23.12.11

सदा खुश रहो !!!



जब अपना पेट भरा हो तो दूसरों को तकलीफ में देखकर ऐसे ही हंसी आती है, घर में दूध की कमी नहीं है, चमचों की कमी नहीं है. इनका तो बस एक ही फलसफा है हमें सिखाने के लिए, " द शो मस्ट गो ऑन " . लोग मरते हैं तो  मरें , चाहे अनशन करके या भुखमरी से, हमें क्या ? शोषण से मरें या आत्महत्या से, हमें क्या ? 
परन्तु हमेशा की तरह आज भी हम कल के इस शो से निराश नहीं हैं, बस एक कहावत है याद आ रही है , " जो आज हंस रहा है वो कल रोएगा ". 
- हम भारत के लोग 

21.12.11

Mumma Vs. Amma



खाद्य सुरक्षा बिल ( Food Security Bill ) किसी भी जिम्मेदार और जनकल्याणकारी सरकार का प्रमुख उद्देश्य माना जायेगा. प्रत्येक सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने कमजोर नागरिकों, अपाहिज, वृद्ध, बच्चों और अत्यंत गरीब वर्ग को खाद्य सुरक्षा प्रदान करे ताकि वे अपना जीवनयापन कर सकें. हमारे देश में आदिकाल से राजे-महाराजे और समृद्ध जन गरिबोब और असहायों को जीवनोपयोगी चीजें बाँटते आ रहे हैं, इसी प्रकार लंगर का आयोजन करना हमारे देश में बड़े आदर से देखा जाता है. 



बड़े देर से ही सही, चुनावों के मद्देनजर, कांग्रेस जैसी पुरानी शासक पार्टी ने आखिरकार अपने खाने-पीने के अलावा नागरिकों के खाने-पीने की चिंता की है. इतना अच्छा बिल आ रहा है परन्तु कोई ख़ुशी नहीं हो रही है, हम सब जानते हैं कि आज के हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस के पास खिलाओ और खाओ के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. श्रीमती इंदिरा गाँधी पहली नेता थीं जिन्होंने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया था, बात ७० के दशक की है, बड़ा लोकप्रिय नारा है,' था' नहीं लिख सकती क्योंकि ये नारा आज भी प्रासंगिक है. 


प्रमुख अर्थशास्त्री पाई पानान्दिकर भी खाद्य सुरक्षा बिल से  असंतुष्ट हैं क्योंकि उनका मानना है कि रोजगार देना ही खाद्य सुरक्षा है.  बात सही है, परन्तु सर, वृद्ध और बच्चे, अत्यंत अपंग रोजगार खोजने में असमर्थ होते हैं. क्या हम उनकी खाने कि जरूरतें बिना शर्त पूरी नहीं कर सकते? क्या ये राज्य ( सरकार ) का कर्तव्य नहीं है कि वो असहाय लोगों की देखभाल करे? हमारे यहाँ चलाये जाने वाले रोजगारपरक कार्यक्रम भी धांधली से भरपूर हैं सो यह बात खाद्य सुरक्षा बिल पर भी लागू होगी. तो क्या हमें इस विषय पर पहले विचार नहीं करना चाहिए क्या कि हम भ्रष्टाचार पहली फुर्सत में निपटायेंगे फिर नए कानून बनायेंगे ? 


तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने यह कहकर इस बिल का विरोध किया है कि इसमें राज्यों का हिस्सा उनकी मर्जी के बिना निर्धारित कर दिया गया है, वो अपने राज्य के अनुकूल काम नहीं कर पाएंगे. वहीँ बिहार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक चाहते हैं कि यह बिल प्रत्येक गरीब के काम आये, एक भी गरीब भूखा न सोये. सबकी अपनी-अपनी सोच है, गरीबी रेखा से नीचे आय वर्ग वाले लोगों के लिए २ रुपये किलो चावल और ३ रुपये किलो गेहूं प्रति व्यक्ति उपलब्ध करना आसान तो नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक, भारत के पास जो धान्य उपलब्ध है वह काफी हिस्सा सही तरीके से नहीं रखने की वजह से खराब हो जाता है, इतने कम दाम में अनाज देने से खाद्यान्न का अवमूल्यन ( दाम गिरना ) भी होगा.


अन्ना हजारे से निपटने के लिए सब नए-नए पैंतरे आजमा रहे हैं, गंभीरता जनता के प्रति कम और अपने प्रति ज्यादा नजर आती है. इसका खुला प्रदर्शन हम संसद में देख ही चुके हैं जब सभी सांसदों ने एक स्वर में संसद को सर्वोपरि माना था और किसी ने भी इस बात पर खेद प्रकट नहीं किया था कि संसद ६० वर्षों में भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाई है. संसद छः दशकों में देश को एक ईमानदार और कर्मठ राष्ट्रीय चरित्र देने में असमर्थ रही है क्योंकि उसका खुद का चरित्र स्वार्थपरक रहा है. गरीबों के भले के नाम पर ये अपनी जेबें गर्म करते आये हैं. शायद यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा बिल के नाम पर शीतकालीन सत्र में गर्मी के एहसास के लिए फिर गरीबों के सपने भुन्जाये जा रहे हैं. हम्म... ठंडी में भी गर्मी का एहसास !! सिर्फ और सिर्फ एहसास ही, कुछ और नहीं. 

