भारत की पहचान हैं।  युवाओं की एक छोटी सी टोली जिसके पास हौसला है और उत्साह है देश के लिए कुछ करने का।  पूरे देश की राजनीति को बदलने का माद्दा दिखाना होगा ' आप ' को और यह गरीब दल ऐसा करे यह पूरे देश की आशा और विश्वास है।  आज लोकतंत्र की जीत हुई है।  आज गणतंत्र की जीत हुई है।

जय जवान !
जय हिन्द !
[ दो चित्र इस आम आदमी के ]



  


18.10.13

उस रेगिस्तानी टीले पर ..


दूर रेगिस्तान की एक मीनार के अहाते में 
सनसनाती हवा के संगीत में 
लहराती जुल्फों के नृत्य में 
ताल मिलाती आँखों की पुतलियाँ 

मुर्दे भी चैन से लेटे थे जहाँ 
अपने अधूरे ख्वाबों के कश लेते 
कभी - कभी मुझे देखते
बस एकाध बार अपने ख्वाब के विषय बदलने

एक नकाबपोश है दूर ऊंट में बैठा 
रेत के बवंडर से आता 
आहिस्ता आहिस्ता .. फिर ..
गुम हो जाता उसी बवंडर में 

मुर्दे भी मुंह फेर लेते 
सो जाते उस करवट 
इंतज़ार में 
किसी दूसरे नकाबपोश के 

एक बार बवंडर देखती 
तो दूसरी बार मुर्दे 
दोनों ही नही .. होकर भी 
दोनों ही हैं ..न होकर भी 

बैठकर देखती फिर से 
गर्म हवा के झोकों से रेत उड़ते 
इत्मिनान का कश खींचते 
उस रेगिस्तानी टीले पर 

4.10.13

आप सभी को नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ



कुछ है नहीं जो साथ ले जाया जा सके ..
प्रेम, मोह, द्वेष, घृणा, शिकायत, ख़ुशी .... बस समा जाते हैं उस कोख में जिससे जन्में हैं...

चलो बुलावा आया है ..............................
माता ने बुलाया है ................

कोख में ... वहीँ जहाँ से आए हैं .. वहीं जहाँ सबको जाना है ...
कुछ बच्चे जीते जी वहां चले जाते हैं .. तो कुछ अपने अंतिम सफ़र से माँ की कोख में समा जाते हैं ..
इस नवरात्री ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको माता का आशीर्वाद ख़ुशी, सम्पन्नता, शांति, प्रेम , वैभव और उन्नति से भर दे.
आप सभी को नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ _
_/\_

29.9.13

रिश्ता .. अकेला जो नहीं होता..

छोटा सा मोजा 
या मफ़लर 
या दोनों .. 

पैरों की पायल 
या हाथों की चूड़ियाँ 
या दोनों ..

आँखों में काजल 
माथे पर बिंदी 
हाँ .. दोनों ... 

मुँह पर हाथ रखोगी 
या यूँ ही बिन दांत हंस दोगी मुझपर 
हम्म ... ?
दोनों .. ?
हम्म .... 

जो कहोगी वो करुँगी 
जो न कर पाई तो ...
थोड़ा सा रो लूँगी

मना लेना ना तुम 
फिर से मुझे 
सर पर हाथ रख हँसकर 

कह दो पापा से 
निकालो मुझे इस कूड़े से 
मेरी माँ रोती होगी 

उसकी रूँधी सिसकी और मेरी साँस का सुर 
अपने एक बूँद आँसू में मत बहने दो पापा 
पकड़ो मेरा हाथ और गले लगा लो न पापा .. 

मैं माँ की गीत 
और आपकी जीत 
मुझे भी सब - सा जीने दो न पापा 

[ कलम कब माँ से बेटी में और बेटी से पापा में चली गई पता नहीं चला .... रिश्ता .. अकेला जो नहीं होता.. ]


16.8.13

कैसे कहें मुबारक आजादी भाई ..

हर ख़ुशी ग़मगीन है इस पार उस पार 
जो शिरी फरहाद की और राधा किशन की हो गई .. 

जो पत्थर पुजते थे बन के देवता 
उनकी मनहूस किस्मत हो गई ...

बकरीद इंसानों से मनाई 
और होली लहू से सन गई .... 

'नूर ' है गायब दोनों तरफ 
कैसे कहें मुबारक आजादी भाई ..

