17.12.14

एकता में शक्ति है

पाकिस्तान के सैनिक स्कूल में हुए बच्चों के नृशंस हत्याकांड ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। सबके मन में एक ही प्रश्न है कि बच्चों को निशाना क्यों बनाया गया ? क्या हासिल हुआ ये रक्तरंजित खेल खेलकर इन हत्यारों को ? क्या इनके बच्चे महफूज़ हो गए इस कत्लेआम से ?

पेशावर में हुई इस घटना के दो पहलू सामने आ रहे हैं - पहला, कि यह एक बदलवार हमला था और दूसरा, कि आतंकियों के हौसले बढ़ गए हैं।  यदि हम पहले पहलू को देखें तो पाएंगे कि तालिबान सही कह रहा है।  ड्रोन हमले में अनेक बेगुनाह मारे गए हैं और इसमें तालिबानों के निर्दोष बच्चे भी शामिल हैं। इन बच्चों को मारना भी किसी प्रकार से सही नहीं ठहराया जा सकता है।  परन्तु इस दयनीय दशा के लिए तालिबान स्वयं दोषी है।  इसलिए जहाँ तालिबान दुनिया की ओर एक उंगली कर रहा है वहीँ उसकी ओर अनेक उंगलियां उठा रही हैं।  इस घटना का दूसरा पहलू पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। सभी प्रमुख विश्व सम्मेलनों में भर्त्स्ना होने और अनेकानेक आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद आतंकवाद की विषबेल तेजी से फलफूल रही है।  इसका  कारण है आतंकवादियों पर स्वार्थी निर्मम सत्तासीन लोगों का वरदहस्त होना। ये शक्तिशाली सुमुखि साम दाम दंड भेद धर्म अधर्म हर नीति का पालन करते हुए तालिबानियों के शैतान आकाओं को हर सुविधा मुहैया कराते हैं।  

इस घटना की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए पूरे विश्व को एक होना होगा।  सभी प्रमुख मंचों जैसे यू एन, डब्ल्यू टी ओ , आई एम ऍफ़ , जी - ट्वेंटी , सार्क , ब्रिक्स आदि  पर सभी देश एक दूसरे से साथ चलने का और आतंकवाद से नीतिपूर्वक निपटने का वादा करें।  इसके लिए कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर ध्यान देना होगा जैसे -
१] सभी देश एक साथ इन आतंकी संगठनों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाएं। 
२] आवश्यक सूचना साझा करें। 
३] आर्थिक प्रतिबन्ध लगाकर इन संगठनों पर लगाम लगाएं। 
४] इन संगठनों के नेट पर बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इंटरनेट पर लाइसेंस प्रक्रिया शुरू की जाए।  प्रत्येक संगठन और इसके सदस्यों का पूरा डेटा मेन्टेन किया जाए। 
५] अपने पडोसी देशों से बेहतर रिश्ते बनाए और पड़ोसियों के खिलाफ साजिश करने वाले संगठनों के प्रमुखों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाए। 
६] एक विश्व पुलिस या विश्व सेना तैयार की जाए जो अत्याधुनिक हथियारों और उपकरणों से लैस हो।  ताकि समस्त आतंकवादी संगठनों से एक होकर लड़ा जा सके। 

आतंकवाद दरअसल एक व्यक्ति एक सोच नही है अपितु पूरे विश्व में फैले विकृत मानसिकता के लोगों की अलग अलग समय पर उपजी सोच और कार्यवाही है।  इस विषबेल को उखाड़ने के लिए वैसे ही प्रयास करने होंगे जैसे श्रीलंका ने लिट्टे का समूल नाश किया था। इस समस्या से निजात पाना है तो समस्त धर्मों , विचारों , सरकारों और शांतिप्रिय लोगों को सेना और पुलिस के साथ खड़ा होना होगा।

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10.6.14

धूल के फ़ूल

धूल से चिपककर
हाथों से पीटकर
मुंह डालकर रेत                        
खिलखिलाता बचपन