11.12.11

अन्ना की गुप्त ऊष्मा का सुप्रभाव



इस बार के उपवास में वो बात नहीं दिख रही जो पहले थी. वो हल्ला, वो जोश, वो उत्साह, लोगों की भीड़, 'मैं भी अन्ना-तू भी अन्ना ' का नारा जैसे सब शांत हो गया है. पिछले पांच महीनों से चल रही रस्साकशी से लोग तंग आ गए हैं. कांग्रेस ने जबानी जोश दिखाकर सबको निराश कर दिया है. नेता कैसे होते हैं सबको पता है पर खुलेआम सत्ता का प्रदर्शन कर कांग्रेस ने बता दिया है कि वो जनता से ऊपर है. वह भारतीय जनता पार्टी की बड़ी बहन है और वो जो चाहे करे, उसे कोई नहीं हटा सकता है. कैसा दम्भपूर्ण आचरण है ये?
जनता इन सबसे ऊब चुकी है  इसलिए अब अन्ना हजारे के आन्दोलन में वो बात नहीं दिख रही. प्यार और विश्वास से लबरेज इस आन्दोलन को अन्ना की टीम पर लगे आरोपों ने ठंडा कर दिया है. जनता समझ चुकी है कि प्यार से बोलने पर कुछ नहीं होगा, भाजपा से भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं की जा सकती, तो क्या करें?आज अन्ना के मंच पर सभी पार्टियाँ आकर लोकपाल के मुद्दे पर अपनी राय प्रकट करेंगी जिससे यह समझने में आसानी होगी कि ये चाहते क्या है? ये केवल कांग्रेस के खिलाफ हैं या भारत की जनता भी इनके मानस में कोई अहमियत रखती है ? 
शांतिपूर्ण तरीके से प्रारंभ इस आन्दोलन को हलके से नहीं लिया जाना चाहिए.  जनता भले ही शांत दिख रही है परन्तु अन्दर ही अन्दर सुलग रही है, कोई कितना बर्दाश्त करे और क्यों करे? सरदार जी का साथ सबने दिया फेसबुक पर, घर बैठे, दिल से ..क्या सत्ता इसे समझ नहीं रही है? सब समझ रही है, वो दिन अब नहीं रहे.. अन्ना हजारे ने अन्दर से खेल खेल रहे राहुल गाँधी को खुली चुनौती दे दी है.... अबकी बार युद्ध ज्यादा धारदार होगा क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि अन्ना अनुभवी हैं और बड़ी चतुरता से एक-एक कदम रखते हैं. वे अच्छी तरह से जानते हैं कि 'सांच को आंच नहीं'. अब देखिये अन्ना की ये 'गुप्त ऊष्मा' कितनों को जलाती है और कैसे जनता के लिए जनलोकपाल पकाती है?  


अन्ना और उनकी टीम का धन्यवाद, आज उनकी वजह से पहली बार CPM , CPI, JDU को जनता को संबोधित करते सुना. हालाँकि ये बहन मायावती जितना मनोरंजक तो नहीं था परन्तु अच्छा लगा. और भी अच्छा होता अगर ऐसी चर्चा संसद में देखने को मिलती परन्तु विपक्ष को  संसद की गरिमा उसे ना चलने देने में ही समझ आती है. यहाँ खासतौर पर मैं  शरद यादव जी का उल्लेख करुँगी, उनका भाषण अच्छा लगा, वही बिहारी टच, सीधी बात नो बकवास. शरद यादवजी ने संसद में कहने के लिए कुछ बातें बचा लीं जो अच्छा लगा. काश, भाजपा और अन्य विपक्षी दल  संसद में वैसा ही जोश और प्रतिबद्धता दिखाएँ जैसी रामलीला मैदान में दिखा रहे थे. 


एक बात स्पष्ट है कि इस प्रकार की चर्चाएँ एक लोकतान्त्रिक देश के भले के लिए आवश्यक तो हैं परन्तु यह अनुचित होगा कि संसद की गरिमा को ध्यान में ना रखा जाये. कांग्रेस का इस सभा का बहिष्कार करना अनुचित नहीं कहा जा सकता है, संसद में चर्चा ना कर विपक्ष ने संसद का अपमान किया है, यह सभी बातें अन्ना हजारे के मंच के साथ-साथ संसद में सदन के सम्मुख भी कही जा सकती थीं. साथ ही, यह बात कांग्रेस को भी सोचनी होगी कि उन्हें इतना अभिमानी नहीं होना चाहिए कि बस वो आलाकमान की सुनें और जनता, सिविल सोसायटी, विपक्ष सबको दरकिनार कर दें. 


शरद यादवजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सीबीआई तो भ्रष्टाचार की चाबी है, अगर वह कार्यकुशल और स्वतंत्र होती तो २७ नहीं २७०० भ्रष्ट तिहाड़ में सजा काट रहे होते. यह जानते हुए भी सीबीआई को लोकपाल के अन्दर नहीं लाना संदेह पैदा करता है. राजनीति तो यही कहती है कि ऐसी संस्था राजसत्ता अपने पास ही रखे अतः यह अवश्यम्भावी है कि भले ही यह जनहित में न हो परन्तु होगा यही कि सीबीआई केंद्र के अधीन ही कार्य करेगी. आज की चर्चा में एक बात और उभर कर आई कि देश जातिवादी राजनीति का शिकार है और हर बात पर जात-पात का हवाला देकर हम देश को पीछे धकेल देते हैं. हमें अपनी सोच को बदलना होगा ताकि देश त्वरित गति से आगे बढे न कि वोट बैंक की राजनीति में अपना बेडा गर्क कर ले . यह अच्छा हुआ कि लोकपाल के अंतर्गत प्रधानमन्त्री को और निचले वर्ग के कार्मिकों को रखने के लिए  सब एकमत थे. ऐसे में, इन मामलों में कांग्रेस की नानुकुर करने की संभावना लगभग ख़त्म हो गई है. 


आज रामलीला मैदान में इतिहास रचा गया, अनेक दल एक मंच पर आकर जनता से अपनी बात साफ़ तौर पर बयान कर रहे थे. तथापि एक कमी खली, मंच पर जनता के साथ नेताओं के सवाल-जवाब भी होने चाहिए थे, इससे अपने देश की लोकतान्त्रिक जड़ों को और मजबूत बनाया जा सकता है. एक बात तो माननी ही पड़ेगी, ऐसा लोकतान्त्रिक संवाद सिर्फ अन्ना ही करा सकते थे कोई और नहीं. अन्ना हजारे अपने गाँव में भी चौपाल लगाते हैं और वहां सबसे स्पष्ट बातचीत की जाती है. सब सामान, सबको हक, सबका दुःख एक, एक के ज्ञान का लाभ सबको... ऐसी ही थी आज की चौपाल. बधाई के पात्र हैं वो दल और नेता जिन्होंने अन्ना से मंच साझा किया, जनता को प्रमुखता दी और अपने दंभ को किनारे कर समस्या का हल सुझाया. 


कांग्रेस को समझना पड़ेगा कि उन्होंने जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ, राहुल गाँधी को वैसा खुला मैदान नहीं मिला जैसा वो चाहते थे परन्तु यह अच्छा ही हुआ. राहुल गाँधी के लिए ये चौपाल एक सबक है, एक मौका है यह समझने का कि जनता  की आवाज़ कुचलने की बजाये अपनी आवाज़ बुलंद करें देशहित में. आश्चर्य है, विदेश में पढ़े-लिखे युवा नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं और एक गाँव में रहने वाला ७५ वर्षीय वृद्ध संचार और संवाद की ताक़त बखूबी समझ रहा है और उसका सुप्रयोग भी कर रहा है. अनेक वृद्धों और नेताओं की तरह अन्ना हजारे को फेसबुक से कोई शिकायत नहीं है. कहते हैं ना, जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरत देखि तिन तैसी. आगाज़ अंदाज़ बयां करता है, अन्ना का यह अंदाज़ भविष्य में एक अच्छे लोकपाल बिल का आश्वासन दिलाता है. अब कोई साथ दे ना दे, ये कारवां तो आगे बढ़ता चला जा रहा है अपनी मंजिल की ओर. 