एक थी पूजा और नमाज की चादर
एक लकीर की गुलाम बन गई ...

16.7.13

धम्मं शरणम गच्छामि

धर्मनिरपेक्षता क्या है यह जानने के पहले धर्म क्या है जान लेना चाहिए. धर्म का अर्थ ऐसे परिष्कृत आचरण से लगाया जाता है जिसमे व्यक्ति तन मन और वचन से प्रकृति की मूल प्रवृत्ति से साम्य बनाए और सर्वार्थ लाभ हेतु आनंदपूर्वक तत्पर रहे. धर्म का व्यक्ति के जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान है यह इस बात से ही जाना जा सकता है कि स्वयं गौतम बुद्ध ने मनुष्य को ' धर्म की शरण में रहें ' का सूत्र बताया है.

प्रश्न यह है कि जब धर्म इतना महत्वपूर्ण है तो धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता क्या है ? क्या धर्म कोई बुरी बात है जिसका अनुयायी होना गलत हो गया कि सबको अपने हिन्दू - मुस्लिम- सिख- यहूदी होने कि सफाई देनी पड़े. सदियों से धर्म को कट्टरता और भ्रांतिपूर्ण परिभाषाओं से जोड़कर अपने हित के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है. यह केवल भारत में नही अपितु सभी देशों में चतुर नेताओं और मठाधीशों द्वारा किया जा रहा है.

धर्म का दोहन केवल सत्ता और धन लोलुप स्वार्थी तत्वों के द्वारा किया जाता है और आगे भी ऐसा किया जाएगा. परन्तु अब तस्वीर कुछ हद तक बदल गई है. शिक्षा और विज्ञान के प्रसार ने लोगों की आँखें खोल दी हैं. धर्म का अनुयायी निश्चित ही शांतिप्रिय व्यक्ति होगा चाहे वो किसी भी देश, दल या मठ से जुड़ा हो. अतः कोई सच्चे शब्दों में कहा जाए तो किसी आस्तिक या नास्तिक व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष होने की आवश्यकता है ही नही.

आज के सन्दर्भ में देखा जाए तो धर्म के साथ ही धर्मनिरपेक्षता शब्द की भी राजनितिक हित में दुर्गति हुई है. वास्तव में जिस सिद्धांत की आवश्यकता ही नही है उसे लोगों के मन में भय बिठाकर सत्ता पाने का अचूक हथियार बनाया गया है. क्या धर्म हमे लड़ना सिखाता है जो हम लोगों को धर्मनिरपेक्षता को ओढने को मजबूर कर रहे हैं ? रही बात धार्मिक दंगों की तो ये सबको पता है कि ऐसे दंगे गुंडे करते हैं न कि पंडित और मौलवी जैसे लोग. हाँ सभी सम्प्रदायों में आपसी बैर रखने वाले कुछ लोग अवश्य मिल जायेंगे परन्तु इसका मतलब यह नही है कि पूरी कौम ही गलत है. आवश्यकता है अपने धर्म को समझने , उसका पालन करने और मानवता को परमधर्म समझने कि ताकि धर्म के दुरूपयोग को रोक जा सके. आज के समय में देश विभाजन जैसी हालत नहीं है अतः धर्म निरपेक्षता शब्द को बदलकर सर्वधर्म समभाव शब्द को वरीयता दी जानी चाहिए ताकि आपसी प्रेम और देश की एकता बनी रहे.

27.5.13

'वी - द इमली पीपल '

पटेल के घर का नजारा देख रो पड़ीं सोनिया, राहुल ने दिया मां को सहारा......( समाचार )

