22.11.12

जीवन की जीत और 'एक मौत' की हार

सोच रही थी कि  कसाब के बारे में कुछ न लिखूंगी ... बोर हो गए हैं - टी वी , नेट और मोबाईल हर जगह कसाब - कसाब से . पर आज कसाब की चाचीजी ने उकसा ही दिया कुछ बोलने को . 

टी वी पर खबर सुनते ही चीख निकल गई " कसाब को फांसी हो गई ..." , बताइए , पता ही नही चला। मुझे कुछ ख़ास अच्छा नही लगा कसाब का मरना . पता नही क्यों ... मुझे यह भी हिंसा ही लगी शायद इसलिए। ऐसा विचार कसाब के मृत दोस्तों के लिए नही आया क्योंकि उन्हें कमाण्डो और पुलिस ने हमले के वक्त ही मार दिया था। तो कसाब के मरने का क्या ग़म ... शायद इतने दिन तक उसके बारे में पढ़ कर, उसके परिवार, उसकी बेरोजगारी के बारे में पढ़कर उससे सहानुभूति हो गई थी मुझे। 

विश्व के 127 देशों ने अपने देश में फाँसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। भारत में भी फाँसी की सजा ' दुर्लभतम में दुर्लभ सिद्धांत ' के आधार पर दी जाती है। स्वतंत्र भारत में अभी तक 54 लोगों को फाँसी की सजा दी गई है और लगभग 100 मामले ऐसे हैं जिनमे फाँसी  की सजा दी जाए की नही पर विचार हो रहा है। कसाब के मरते ही टी वी में उन लोगों का साक्षात्कार आने लगा जो 26/11 के हमले में हताहत हुए थे। वो दृश्य ... हमला . . . पुलिस अधिकारीयों की शहादत की ख़बरें ..... हल्ला .... धुंआ .... उफ्फ्फ ... ! क्या समझ कर ये आतंक फैला रहे थे भारत में ... कि मजा आएगा .... और क्या प्राप्त किया जा सकता है इस नृशंसता से ? चाचीजी , बताइए ज़रा .. क्या भला हुआ पाकिस्तान का इस हमले से ? क्या भला हुआ कसाब का इस हमले से ? आपने अपने भतीजे के अंतिम क्षणों में उसका साथ दिया अच्छी बात है परन्तु उसे ये दिन ना देखने पड़ते यदि आपने उसे भला-बुरा सिखाया होता। 'मौत' बना दिया उसे .. और जब वो मर गया अपनी करनी से ... तो हमें दुश्मन बना दिया। 

वहीँ पकिस्तान में एक आशा की किरण चमकी है मलाला युसुफजई के नाम से . कितनी प्यारी बच्ची है . उसे देखकर लगता ही नही कि  जिस तालिबान से आपके देश के बड़े-बड़े नेता काँप जाते हैं वह बच्ची नही डरती . कहती है " मैं पढना चाहती हूँ , भले ही मुझे पढने के लिए टेबले-कुर्सी न मिले, जमीन पर बैठना पड़े पर मैं पढूंगी ". ये हुई न बात जिसपर गर्व किया जाए। मलाला युसुफजई ने पाकिस्तान की इज्जत रख ली . उसे देखकर कह सकते हैं की बिरले ही हिरण्यकशिपु के यहाँ प्रहलाद जन्म लेते हैं। बिलकुल प्रहलाद जैसा हाल है मलाला का। अच्छी बातें करनी की सजा दी गई उसे और उसकी सहेलियों को। फिर भी , मलाला अडिग है अपने निर्णय पर और आगे की परीक्षा की तैयारी अस्पताल में ही कर रही है। 




पूरे आतंकवादी संगठन और पाकिस्तान सरकार जो नही कर सकती वो इस किशोरी ने किया है " पाक का मान बढ़ाया है पूरे विश्व में ". संयुक्त राष्ट्र ने 10 दीसंबर को 'मलाला दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की है। शायद कसाब ने मृत्यु पूर्व पढ़ा हो इस किशोरी के बारे में , सिर्फ यही एहसास दिला सकती थी कसाब को कि उसने रुपये और भावनाओं के बहकावे में आकर गलत निर्णय लिया और अपने जीवन को नष्ट करने का कारण वह स्वयं था। वहीँ मलाला सकारात्मक है , वह किरण है जो अन्धकार दूर कर प्रकाश की पुनर्स्थापना करने की क्षमता रखती है। मलाला का सर पर गोली लगने के बाद भी जीवित बचना 'एक जीवन' की जीत है और कसाब की फाँसी 'एक मौत' की हार है। 

ईश्वर मलाला को दीर्घ आयु दें और पकिस्तान को इस ताज़ा फुहार से तरबतर कर दें। 

आमीन ! 