# गुप्त ऊष्मा - Latent Heat

8.12.11

Sehwag, Sehwaag, Sehwaaagg !!


भारतीय टीम के धुरंधर बल्लेबाज वीरेंदर सहवाग आपकी सोच और उम्मीदों को खुली चुनौती देते हैं. ये वो कारनामा करते हैं जो कोई सोच भी नहीं सकता. नजफगढ़ के नवाब के नाम से मशहूर वीरू २१ मैचों में " मैन ऑफ़ द मैच " बन चुके हैं,  इंदौर में सहवाग ने २१९ रन बनाकर वन डे मैचों में इतिहास बना दिया है जिसे छू पाना आसान नहीं, ये हो सकता है कि वो खुद अपना रेकोर्ड तोड़ दें.  वीरू के नाम सबसे तेज २५० रन और ३०० रन का भी रिकॉर्ड है जो उन्होंने मात्र २०७ और २७८ गेंदों का सामना कर बना दिए थे. मानना पड़ेगा, दूध में शक्ति होती है. सहवाग के मैदान में उतरने के साथ ही विरोधी टीम अंतर्राष्ट्रीय टीम की  बजाय एक साधारण गली-मोहल्ला टीम लगने लगती है.

वह दिन दूर नहीं जब भारत में सहवाग के मंदिर बनेंगे और सहवाग चालीसा भी लिखा जाएगा. आज भारत को बड़ी आसानी से ४०० रन तक पहुँचाने वाले वीरेंदर सहवाग क्रिकेट के भगवान् सचिन (जिन्हें वीरू अपना गुरु मानते हैं) के सामने ही इस तरह का प्रदर्शन कर उन्हें साथ ही साथ गुरु दक्षिणा देते जा रहे हैं. गुरु और चेले की ये जोड़ी बनी रहे, धन्य हैं हम, जो अपनी आँखों से इतिहास बनते देख रहे हैं. उम्मीद है कि इनसे प्रेरित होकर युवा अन्य खेलों में भी इसी तरह के प्रदर्शन करेंगे और खेलों में भारत का उद्धार करेंगे. क्या ख्याल है, इस स्वघोषित "ओल्ड मैन"(उम्र - ३२ वर्ष) के बारे में... ये आज का अपना रिकोर्ड कितने दिनों के अंतराल में स्वयं ही तोड़ देंगे?

30.11.11

ROMANS ARE BACKKK

जीतो या मर जाओ !
हमने तो पेट पूजा कर ली है, तुमसे भी खायेंगे, नौकरी के नाम पर | इसे कहते हैं अर्थशास्त्र !

23.11.11

महंगाई का असर करें बेअसर

पिछले ३ सालों में जिस तेजी से महंगाई बढ़ी है उसे देखकर लगता है कि आज की तारीख में जिन्दा वही है जो किसी हाल में मर नहीं रहा है वर्ना इतनी महंगाई में गरीब तो क्या साधारण वर्ग के लोग भी बिना मिर्ची खाए ही सी-सी कर खाना खा रहे हैं. इस हफ्ते महंगाई की दर १०.१ प्रतिशत हो गई है.  भारत में लगभग ८ प्रतिशत औसत महंगाई दर है जो कि यह तो साबित करती है कि अब हमारे देश में क्रय क्षमता बढ़ गई है परन्तु, यह एक कागजी बात है जिसपर गर्व करना दूर की बात है, बल्कि आशंका यह है कि कहीं देश में फिर से सर्वहारा वर्ग की आत्महत्याओं का सिलसिला न शुरू हो जाये. 


इन आंकड़ों पर गौर करें, 


  • भारत में बेरोजगारी की दर ९.४ % है.
  • भारत में कुल आत्महत्याओं (२००२ - १,५४,००० आत्महत्या  ) में से एक तिहाई आत्महत्या १५-२९ वर्ष के लोगों द्वारा की जा रही हैं.
  • विश्व में सर्वाधिक ३५% गरीब भारत में निवास करते हैं.
  • विश्व बैंक के अनुसार भारत में ४२%तथा भारत सरकार के अनुसार ३२% भारतीय गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं. 
  • २००४ में १८,२४१ कृषको ने तथा २०१० में १५,९६४ कृषकों ने आत्महत्या की. 
  • महाराष्ट्र, कर्णाटक, आँध्रप्रदेश,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्याएं कीं.
  • भारत सरकार के अनुसार जो ३० रुपये प्रतिदिन कमाता है वह गरीब नहीं है जबकि सत्य तो यह है कि आज से १० वर्ष पूर्व भी ३० रुपये प्रतिदिन के हिसाब से एक दिन का खर्च चलाना संभव नहीं था.


महंगाई का रोना क्यों रोना पड़ता है ? प्राचीन काल से ही समाज गरीब और आमिर में बनता हुआ है. सर्वहारा वर्ग हर काल में रहा है, महंगाई रही है फिर आज ऐसा क्या हो गया कि इतनी हायतौबा मची हुई है ? बढती महंगाई और घटते रोजगार के अवसर, बढती महंगाई और बढती जनसँख्या, बढती महंगाई और बढ़ता दिखावा, बढती महंगाई और बढ़ता तनाव मिलकर एक ऐसा परिवेश रच रहे हैं जहाँ, बच्चे, बूढ़े, युवा कोई सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है. फिर, आज की सरकार राजा हर्षवर्धन की भांति महामोक्ष परिषद् का भी आयोजन नहीं करती है जहाँ कि राजा गरीबों को अपनी कमाई हुई दौलत प्रत्येक ४ वर्ष में दान कर देता था. आज के दौर में सब्सिडी  दी जाती है जो धीरे-धीरे कम की जा रही है.  