राबर्ट वाड्रा को भी आना चाहिए था सोनिया गाँधी के साथ हताहतो का हाल जानने. खुद अपनी आँखों से देखना था कि पैसे के दम पर इतराने वालों से 'इमली पीपल' कैसे निपटते हैं. कल सोनिया गाँधी के आँसू सिर्फ नंदकुमार पटेल के लिए नहीं बहे होंगे अपितु उन्हें बरबस ही आपबीती भी याद हो आई होगी. परन्तु सोनिया गाँधी ने इससे क्या सबक लिया ? क्या अब वे समझेंगी कि अपना परिवार सुरक्षित रखने के लिए उन्हें उन अन्य परिवारों के सुख-दुःख से भी जुड़ना होगा जो दुःख के हद से पार होने के बाद कुछ भी कर सकते हैं. हालाँकि ऐसा लगता तो नहीं है क्योंकि राहुल गाँधी खुद बोल चुके हैं कि माँ ने कहा है की ताज काँटों से भरा होता है. आज भी गाँधी परिवार दलित के घर सुख-दुःख बांटने ( उनके घर खाने और सोने ) चुनावों के वक्त ही जाता है. क्या राहुल गाँधी ठीक घटनास्थल वाले गाँव में किसी आदिवासी के यहाँ जायेंगे रात को खाना खाने और सोने .. चलिए .. चुनावों के समय ही सही .. जायेंगे ? जवाब है ' नहीं ' . बात साफ़ है की आलाकमान अपने  दुःख ( और पैसा कमाओ ताकि बाथरूम और सुन्दर बन सके ) में अत्यंत दुखी है. गाँव वालों का दुःख दर्द बांटने का बहुमूल्य समय उनके पास नहीं है.



अपने राजतन्त्र को स्यूडो लोकतंत्र से चलाने वाले इन नेताओं के प्लेन चेहरे पर कल अवाक का भाव तब उभरा है जब खुद पर हमला हो गया. वैसे चीन, पाक , बांग्लादेश हो या अमेरिका ये किसी से नहीं डरे. इन्हें सिर्फ अपनी चिंता थी , है और रहेगी. तो क्या होगा नक्सली समस्या का क्योंकि नेता - अफसर - मानवाधिकार कार्यकर्ता तो सही रास्ता निकाल पाने में असमर्थ रहे हैं. ये स्वार्थी और लालची को अस्तेय और अपरिग्रह नही सिखा पाए साथ ही, बेबस लाचार को पलायन कर खुद को साबित कर दो नहीं सिखा पाए हैं.  तो क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा.. जैसे को तैसा ?

ऐसे ही चलता रहा जैसे को तैसा तो उस का जवाब होगा .. जैसे को तैसा. कहते हैं कश्मीर की वादियाँ अभी तक इसलिए बची हुई हैं क्योंकि कश्मीर सेना के हाथ में है और इस कारण उसकी पहाड़ियों का व्यापारिक सौदा नहीं हो पाता है. लगता है इसी प्रकार अब दंडकारण्य को भी बचाया जा सकेगा. तो क्या यही चाहता है इमली पीपल ? अब बहुत समय से उठ रही मांग पूरी होने को है... बस्तर सेना को समर्पित होने को है. परन्तु इससे भी समस्या नही सुलझेगी क्योंकि सेना कश्मीर की समस्या का हल नहीं बन पाई है. बस एक पिंजरा बना पाई है जिसमें आम लोग आतंकवादियों के साथ-साथ सेना के बिगड़े जवानों के आतंक को भी सह रहे हैं बेबस और लाचार होकर.

मजबूरीवश देखते जाइये तट पर खड़े इस क्रमिक नरसंहार को क्योंकि आगे अभी और भी ऐसी खबरें कतार में कड़ी हैं अपनी बारी के इन्तेजार में - ' लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बाय - वी द इमली पीपल .'
है न ?

25.5.13

एक पत्र का अवसान

२ .


बड़ी ही मुश्किल से बाहर निकल पा रहा हूँ इस तने से। ठंडी - ठंडी हवा भी मेरा कष्ट कम नही कर पा रही है।

आहा ... निकल आया। कितना अँधेरा है यहाँ चारों तरफ। ह्म्म… शांतचित्त ... विस्मय से निहारता .. थकान से चूर सो गया नवागत पत्र।

सुबह की शीतल बयार का सूर्य की कोमल रश्मियों के साथ फुगड़ी खेलते हुए और पीछे से विहंग कलरव की अजान ने नवागत का स्वागत किया। इतनी ताजगी , सुन्दरता और सम्पूर्णता जिससे पत्र स्वयं को भूपति सा महसूस कर रहा था।

पता ही नहीं चला कितना समय व्यतीत हो गया ऐसे अपलक सृष्टि को निहारते। ऊष्मा की बढ़ती मात्रा शरीर में ऊर्जा बढ़ाती जा रही है।

और .. नीचे से कुछ आवाज़ भी आ रही है .. कुछ अलग सी आवाज़ ....

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

फिर बहुत से आवाजें एक साथ स्वरबद्ध आने लगीं ..