कसाब ! कुछ तो ऐसे अच्छे कर्म रहे होंगे तुम्हारे कि  भारत भूमि में समा गए। 
अलविदा !   


12.11.12

शुभ दीपावली



आपकी दिवाली सुरक्षित हो और माता लक्ष्मी सदैव आप पर अपनी कृपा दृष्टि रखें. इन शुभ कामनाओं के साथ ....शुभ हो आपकी दीपावली ।

7.11.12

अहोई अष्टमी- लड़कों की ही आयु के लिए क्यों , लड़कियों की लम्बी आयु के लिए क्यों नही ?

नारी प्रकृति प्रदत्त कोमलमना होती है. एक सुन्दर सम्मिश्रण कोमलता और शक्ति का. जहाँ कोमल मन अपनों की सुरक्षा चाहता है वहीँ अदम्य साहस संकल्प लेकर कष्ट सहते हुए भी अपनों की रक्षा करता है. दीपावली के एक सप्ताह पूर्व स्त्री के इसी पूर्ण रूप का एक और पर्व आता है जिसे 'अहोई अष्टमी' कहते हैं. यह अहोई माँ को समर्पित एक व्रत है जिसे माताएं अपनी संतान की सुरक्षा की कामना हेतु करती हैं. ऐसा ही एक और व्रत 'सं
तान सातें' भी भारत में किया जाता है.

अहोई अष्टमी या होई आठे का व्रत विशेषकर पुत्रों की लम्बी आयु के लिए किया जाता है. प्रश्न उठता है की लड़कों की ही आयु के लिए क्यों , लड़कियों की लम्बी आयु के लिए क्यों नही ?

यह बात वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है की लड़कियां लड़कों की तुलना में ज्यादा मजबूत होती हैं शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूपों में. प्रकृति ने गर्भधारण करने की शक्ति नारी को ही दी है क्योंकि नारी दुःख, भूख और गर्भस्थ शिशु की संभाल कर सकने में पुरुषों से अपेक्षाकृत ज्यादा सक्षम है. जन्म के पश्चात देखा गया है की लड़कियां जीवन बचा जाती हैं परन्तु लड़के बिमारी या समयपूर्व जन्म में जीवित नही बच पाते हैं. सामाजिक रचना ऐसी है की स्त्री घर की देखभाल बच्चों की देखभाल करती है और पुरुष सदस्य धनार्जन करते हैं. यदि घर में पुरुष न हों तो स्त्रियों को ही कष्टों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में आवश्यक है की पुरुषों की विशेष देखभाल की जाये. और यह कौन करेगा.. निश्चित रूप से , जो स्वस्थ और कोमल मन होगा वह ही करेगा.

स्त्रियों का व्रत करना और व्रत पुरुषों ( भाई, पुत्र एवं पति ) के लिए करना स्त्री की शक्ति का प्रमाण है. व्रत की देवी भी माँ ही हैं. 'शक्ति' संसार की जननी हैं, "माँ" हैं. वे शक्ति होकर भी कोमलमना हैं, 'अन्नपूर्णा' हैं. यह कोई नियम नहीं है की स्त्रियाँ ही व्रत करें पुरुष नहीं और स्त्रियाँ अपने पुत्रों के लिए ही व्रत करें पुत्रियों के लिए नही. समस्त सृष्टि एक है. यहाँ कोई भेद नही. व्रत मात्र अपने रिश्तेदारों के लिए ही करें ऐसा भी आवश्यक नही है. सबके लिए व्रत करें, सबका उद्धार हो. अहोई माँ सबका भला करें और अपनी शीतलता से सभी संतानों ( समस्त चराचर जगत ) को सिक्त करें.