बढती महंगाई से बचने के कुछ उपाय इस प्रकार हैं - 


  1. ऊर्जा के नवीकरणीय(renewable) स्त्रोतों को बढ़ावा दें ताकि बिजली, पेट्रोल पर होने वाला खर्च कम किया जा सके और ये निर्धन वर्ग को भी सुलभ हों . जैसे, गोबर गैस संयंत्र, पवन ऊर्जा, पनबिजली घर, सौर ऊर्जा संयंत्र आदि.
  2. कृषकों को कृषि के सही और उन्नत तरीकों से परिचित करें ताकि पैदावार बढे साथ ही, मौसम या खाद, उर्वरक आदि के सही प्रयोग की जानकारी दें ताकि वो फसल के नुक्सान से बच सकें.
  3. गाँव के बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जाये ताकि वे भविष्य में अनेक अन्य कार्य कर कमाई के अन्य स्त्रोत खोल सकें जैसे, कृषि के साथ-साथ पशुपालन, डेयरी, सोया व्यवसाय, दही और पनीर आदि की फैक्ट्री डाल सकें. 
  4. देश के युवाओं में स्व-रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने हेतु आवश्यक धन की व्यवस्था करें और कौशल  निखारने हेतु रोजगारमूलक कार्यक्रम चलायें. 
  5. छोटे-बड़े, सफल-असफल का भेद मन से दूर करें ताकि लोगों मे विषम परिस्तिथियों में तनाव न उपजे और देश सामाजिक उथल-पुथल से बच जाये.
  6. नेता अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बजाये अपने खर्च में कटौती करें और प्रण ले कि भ्रष्टाचार ख़त्म करेंगे जिससे काली कमाई देश की जनता का जीवन न बर्बाद कर सके. जमीन और मकानों के दाम अनाप-शनाप न बढ़ें. 
  7. जमाखोरी, कालाबाजारी और भ्रष्टाचार देशद्रोह घोषित किये जाएँ. 
  8. पाश्चात्य शैली छोड़कर भारतीय जीवन शैली अपनाएं. इस प्रकार आप भौतिकता से दूर सादा जीवन जियेंगे जिससे खर्चे काबू में रहेंगे और ऐसे महंगाई के दौर में कर्ज नहीं बढेगा. 
  9. मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए समय-समय पर मजदूरी तय करें.
  10. सादा जीवन अन्य लोगों के लिए भी आदर्श बनेगा जिससे सामाजिक विषमता जीवनयापन स्तर पर सामान रहेगी.
  11. रोजगार के एकाधिक रास्ते अपनाएं ताकि आय के एक ही स्त्रोत पर पूरा भार ना पड़े. 
महंगाई घटना एक अकेले देश के बस की बात नहीं परन्तु अपने देश के हित के लिए नीतियाँ बनाना प्रत्येक शासन का परम धर्म है. नीतियाँ ऐसी बने कि केवल बड़े उद्योगपति ही नहीं अपितु, गाँव में बैठा एक किसान भी तरक्की करे, केवल देश की जीडीपी ही नहीं अपितु एक आम गृहिणी के सपने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्तिथि दर्ज करा सकें. यह असंभव या काल्पनिक नहीं है, चीन ऐसा ही देश है जो केवल कागजों में ही नहीं अपितु देश के हर घर में तरक्की कर रहा है. चीन की जनसँख्या हमसे भी ज्यादा है, उसकी तरक्की आर्थिक और सामरिक स्तर पर हमसे ज्यादा है. चीन ने अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा(१.७ ट्रिलियन $) देश में नवीकरण ऊर्जा के स्त्रोतों की तरक्की पर खर्च किया है जोकी आने वाले समय की अच्छी तैयारी है. चीन के घर-घर में खिलौना फक्ट्रियां हैं जिससे वे पूरी दुनिया के बाजार में राज कर रहे हैं. भारतीय बस सही नीतियों की उम्मीद सरकार से करते हैं ताकि वे विश्व के सामने प्रस्तुत समस्याओं से अपने दम पर लड़ सकें. इसी प्रकार कर सकेंगे हम महंगाई के असर को बेअसर. 



ज़िन्दगी

प्यार का एहसास 
एहसास से बना प्यार
पलकों में बैठी ज़िन्दगी


आँखों की चमक
भावों की धमक
अधरों में मुस्कुराती ज़िन्दगी


बालों सी रेशम
साँसों सी गरम 
हवा में तैरती ज़िन्दगी


स्वर से उपजी 
मौन से पली 
अनंत में पसरी ज़िन्दगी


न जन्म न मरण  
न विस्मरण न स्मरण
बिना किसी कारण ज़िन्दगी 



प्यार का एहसास 
एहसास से बना प्यार
पलकों में बैठी ज़िन्दगी



21.11.11

ऐंठी ही रहती जिंदगी ...



टूटते  सपने 

जुड़ती  उम्मीदें 

मझधार  में नाव  खेती  जिंदगी  ..



कमी  का  एहसास 

अधिक  का  गुमान

पचड़े  में  पड़ी  जिंदगी ..



कमतर  से मिले  उपहास 

बड़ों से  मिले दुलार 

कठपुतली  सी  झूलती  जिंदगी .... 



भलाई  के  बदले  बुराई 

बुराई  को   मिले  उपहार


ऐंठी ही  रहती  जिंदगी ...



भौतिकता  से  उपजी  जलन 

अपाहिज  का  हौसला  देख  घटती  घुटन 


पाठशाला  में  बैठी  जिंदगी ...




टूटते  सपने 


जुड़ती  उम्मीदें 


मझधार  में नाव  खेती  जिंदगी  ..

19.11.11

Bilaspur Bulaavat He.... hooooo....hooooo !!


(must watch this video)


Tithi - Devuthani Ekadashi
Place - Mere Dadaji ka Ghar (Bilaspur)
Programme - Raaut Naach
Year -  1986-93

zor se aawaaj aa rahi hai, hoooooooooooo.............hoooooo hhooooooooo. Ham bachche daudate hue baahar aaye aur apne dadaji se poocha ki kaun aaya hai? dadaji ne kaha,' ghar ka raut Amar aaya hai'. hum dekhne lage aankhen fadkar, 'magar kahan hai Amar, ye log kaun hain?'

Chhattisgarh me gwale ya doodhwale bhaiya ko raut kahte hain. Ye jis ghar me doodh pahunchate hain unse jindagi bhar ke liye jud jate hain aur apne prem aur lagaav ka pradarshan karne apne poore gwale/raaut (राऊत )  mitron ke saath saj-dhajkar Raaut Naach (राऊत नाच ) ka pradarshan karte hain. Devuthani Ekasashi se prarambh hokar yah Nach ek saptaah tak chalta rahta hai. Der raat tak Gwale ghar-ghar jaakar yah nach karte hain.

Yaduvanshi samaaj dwara kiya jane wala yah nritya apni vishesh veshbhoosha aur gaanon ke liye to jana hi jata hai apitu dekhne layak hota hai in nartakon ka utsaah. lagaataar hooooo...hooo ki dhwani kar chhattisgarhi me devi-devataon ke geet gate hain aur saath hi apne malik ko aur paise dene ke liye ukasaate hain. Sabke prati apne pyaar ko jatate hue ye ghar ke bachchon ko kandhe me uthaakar aisa naachte hain ki bas. Ham to bahut khush hote the, aaj bhi yaad hain Amar bhaiya. Jaise hi Raaut Naach ka samay aata hai, unki yaad aati hai, bas ek baat buri thi, wo nashe me dhutt hote the aur badi jor ki daru ki badboo aati thi fir bhi, wo sab bachpan ki pyari yaadon me se ek hai isliye koi shikayat nahi   [ : )

Raaut Nach ki wajah se aaj Bilaspur ki vishv patal par apni ek pahchaan ban gai hai. Aaj 34th raaut naach mahotsav Bilaspur me shuru ho raha hai. Aaiye, Bilaspur me Aapka Swagat hai. Yah tay hai ki is naach me shaamil hokar aap bhi khud ko Yaduvanshiyon ke saath nachene se nahin rok payenge.