बुद्धं शरणम गच्छामि
संघम शरणम गच्छामि
धम्मं शरणम गच्छामि

'भगवन !
ध्यान में मन नहीं लगता। कोशिश करता हूँ परन्तु मनके - मनके दुखों की माला ...... साँस रोक लेती है .. क्या करूँ ?
कुछ भी करूँ .. कितना भी करूँ .. दुःख से पार नही पा पाता।
कैसे शांति प्राप्त करूँ ? '

' वत्स !
जीवन इस क्षण है।
दुःख भी एक क्षण में था और सुख भी। उसकी इस क्षण अनुभूति करना दुःख का कारण है। सम्यक स्मृति का पालन करो अर्थात जो स्मृति योग्य है केवल उसका चिंतन मनन करो।'

' भगवन !
सम्यक स्मृति का पालन कैसे हो ? यह कार्य सरल नहीं। '

' वत्स !
सम्यक स्मृति के लिए सम्यक दृष्टि आवश्यक है। सम्यक दृष्टि ही सम्यक वाक् की ओर  अग्रसर करेगी और सम्यक वाक् , सम्यक क्रिया की ओर अग्रसर करेगा। आष्टांग मार्ग का पालन ही समाधि की अवस्था तक पहुंचा सकता है। एक ऐसी अवस्था जब दुःख आतंरिक नहीं अपितु बाह्य क्रिया हो जाएगा। '

पत्र यह वार्तालाप बड़े ध्यान से सुन रहा था प्रकृति का आनंद लेते हुए उस व्यक्ति की समीपता में जो वृक्ष के नीचे बैठा है .. एक अंतहीन 'जीवन'।

(क्रमशः)


'एक पत्र का अवसान १'

22.5.13

एक पत्र का अवसान

१ 




पत्र अवसान के उपरांत जमीन पर पड़ा है ..सूखा हुआ .. जगह जगह से मुड़ा हुआ और शांत। 
[क्या वह सचमुच में शांत है ? हाँ हाँ जी .... असीम शांत है।] 

कि तभी एक चौपाये का एक कठोर पाया उसके मृत क्षीण शरीर पर पड़ा और पत्र के चरमराने की आवाज आई। चौपाया बेखबर, बेअदब जुगाली करते आगे बढ़ गया और अपने पाप धोते हुए पत्र के मुंह पर सस्वर पवित्र गोबर कर गया। 

पत्र अब भी शांत है। तेज धूप में गोबर अब सूख गया है और उसकी गंध भी बदल गई है। कीटों का शोर बता रहा है की आज सबकी गोबर की दावत होने वाली है। सो वो भी हो गई। अचानक मौसम ने करवट ली और बारिश होने लगी। बूँद-बूँद बारिश का पानी और बारिश से उठती मिट्टी की सौंधी खुश्बू पूरे वातावरण को बदल रही थी। सूखी मिट्टी मारे ख़ुशी के बहने लगी। बूंदों की लड़ी से पेड़ों ने अपना मुंह धोया और मुस्कुराने लगे। जड़ें अपना गला तर करके आराम करने लगीं और बारिश की मार से कुम्हलाये नाजुक फूल बारिश  के ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगे। 

सब खुश थे भीगे हुए संवारे हुए खुश्बूदार ... आह्हा !!!!

इस सबके बीच हमारा पत्र सोच रहा है कि वो क्यों नही है अब खुश्बूदार और खूबसूरत सब की तरह। कोई नहीं है जिससे पूछे बताये कि उसे खुश्बू नहीं आ रही है अब ना ही ताज़ी हवा में अंगड़ाई ले पा रहा है। बस मन मसोस कर सबको देख रहा है और सबकी बातें सुन रहा है। इतना सोचना था कि हमारे वाले पत्र की शाँति भंग हो गई।

' एक समय था जब मैं हरे रंग का था, सुन्दर , गठीला और मेहनती। पानी पीता और धोंकनी सी गर्म सूर्य रश्मियों से पेड़ के लिए भोजन बनाता। सबसे आगे रहता था मैं। पक्षियों का गाना सुनता और उनके बच्चों को शाम को हवा के झोंकों से लहराकर गाने सुनाता। और अब, अब पड़ा हूँ बेबस अपने पेड़ से होकर अलग, पीला, मुड़ा- तुड़ा। '

(क्रमशः)