सड़क है पर रुकी वहीँ
मॉल है पर जाऊँ नहीं
नल है पर पानी नहीं
माँ है पर हाज़िर नहीं

आसमान है धूप का छाता
ज़मीन ही है सर्कस हमारा
थोड़े से टूटे खिलौने हैं
और तोड़ सकें इतने तो बचे हैं

पता नहीं गोद क्या है
बस बैठी रहूँ वहीं ये 'सीख' है
ये रेत का कुरकुरा स्वाद
पों-पों की आवाज मेरा बचपन है

कॉपी-किताब, नए कम्पास
ऐसे बुरे शौक नहीं मेरे
जो मिले वो खाना
न मिले तो गुनगुनाना  ....... मेरा जीवन है।



23.3.14

बेरोजगार हूँ मैं

बेरोजगार हूँ मैं

यही है मेरा नाम ' बेरोजगार '
सुबह उठता हूँ
आईने देखे बिना ही मुंह धो लेता हूँ
अब कौन दाढ़ी बनाने और बाल कटवाने जाए
वो नाई अब ……
बेकार बाल काटता है वो
और रितिक भी तो पीछे छोटी बनाता है
डाँटने दो माँ को
वो नही समझती ये सब फैशन
नाराज हो जाती है मेरी खींसे निपोरती हँसी पर
कहती है ' कब समझदार होगा रे तू '
मैं फिर बालों को हाथ से फेर खिड़की को देखते
माँ के पल्लू से छूकर निकल जाता हूँ

बाहर जाता हूँ कुछ करने
कुछ बनने अपने सपनों को जीने
तभी कल्लू मिलता है
सोने का एक कृदन्त दिखाता हुआ
अपना हाल झाड़ता हुआ
मुझपर तरस खाता बोलता है
'आजा मेरी लाईन में
यहाँ तेरे जैसे नाम वालों की खूब वेकेंसी निकलती है
बस एक बार सही जगह पर बम फोड़ना है रे
फिर कान बंद और आँख बंद
बस मुस्कुरा के नोट गिन
बाकी का काम मानवाधिकार वाले सम्भाल लेंगे '
मन करता है वहीं पूरे स्वर्णजड़ित दन्त पंक्ति का इंतेजाम कर दूँ
पर सामने नेहा बैठी है ना उस कल्लू को निहारती
चुप हो जाता हूँ मैं
यारों ! बेरोजगार हूँ मैं !

17.3.14

रेत के टीले पर - II

हवाएं हैं यहाँ की रेतीली  
चेहरे पर आतीं गर्म सनसनातीं 
कितना भी रगड़ो आँखों को 
फिर भी नहीं दिखता कुछ 
रेत के समुन्दर के सिवा

न जाने कितने कश खींचे 
इन आँखों ने  इंतज़ार के 
कि इक दिन ये रेत 
बन जाएगी मनपसंद सूरत और  
उड़ती हुई बन जाएगी उसकी लट

फिर चलती है हवा सनसनाती  
के फिर ये तिलिस्म टूट जाता है 
रह जाती है कशिश ज़ेहन में 
कि बवंडर फिर सपने लिए जाता है 
नए सपने संजोने का भरोसा देकर 

कभी- कभी क़िस्सागोई भी होती है 
काली कजरारी आँखों से 
फ़लसफ़े उतरते सीधे दिल से दिल तक 
यूँ अपने अक्स में खोने का नशा 
रोक लेता है मुझे रेत के टीले पर

तुम आती रहना यूँ ही पूर्णिमा में
इन टीलों पर मेरे पास लहककर 
तुम्हारा आना - तुम्हारा जाना 
मुझसे मेरी मुलाक़ात कराता रहेगा 
चाँद* का इस दिल में दीदार कराता रहेगा  


* चाँद - भारतीय दर्शन के अनुसार पूर्णिमा का चाँद आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है।