17.11.11

यथा नाम तथा काम



अभी हाल में मीडिया में आई खबरों के अनुसार बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने एक माओवादी दंपत्ति ने आत्मसमर्पण किया है. यह दंपत्ति बंगाल के पुरुलिया, बंकुरा और अनेक जिलों में सेना के खिलाफ अम्बुश लगाकर घातक हमलों में शामिल रहा  है. मोस्ट वांटेड मायोवादी जागरी बस्के(२६ वर्ष) और उसका पति राजाराम सोरेन(३४ वर्ष) ने अपने ४ वर्षीय बेटे बहादुर के साथ IG (OB) ओ पी गुप्ता के सामने सचिवालय में आत्मसमर्पण  किया.

ममता बनर्जी ने हाल ही में राज्य में माओवादियों के लिए एक विशेष पॅकेज की घोषणा की है जिसके अनुसार वे माओवादी जो सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा से जुड़ना चाहते हैं उन्हें बंगाल सरकार पैसे, सुविधाएँ, नौकरी देगी साथ ही उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे भी वापस लेगी. इस घोषणा के बाद पहले भी ६ माओवादी ममता बनर्जी के सामने आत्मसमर्पण कर चुके हैं. यह पहली बार है कि किसी माओवादी ने सचिवालय में आत्मसमर्पण किया है. 

सचिवालय से यह दंपत्ति सीधे ममता बनर्जी के पास गई और उनके सामने आत्मसमर्पण किया.जागरी तथा राजाराम के आत्मसमर्पण से खुश ममता ने कहा कि वो चाहती हैं कि उनके भाई-बहन मुख्य धारा में लौटे और हिंसा का रास्ता छोड़ शांति की राह पकड़ें. सरकार अपने वादे के अनुसार विशेष पॅकेज के तहत उनकी मदद करेगी. ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि जागरी और राजाराम के  बेटे बहादुर को रामकृष्ण मिशन के स्कूल में भर्ती कराएंगी. 

जागरी ने बताया कि माओवादी उनकी गरीबी का फायदा उठाकर उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काते हैं और यह दावा करते हैं कि वो गरीबों के हक़ के लिए लड़ रहे हैं. माओवादी उसे उसके माँ-बाप के पास से ले गए तब वह मात्र १६ वर्ष की थी. तब से वह अनेक माओवादी हमलों में शामिल रही है. 

ममता बनर्जी हाल ही में केंद्र सरकार पर दबाव डालकर पेट्रोल के दाम कम करवाने में सफल रही हैं, यह दूसरी अच्छी खबर उनकी तरफ से आ रही है जो कि आने वाले अच्छे कल की दस्तक मात्र लगती हैं. सच में, ममता बनर्जी ने अपना नाम सार्थक कर दिया है. 





14.11.11

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!


उफ्फ्फ !! समझ ही नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरू करूँ और क्या-क्या लिखूं? वैसे तो यह समस्या हर बार आती है परन्तु यहाँ जानकारियों का अम्बार है और भावनाओं का आवेग . ऐसा हमेशा होता है कि जब कोई बात दिल के करीब होती है तो वहां दिल की ही चलती है और दिमाग बस दिल का अनुयायी बनकर अपने ज्ञान से हमारे कदम साधे रखता है. फिर, मेरी क्या मजाल कि मैं भारतीयों को चाचा नेहरु के बारे में बताऊँ. उनकी शख्सियत इतनी विशाल और प्रेमपूर्ण है कि बस उसे महसूस किया जा सकता है. वे क्या नहीं थे, एक नेता, एक अनुयायी, स्पष्टवादी, साहसी, एक लेखक और सबसे बढ़कर, हमारे चाचाजी. कितना पारिवारिक माहौल था उस वक़्त, हमारे नेता हमारे रिश्तेदार थे, हमारे घर के बड़े. वो हमारी कमजोरियां दूर करना चाहते थे, वो हमें आगे बढ़ने और सम्मानपूर्वक जीने की राह दिखाने वाले होते थे और अपने विचारों और उच्च चरित्र से हमें प्रभावित कर हमारा मार्गदर्शन करते थे. 

नेहरूजी से मेरा व्यक्तिगत रूप से परिचय तब हुआ जब मैंने उनकी एक किताब पढ़ी, 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' जिसमे उनके जेल प्रवास के दौरान इंदिरा गाँधी को लिखे पत्रों का संकलन है. यह जानना रोचक होगा कि यह किताब मैंने इसलिए पढ़ी क्योंकि मुझे इतिहास विषय में रुचि नहीं थी और मुझे  राजाओं के नाम, कुल और तारीखें याद करना बेहद दुश्वार लगता था. मैंने सोचा कि क्यों न ये किताब पढूं ताकि इतिहास से मेरा परिचय अलग प्रकार से हो नाकि पाठ्य पुस्तक के रूप में. परन्तु नेहरूजी द्वारा लिखित पत्रों के इस संकलन से मैं अनेक रूप से प्रभावित हुई. सबसे पहले तो यह बड़ा अजीब लगा कि एक व्यक्ति जेल में बैठकर अपनी बेटी को ख़त में विश्व इतिहास लिख रहा है नाकि व्यक्तिगत संवेदनाएं प्रकट कर रहा है, दूसरी बात यह कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? तीसरी बात, इतिहास केवल तारीखें नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है उसकी सीख जिसके कारण यह विषय उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि विज्ञान. 

समय के साथ जैसे-जैसे मेरी जानकारी बढ़ी, मुझे इस पत्र का सार समझ आने लगा. नेल्सन मंडेला भी जेल में खाली नहीं बैठते थे, अपना काम पूरा कर २७ वर्ष के लम्बे जेल प्रवास के दौरान उन्होंने अद्भुत साहित्य रचा, यही कार्य जवाहरलाल नेहरु और अन्य क्रन्तिकारी भी कर रहे थे. जेल से लिखे उनके पत्र देश की आंदोलनरत जनता  के लिए सन्देश होते थे जिसके माध्यम से वे क्रांति की मशाल जेल से भी जलाए रखते थे. इस प्रकार वो अपने निजी और सामाजिक दायित्व दोनों ही निभाते थे.  साथ ही, यह भी सन्देश देते थे कि परिस्तिथियाँ चाहे जैसी भी हों, हमें हार नहीं माननी है और अपने उद्देश्य में सदैव संलग्न रहना है. यही होती है एक सच्चे मानव की पहचान. 