एक पत्र का अवसान - २

18.5.13

एक मीठी बूँद

एक मीठी बूँद
सर से अक्षुकोण तक
एक नमकीन बूँद
वहीँ अक्षुकोण पर
एक कम मीठी और कम नमकीन बूँद
अपने भार को संभालती
तेजी से लुढ़कती
गाल से ठोड़ी तक
तरबतर करती
सर से पैर तक

कुछ हल्का करते ...कहीं ...अन्दर
कुछ उजला करते ... गहनतम ... कहीं ... अन्दर
धरती का बोझ बढ़ाते
तीव्र गति से बढ़ती
कम मीठी
कम नमकीन
कम स्वच्छ
कीचड़ में बदलती

एक मीठी बूँद
नियति का क्रूरचक्र
समाती भीषण अग्नि में
सूख जाती वह
बिन राख 
कण कण बिखर

फिर कण कण जुड़ती 
बनती एक स्वच्छ बूँद 
आने सिर की सडकों पर 
मिलने पुनः अक्षुकोणों से 
करने हल्का नमकीन अक्षुजल ..
कहीं .. गहन .. अनंत विस्तार में 
समाने कीचड़ बन गंगा में 
फिर बरसने सबके ऊपर 
वहीँ उसी की जगह पर 
गंगा बनकर ......... 



17.5.13

अस्तित्व के आयाम

नर्म हरी घास
कोमल नारंगी धूप
काली पीली तितली
बैंगनी फूल
बेरंग समीर
कड़ी कत्थई शाख
नीला अम्बर
सफ़ेद कलकल दरिया
अच्छा लगता है न ?

कागज की नाव
रूमाल का पंखा
चुन्नी की साड़ी
गुड़िया की शादी
आटे की चूड़ी
हवा की चाय
बिन बात आंसू
सच्चा लगता है न ?

सबका होना
खुद का खोना
'उनका' होना
'उनका' न होना
पर भी उनका होना
दर्द में हँसना
हंसते हुए रोना
कैसा लगता है न ?

न जलना
न भीगना
न होना
न ना होना
पर होना
क्यों होना जब ना होना
समस्त उद्वेग शांत हो जाना
'शिवोहम' का गुँजन करता है न ? 

14.5.13

अनामिका - मातृछाया एक

१५ दिन से लेकर ६ साल तक के बच्चे .
कोई टोकरी में मिला , कोई अस्पताल में .. कोई पुलिस स्टेशन से लाया गया तो कोई ... कह नही सकते उस असलियत को. रोते बच्चे .. बच्चे अनेक .. संभालने वाले आवश्यकता से कुछ कम.
सरकार की मदद ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है. लोगों की मदद से सेवा भारती का ' मातृछाया ' चल रहा है.
छोटे-छोटे बच्चे .. कितने प्यारे ...  छः छः गोदी में आ गए एक साथ .. उतरने को तैयार नही ..  संयुक्त परिवार जैसे. मेरे आते-आते बच्चों ने कल चोकलेट लाना का निवेदन भी किया है और हाव-भाव ऐसे की आप मना कर नही सकते. सच में , बच्चे सब जानते हैं.
अच्छा लगा सबसे मिलकर . आप भी जुड़िये किसी सामाजिक सरोकार से . जो आपके दिल के करीब हो. निर्मल ख़ुशी प्राप्त होगी . यदि आप ' मातृछाया ' को बच्चों के उपयोग का कोई सामान देना चाहते हैं तो 'अनामिका ' से संपर्क करें.

मातृछाया
कुदुदंड
बिलासपुर

9.5.13

शून्य है लक्ष्य


व्यर्थ प्रयास
सीमा के पालन का
असीम प्राप्ति

असीम प्राप्ति
असफलता में भी
सफलता से

सफलता से
उल्लंघन मार्ग  है
सही प्रयास

सही प्रयास
यह भेद ससीम
शून्य है लक्ष्य

शून्य है लक्ष्य
मिलेगा, पूरा कर
जीवनचक्र

जीवनचक्र
कर्मखाता संघर्ष
कर प्रयास

कर प्रयास
शून्य में होजा लीन
अनश्वरता





3.5.13

चुप रहो कि अभी अपनी बारी नही आई है ..

कलियाआआआआआआ .........................

सरब्जॆत्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त ..........................

कहाँ हो तुम ............................


कलियाआआआआआआ .........................

सरब्जॆत्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त

ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह
कोई रोको इसे .................
कितनी ज़ोर की चीख
प्रेतों की रूह काँप जाये ..........

सुन लो ये चीख
देख लो कैसे माथा पीटते हैं
कैसे छाती पीटते हैं
कैसे बेबस बाप होंठ भींचे
भीड़ के सामने सम्मान बचाने
खडा हो जाता है
'अपने को' ख़ाक करने
सीख लो ......................

गर्व करो ..
हम सब एक हैं
गुजराती, पंजाबी , हिन्दू , मुसलमान
एक से मरते एक से रोते
मेरा भारत महान

मत आना 'उसके लिए'
रहने दो उसे अकेले मरते
कर दो मुनादी ..
अपने भी अकेले मरने की आज
ऐसे ही मरोगे एक के बाद एक
अकेले .. अकेले .. अकेले

मत सोचना की यह सबसे बुरा है
इससे बुरा क्या होगा ?
नही जी .. बुरा होना अभी बाकी है
बच्चों का बिक जाना याद है
पांच सौ रुपये में .. हरियाणा , बिहार में ?
अब होगा ये खेल लाखों में
शराब में धुत्त अबोध बच्चे - बच्चियां
सरहद पार शहीद होंगे
देश के लिए ...
अकेले .. अकेले .. अकेले


[ मौन को प्रणाम
 किसी ने ठीक कहा है ..
जाके पैर न पड़े बवाई .. वो क्या जाने पीर पराई ]


8.3.13

Enjoy life .. 'Queen' size !


How one can enjoy Womanhood without ....
Brother, Father, Husband, Friend, Guru, Son.................and many more like rikshaw wala bhaiya ... fugge wala bhaiya , gupchup wala bhaiya .... and all. 

We cannot forget Meerabai, Laxmibai, Mahashweta Devi, Kalpana Chawla, P. T. Usha, Panna Dhaaymaa, Shabari and many more women lived their life gracefully as a human being.They don`t beg for any special day or special laws for women. What they want they done it from their heart and spirit, and the rest is a history. 

Now, the question is then why we are celebrating woman`s day ? 
We are celebrating woman`s day because today`s women forget their true nature. They are begging dignity and security from others without knowing that dignity is the matter of one own`s effort and wish and, if somebody is trying to harm your dignity or security you should leave that place or you can fight for your rights. 
While doing this please remember that you have two choices whether you choose to live lavishly or to live with grace. and if you choose grace over than comfort than be happy with your choice. Because this is the ultimate thing one can do in their life. 

Even males are also struggling for their lives so in my vision, there is nothing like woman`s day. Every creature of this planet is complete and struggling for their own survival. It is up to 'you' that what you are thinking about yourself. If you think that ' I am powerful' you are powerful and if you think that ' I am weak ' then you became weak. So, don`t beg for your rights, dignity or for security. Keep it in mind that every creature of this world is complete.  
  
Enjoy life Queen size.... everyday!  



17.2.13

सर्कस

उमम् की आवाज के साथ
शहद की मिठास के साथ
शुरू हुआ सर्कस

चेहरे देखने का
आवाज पहचानने का
शुरू हुआ सर्कस

कछुए से चीता बनाने 
खरगोश से लोमड़ी बनाने का
शुरू हुआ सर्कस 

हिजड़ा बना सेनापति 
ज्ञानी गरल पीडित 
चल पड़ा सर्कस 

घोड़े को गधा बनाने का 
चेहरे पहचानने का 
चल पड़ा सर्कस 

नाम को दाम से चमकाने 
दाम को दाँत से चमकाने 
चल पड़ा सर्कस 

बंदरों की उछलकूद 
दोनों तरफ बल्ली में संभालते 
थकाने लगा सर्कस 

साँस की महीन तार 
मुश्किलें अपार 
थकाने लगा सर्कस 

घंटों और मन्त्रों का शोर 
द्वार पर पसरे बुजुर्गों के हाथ 
थकाने लगा सर्कस 

एकांत ... एकांत ...... !!!!!!!!!!!!
वृक्ष के नीचे ... चिड़ियों के पास .... 
बंद करो ये सर्कस .. !!!

हो गई पहचान 
कण-कण की 
बंद करो ये सर्कस .. !!!

जो है जैसा है .. वैसा है 
पूर्ण है 
बंद करो ये सर्कस .. !!!