इन पत्रों में लिखीं कुछ बातें मुझे आज भी याद हैं, पहली, उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा को लिखा कि हम समझते हैं कि नेपोलियन महान था, वह विश्व विजेता था और वह कभी कोई युद्ध नहीं हारा परन्तु यह गलत है. वह अपना आखिरी युद्ध  वाटरलू में हार गया था जबकि भारतीय सम्राट समुद्रगुप्त अपने जीवन में कभी कोई युद्ध नहीं हारा. अतः वह नेपोलेयाँ से भी महान शासक और योद्धा था. ये एक अच्छा विचार था भारतियों को उनके अतीत से मिलाने का और उनके अन्दर स्वाभिमान और स्फूर्ति भरने का जिसे अंग्रेज पूरी तरह कुचल देना चाहते थे. अपने पत्रों में उन्होंने इतिहास का केवल तारीखों से नहीं अपितु उससे मिलने वाली शिक्षा को समझाते हुए घटनाओं का वर्णन किया था जिससे मुझे यह पता चला कि हमें स्कूल में इतिहास पढ़ाते क्यों हैं. यही जानना जरुरी था, उसके बाद मेरी स्वयं ही इतिहास में रुचि हो गई और मैं प्राचीन घटनाओं को अलग नजरिये से देखने लगी. 

आज का दौर देखती हूँ तो लगता है कि हमने नेहरूजी के सपने, उनके बलिदान  को और उनकी सीखों को पूरी तरह भुला दिया है. हमारे बच्चे चरित्रवान बनें यह उद्देश्य केवल जिम्मेदार माता-पिता का ही रह गया है, देश के नेता केवल अपनी सोच रहे हैं. बाल मजदूरी, वैश्यावृत्ति, निरक्षरता, कन्या भ्रूण हत्या ने देश को विश्व पटल पर शर्मसार कर दिया है. हमारे बच्चे पढ़ाई के नाम पर मात्र अक्षर ज्ञानी हो रहे हैं, विज्ञान रटा है परन्तु उसका सामाजिक उपयोग नहीं कर रहे है, इतिहास पढ़ा है परन्तु उससे सबक नहीं लेते,  अर्थशास्त्र पढ़ा है परन्तु गरीबों की भलाई में उसका उपयोग कभी नहीं किया और नाहीं ऐसी किसी बात में उनकी रूचि है. किसी की तकलीफ महसूस करना और उसकी मदद करना तो दूर, उसकी हँसी उड़ाने और उसे ज्यादा तकलीफ देने को ही आत्मविश्वास समझते हैं. 

सामाजिक मूल्यों के ह्रास के इस दौर में वो बच्चे जो आज युवा हो गए हैं, किसी सक्षम नेतृत्व का इंतज़ार कर ही रहे थे कि अन्ना आये. लाखों, करोणों युवा पूरे देश से उनके समर्थन में खड़े हो गए. वे लोग जो एकांकी होकर समाज सेवा कर रहे थे एक सूत्र में बांध गए. इसमें योगदान उन युवा खेल प्रतिभाओं का भी है जो अपने विश्वस्तरीय प्रदर्शन से देश को उत्साहित करते रहे और अपने अदम्य साहस से कुटिल राजनीति से जीतकर देशवासियों में देशप्रेम के जज्बे और साहस का प्रसार करते रहे वरना आज हमारा भी वही हाल होता जो पाक क्रिकेट टीम का हुआ है. हमारे देश के जवान लगातार  बाहरी और भीतरी शत्रुओं का साहस के साथ सामना कर रहे हैं. देश में आध्यात्मिक चेतना का संचार हुआ है जिससे कि लोगों की संकुचित सोच में बदलाव आया है जिससे आगे चलकर अवश्य लाभ ही होगा. देश के युवा उद्यमी और नौकरीपेशा युवाओं से देश को बहुत उम्मीदें हैं. आर्थिक विकास आंकड़ों से बढ़कर गरीबों के लाभ तक पहुंचे और महंगाई न बढे तभी होगा सच्चा जन्मदिवस चाचा का. अभी हमें देश के लिए और देश के बच्चों के लिए बहुत कुछ करना है. इस उम्मीद के साथ कि हम अपनी कमजोरियां दूर करेंगे और एक बेहतर भारत का निर्माण करेंगे, आप सभी को बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

13.11.11

Lazy Sunday


Amul Baby to Angry Man



एक युवा कांग्रेसी नेता के रूप में राहुल गाँधी अपने पिता राजीव गाँधी और दादी इंदिरा गाँधी से ज्यादा खुशनसीब हैं. उन्हें मौका मिला है राजनीति समझने का और अपनी टीम तैयार करने का ताकि जब वो कोई जिम्मेदारी का पद लें तो अनुभवी भी हों और उनकी एक टीम हो जो उन्हें सहयोग और समर्थन देती रहे. परन्तु इतनी तैयारी के बाद भी राहुल गाँधी अपना वह स्थान नहीं बना पाए हैं जिसकी उम्मीद थी. क्या कारण है कि उनका अब पहले जैसा करिश्मा नहीं रहा. कहाँ चूक गए राहुल गाँधी?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस का गढ़ रहा है. खुद नेहरुजी फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते थे, राजीव गाँधी भी उत्तर प्रदेश के अमेठी से चुनाव लड़ते थे. इस सबके बाद भी एक तबके विशेष ने उनके पुरखों की जमीन हिलाकर कांग्रेस को यह अच्छे से समझा दिया है कि वे निचले तबके के अनपढ़ लोग जरुर हैं परन्तु इतने भी भावुक नहीं हैं कि कोई उनकी बात समझ रहा है कि नहीं और उनकी दिशा और दशा सुधार रहा है कि नहीं वे ना समझ सकें. कांशीराम, मायावती, मुलायम सिंह ऐसे ही नहीं आगे बढ़ गए, उन्हें आगे बढ़ाया कांग्रेस की गलत नीतियों ने.