निकली उच्छ्वास 
सत्य के 'नूर' से 
बंद हुआ सर्कस 

आती साँस जाती साँस 
हर क्षण प्रफुल्लित 
पूरा हुआ सर्कस




13.2.13

‘वन बिलियन राइजिंग’


मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ यह जानकार कि अनुष्का यौन शोषण के खिलाफ खुल्लमखुल्ला आ गईं हैं और एक संगठन भी बनाया है जो स्त्रियों के खिलाफ यौन शोषण का मुखर विरोध करता है।

31 वर्षीय अनुष्का ने वेबसाइट ‘चेंज.ओआरजी’ के माध्यम से एक अरब महिलाओं और उन्हें चाहने वाले लोगों को इस वेलेंटाइन डे पर 14 फरवरी को बाहर निकलने, डांस करने और इस तरह की हिंसा को खत्म करने की आवाज उठाने के लिए कहा है ।

वेबसाइट के अनुसार, ‘वन बिलियन राइजिंग’ शीर्षक से यह अभियान का  वादा है जो दुनियाभर में महिलाओं और पुरुषों को यह कहने के लिए प्रेरित करेगा कि ‘बहुत हुआ, अब हिंसा समाप्त हो.’ इसमें एक वीडियो में अनुष्का को महिलाओं को संबोधित करते हुए भी देखा जा सकता है।

फिलहाल लंदन में रहने वाली भारतवंशी अनुष्का कहती हैं, ‘जब मैं बच्ची थी तो एक आदमी के हाथों सालों तक यौन और भावनात्मक उत्पीड़न का शिकार रही जिस पर मेरे माता-पिता आंख मूंद कर भरोसा करते थे. ज्यादातर महिलाओं की तरह मैंने भी कई तरह से मौखिक उत्पीड़न, छूने की कोशिशों और अन्य चीजों का सामना किया और मैं इनसे निपटना नहीं जानती थीं।

लोग प्रश्न करते हैं कि,

पहला, क्या इन मर्दों को अपनी बेटी - बहन याद नही आती ?
- सत्य यह है की 90% लैंगिक अत्याचार घरों में बहन-बेटियों के साथ ही होते हैं। सो ऐसा तर्क सत्य से परे है।

दूसरी बात, ऐसे अपराधों के लिए लालच भी दिया जाता है।
- तो आप अपनी बेटी को , बहन को या स्वयं को लालच से बचायें .

तीसरी बात, महिलाएं भी इन अपराधों में शामिल होती हैं जैसे होस्टल की वार्डन, भाभी, माँ, सहेली , बहन आदि ..तब क्या करें।
- इन महिलाओं के साथ शून्य सहनशीलता रखी जाए और पुरुषों से ज्यादा कठोर दंड इनके डर और लालच को दिया जाए।

चौथा, लड़कियां डर के कारण सामने नही आती हैं , क्या करें ?
 - उन्हें मजबूर मत करिए कि वे पुनः उस दौर से मन में भी गुजरें। शांत रहिये। सम्बंधित व्यक्ति को उसकी गलती का एहसास दिलाइये और वचन लीजिये कि वो आईंदा ऐसा नही करेगा और संबंधों को पुनः सामान्य कीजिये। हाँ .. दोषी पर आँख मूँद कर भरोसा करने की गलती न करें।