कांग्रेस हमेशा जाति और समुदाय का कार्ड खेलती है और फिर धर्मनिरपेक्ष बन जाती है. कांग्रेस का यह ढोंग खुद उस पर भारी  पड़ गया जब क्षेत्रीयतावाद भारत में पैर फैलाने लगा. इसकी जिम्मेदार भी कांग्रेस है. भारत में केवल नेहरुजी और गांधीजी ही भारतीयता का प्रतीक  नहीं हैं अपितु अनेक लोग हैं, जैसे, रबिन्द्र नाथ टैगोर, भगत सिंह, बिरसा मुंडा, महादेव गोविन्द रानाडे, शिवाजी आदि परन्तु अपने निजी स्वार्थ के लिए कांग्रेस ने इन सबके नाम प्रचारित करना उचित नहीं समझा. साथ ही, दिल्ली की राजनीति में सभी कार्यकर्ताओं को पीसा जिससे क्षेत्रीय समस्याएँ बलवती हुईं.

आज भी, जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरा देश एक हो गया था और गांधीजी के ही अहिंसक तरीके से आन्दोलन कर रहा था तो कांग्रेस का ध्यान आन्दोलन कुचलने में लगा था, इस देश में धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब अहिंदू होना कैसे हो गया ? बाबा रामदेव के आन्दोलन को समर्थन देने में कौन सी साम्प्रदायिकता भड़क रही थी, उनके साथ आर एस एस खड़ी थी तो उसमे बुरे क्या है? इस देश में तिब्बती रह सकते हैं, बंगलादेशी रह सकते हैं, नेपाली रह सकते हैं, संघी नहीं रह सकते ? ये तो बड़ी विचित्र दलील है कि अन्ना के पीछे आर एस एस है इसलिए अन्ना का आन्दोलन सही नहीं है. संसद में सभी राहुल गाँधी की और टकटकी लगाये बैठे थे परन्तु वहां भी राजनीति ने राहुल गाँधी के पैर बाँध दिए, वे सांसदों के हक में बोले भले जनता से उनकी ठन गई.

आज भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हम तो कहते हैं कि अब जिम्मेदारी ले लीजिये परन्तु वे मना कर देते हैं. क्यों? क्या वो (राहुल ) जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हैं? या यह स्वीकारते हैं कि वे जिम्मेदारी उठा नहीं पाएंगे, तो फिर औरों को क्यों कोसते हैं? केरल के चुनावों में अच्युतानंद ने उन्हें अमूल बेबी की संज्ञा दी थी. लगता है इस बार राहुल यह नहीं सुनना चाहते हैं और एक अच्छे कलाकार की भांति गुस्से वाले चित्र कांग्रेस के पोस्टर में लगवाए हैं. राहुलजी, जनता महंगाई से त्रस्त है, भ्रष्टाचार से त्रस्त है, दिग्विजय सिंह के बेतुके बयानों से त्रस्त है, आपको इन बातों पर गुस्सा क्यों नहीं आता है? अहिंसक आन्दोलन कर रहे लोगों पर रात को लाठी चलवाने वाले लोगों पर गुस्सा क्यों नहीं आता है? कुछ नहीं तो नेहरूजी का तो लिहाज कीजिये और फूलपुर को गन्दी राजनीति का अखाडा मत बनाइये. कहीं ऐसा ना हो कि जनता गुस्से में आकर आपको फूल बना दे. 

11.11.11

शांतिदूत गिलानी


मालदीव्स में चल रहे सार्क सम्मलेन में सबकी नजर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बातचीत पर टिकी थी. भारत पाक का रिश्ता हमेशा खट्टा मीठा रहा है और द्विपक्षीय वार्ता का कोई ठोस हल कभी नहीं निकला है परन्तु हर बार दोनों देशों के लोग अपने नेतृत्व की ओर आशा के साथ देखते हैं कि शायद इस बार कुछ ऐसा हो कि दोनों देशों के बीच कोई मजबूत रिश्ता बन पाए. बातों-बातों में मनमोहन सिंह ने पाक प्रधानमंत्री पर ऐसी जिम्मेदारी डाल दी है जिसे उठाना आसान नहीं है. 

दोनों देशों के मध्य यह रिश्ता कल, व्यापार और सांस्कृतिक पर सुधारा जाता है परन्तु जैसे ही बात आतंकवाद पर आती है कि दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर देते हैं. इस बार कुछ अलग हुआ, भारत के प्रधानमंत्री ने अपने पडोसी देश के प्रधानमंत्री को 'शांतिदूत' कह दिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बात दरकिनार कर दी कि पाक अभी भी आतंक का सबसे बड़ा आश्रय स्थल है, अजमल कसब को आतंकी बनाने का काम पाक की भूमि में ही हुआ है. आज भी पकिस्तान में चुनाव हिन्दुस्तान के खिलाफ जहर उगलकर ही जीते जाते हैं. 

फिर भी, यदि मनमोहन सिंह यह सोचते हैं कि दोनों देशों के आपसी समबन्ध सुधारने के लिए सकारात्मक सोच और बड़प्पन जरुरी है तो इसमें गलत क्या है. कहा भी गया है कि, 'क्षमा बडन को चाहिए, छोटों को दुलार '. अब यह गिलानीजी के ऊपर है कि वो अपने देश को सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं या अभी भी चीन की मदद से भारत को झुकाने का ही प्रयास करते हैं. चीन तो पाकिस्तान के पक्ष में है ही, यदि भारत से दुश्मनी ख़त्म कर पाकिस्तान दोस्ती बढाता है तो न केवल दोनों देशों के लोग सुकून से जी सकेंगे बल्कि ऐसी ताक़त बनेंगे कि दुनिया भी आतंकवाद से कुछ राहत महसूस करेगी.

पाकिस्तानी जमीन का इतना दुरूपयोग हो चुका है कि एकदम से तो आतंक नहीं मिटाया जा सकता परन्तु यदि पाकिस्तानी हुकूमत चाहे तो अमेरिका और भारत की मदद से इस आतंक पर एक सार्थक कार्यवाही कर सकती है. इसके लिए सबसे पहले पाकिस्तान को अपने दोहरेपन से बचकर रहना होगा क्योंकि चीन भारत को तो कंट्रोल कर सकता है परन्तु पाक के अन्दर फ़ैल रहे आतंकवाद से उसे नहीं बचा पाएगा. आज की तारीख में यह एक दिवास्वप्न अवश्य लगता है परन्तु देखा जाए तो पाक के पास इस स्वप्न को हकीकत में बदलने के अलावा और कोई रास्ता भविष्य में नहीं बचेगा क्योंकि भारत तेजी से अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत बढ़ा रहा है. ऐसे में, चीन से निपटाना भी भारत के लिए कुछ वर्षों बाद आसान होगा. देखना है कि क्या गिलानी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बातों को गंभीरता से लिया है ? या यह वार्ता भी मात्र एक कागज़ी दस्तावेज बनकर रह जाएगी. 

10.11.11

Guru Parab ki Lakh Lakh Badhaiyan !!