ऐसे मामलों में ज़रूरत है कि हम बेटियों को उठने-बैठने का तरीका सिखाने के साथ-साथ उनके आसपास के लोगों को भी बहन - बेटियों से संवाद करने का तरीका स्पष्ट कर दें।

 ~~~~ हैप्पी वेलेंटाईन डे ~~~~

खुश रहिये .. खुश रखिये ... 14 फरवरी प्रेम दिवस है .. जी भर के मनाईये प्रेम दिवस सबके साथ .. स-सम्मान।



रॉकस्टार

अच्छी किस्म की कम्पोस्ट खाद चाहिए थी
रॉकस्टार को ....
सो हमारे ऊपर कोठी तान दी 

शिकायत आई है उनकी ...
इतनी जोर से मत हँसो 
हमारी कोठी हिलती है .... 

खाद हो खाद जैसी रहो 
हमे देखो , कोठी देखो .. 
और खुश रहो 

लड़कियां नही हंसती ... 
वो खुश रहती हैं 
अच्छी किस्म की कम्पोस्ट खाद की तरह .. 

हम मान गए .....
अपनी किस्म की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए
: ) ... मात्र  खुश    



टिंकरबेल


डायरी खोलते हैं ..
टिंकरबेल को पकड़ने

वो फिर उड़ गई ...
शैतान .......... !!!
उन्हह .. !!!

तुम यही करना टिंकरबेल ..
अपनी नादानियों में हमे फंसा देना
दांत निपोरते हुए ... दुष्ट !!!

करें परी माँ से शिकायत तुम्हारी
देखते हैं कैसे बचाता है तुम्हें
पीटर पैन ... ह्म्म्म ... !!!


4.2.13

झूला

हवा की महक
सूखी पत्तियों की ताल
मिटटी का घर्षण
गगन का आश्वासन
मिटटी से जुड़ा झूला

बच्ची का खेल करता झूले को ऊँचा ..और ऊँचा
खिलखिलाहट का स्वर ऊँचा ... और ऊँचा
पैरों की अठखेली को त्वरित ... और .. और
अनथक श्रम ... आगे और पीछे जाने का
झूले को सताने का ... ले जाने का .. ऊँचा .. और ऊँचा

निःस्वार्थ झूला भी बना है नादान
अपनी रस्सी को तान
करने देता है मनमानी
झूलाने को ऊँचा ... और ऊँचा
आगे - पीछे ... आगे - पीछे होकर
लेता है अपने झूला होने का मजा
बचपन की खुशियाँ बढ़ाकर ऊँचा .. और ऊँचा ...







1.1.13

आपके जीवन में सदा सुख, समृद्धि और शान्ति का वास हो !

मित्रों , 

जिस प्रकार पुराना पानी निकास न पाकर दूषित हो जाता है उसी प्रकार पुरानी भावनाएं और यादें भी निकासी मार्ग न पाकर दूषित हो जाती हैं और हमारे तन-मन-धन - जीवन सबको हानि पहुंचाती हैं. विगत वर्ष हम सब जिस अनुभव से गुजरे हैं वह दुखदायी और परामर्शदायी दोनों ही है. यह समय दुःख में डूबकर सुधबुध खोने का नहीं अपितु चुनौती को स्वीकारकर आगे बढ़ने का है. 

नव वर्ष यूँ तो मानव निर्मित काल खंड मात्र है परन्तु यह दिवस एक अवसर प्रदान करता है विगत ३६५ दिनों की हमारी उपलब्धि और कमियों पर एक स्पष्ट दृष्टि डालने का ताकि हमारे कार्य में जो कमी रह गई है उसे सुधारा जा सके. यह मूल्यांकन हमे व्यक्तिगत जीवन में सफलता प्रदान करता है परन्तु आज समय की आवश्यकता है कि हम अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों तक ही न सीमित हो जाएँ अपितु स्वयं को राष्ट्र को समर्पित कर देवें. 

आक्रोश और निराशा दोनों ही नकारात्मक उर्जाएं हैं जो जीवन को अधिक कष्टप्रद बना देती हैं अतः प्रयास करें कि मन में आ रहे आक्रोश और निराशा के भावों को जोश और जाग्रति में बदल कर उन्नत समाज की स्थापना में हम अपना योगदान दें. ऐसे अवसर पर जबकि सभी अपनी समाज को उपेक्षित करने की गलती को भूलकर सरकार को कोस रहे हैं , मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब याद आ रहे हैं. 

उम्रभर ग़ालिब यही भूल करता रहा 
धूल चेहरे पर थी आइना साफ़ करता रहा 

भारत की वर्तमान कुव्यवस्था के दोषी मात्र वे नहीं जिन्होंने धन, सत्ता और बाहुबल का दुरुपयोग किया अपितु हम सभी हैं जिन्होंने ऐसा होने दिया. अब ऐसा आगे न हो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने मन रुपी कुसुम को निर्बाध पल्लवित होने दें और उसकी सुगंध से सारी वसुंधरा महका दें. किसी को शत्रु मान किया जाने वाला कार्य अल्पकालीन फल देगा अतः प्रतिज्ञा लें कि हम अपने जीवन को व्यर्थ नहीं जाने देंगे. अपने सपने पूरे करेंगे और देश के काम आयेंगे. इस राह में कोई बाधा आए तो उससे लोहा लेंगे और अब पीछे नहीं देखेंगे क्योंकि जीवन आगे बढ़ता है पीछे नहीं. 

नव वर्ष की आप सभी को मंगल कामनाएँ !