SAARC Summit in Maldives - Sorry Kasab !!


1983 में गठित सार्क संगठन का मुख्य उद्देश्य था दक्षिण एशियाई देशों के मध्य आपसी सहयोग और व्यापर बढ़ाना. साथ ही, सदस्य देशों के मध्य शांति सुनिश्चित करना. परन्तु ऐसा ना होकर सार्क मात्र आपसी लड़ाई का अखाडा बन गया है . जब भी मुद्दे की कोई बात हो भारत और पकिस्तान एक दूसरे को आँख दिखने लगते हैं और बैठक बेनतीजा ख़त्म हो जाती है.

आज जाकर पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मालिक ने मीडिया के सामने माना कि कसाब आतंकी है और मुंबई बम ब्लास्ट का दोषी है अतः उसे फंसी होने चाहिए परन्तु उसे पाकिस्तानी नागरिक मानने से इनकार कर दिया. जिसका मुझे बहुत दुःख है. पहले तो ये अपने बच्चों को जुर्म और नफ़रत की राह पर ले जाते है, उनकी गरीबी का फायदा उठाकर धर्म के नाम पर मरने मारने को तैयार करते हैं और जब खुद पर बात आती है तो अपने ही बच्चों से आँखें फेर लेते हैं. बड़ा आश्चर्य हुआ जानकार, जब इनमे हिम्मत ही नहीं है तो ये हिंदुस्तान से लड़ते ही क्यों है?

पाकिस्तान मुंबई हमलों के मुख्य रचयिता हाफिज़ सईद को अपने देश में सजा नहीं दिलवा पा रहा है, या दिलवाना ही नहीं चाहता. कोर्ट में कसाब ने खुद कबूला है कि हाफिज़ सईद ही ट्रेनिंग देता है और वही है मुंबई बम धमाकों का रचयिता. अब पाक किसी प्रकार से जिन्दा बम कसाब से छुटकारा चाहते हैं ताकि उनपर लगा दाग धुंधला हो जाये. इसी लिए पाक भगवा आतंकवाद की आड़ लेकर बचना चाहता है ताकि उसे आगे भी आतंक की रोटी खाने मिलती रहे. एक राष्ट्र के रूप में कितनी छोटी समझ पाकिस्तान की है यह दिख रहा है. देखना है कि कब तक चीन की मिलीभगत से पाकिस्तान भारत को आँखें दिखाता रहेगा?

सॉरी कसाब!! सच में, ये लोग किसी के सगे नहीं है, इनके लिए जान देने वालों तक के नहीं तो ये भारत से क्या पडोसी धर्म निभाएँगे? 

NO LOSS IN BIG BOSS


स्वामी अग्निवेश के बिग बॉस के घर में प्रवेश के साथ ही बिग बॉस के घर में एक बदलाव आया. शुरुवाती तौर पर तो कुछ सुकून बिग बॉस के प्रतियोगियों के चहरे पर पढ़ा जा सकता था. बिग बॉस के घर में केवल पूजा बेदी ही सामाजिक रूप से जागरुक दिखीं और स्वामी अग्निवेश को पहचान सकीं बाकि प्रतियोंगियों ने कोई पंडितजी आये हैं हाथ देखने से यही सोचा. 

आकाशदीप स्वामीजी पर बेहद अभद्र टिप्पणी कर रहे थे जो उनके व्यक्तित्व की परिचायक मात्र है, वहीँ बिग बॉस की कैप्टन श्रद्धा के हाव-भाव स्वामीजी की बातें सुन बदल गए और उनके चेहरे पर एक शांति दिखी. हम जब स्कूल में थे तो भोजन मंत्र पढ़कर ही टिफिन खोला करते थे, उस मंत्र की शक्ति आज समझ आई जब बिग बॉस के प्रतिभागी जो खाने की टेबल पर सबसे ज्यादा लड़ते हैं, आज मुस्कुरा रहे थे.

स्वामी अग्निवेश को ये भले न पहचाने परन्तु स्वामीजी निश्चित ही इनकी नासमझी को समझकर समझायेंगे और इन प्रतिभागियों को एक अल्हड व्यवहार से जिम्मेदार व्यवहार की ओर ले जाने की कोशिश करेंगे. देखते हैं, स्वामी अग्निवेश बिग बॉस में आगे क्या करते हैं और बिग बॉस के प्रतिभागी उन्हें कैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं? ये दो दिन बिग बॉस में सचमुच दिलचस्प होंगे. 

9.11.11

Swami Agnivesh in Big Boss, Good !


मैं कुछ वर्षों पहले से स्वामी अग्निवेश के बारे में पढ़ती आ रही हूँ. वे ७२ वर्ष के हैं और एक आर्यसमाजी समाजसेवी हैं. उन्होंने बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के लिए, बाल मजदूरी रोकने के लिए सार्थक कार्य किये हैं. स्वामीजी के बारे में मेरी जानकारी तब बढ़ी जब उन्होंने छत्तीसगढ़ के कुछ अधिकारीयों को माओवादियों की कैद से मुक्त कराया. सरकार और माओवादियों के बीच जब अपहरण के बदले माओवादियों कि मांगें मानने पर बात नहीं बन पाई तब स्वामी अग्निवेश ने मध्यस्थता कर अधिकारीयों को मुक्त कराया. 

इसके बाद वो चर्चा में आये जब उनकी एक सी डी समाचारों में दिखाई गई जिसमे वो लाल सलाम को सलाम कर रहे थे. मुझे उनके बयान में कोई खराबी नहीं दिखी, अगर नक्सलियों के गढ़ से अपने लोगों को छुड़ाने के लिए लाल सलाम को सलाम कह दिया तो क्या गलत किया? क्या यह जरुरी है की हम जिसे अपना नहीं समझते उसकी हर समय निंदा की जाये? मुझे तो ये बेहद दम्भपूर्ण व्यवहार लगता है. यदि हमारे दुश्मन में भी कोई अच्छाई है तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. यह भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है. रामायण में भी उल्लेख है कि श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं कि वे रावण से शिक्षा लें क्योंकि वह महाज्ञानी है. 

स्वामी अग्निवेश दूरदर्शन में एक परिचर्चा का आयोजन भी करते हैं जहाँ वे युवाओं के साथ तात्कालिक मुद्दों पर वार्ता करते हैं और अपने विचारों से उन्हें वास्तविकता से भी अवगत करते हिं और साथ ही नैतिकता के अनुरूप उस समस्या से निकलने का मार्ग भी दिखाते हैं. ऐसे में, कितना अच्छा होगा कि वो बिग बॉस के प्लेटफोर्म से अपनी बात रखेंगे. मेरे विचार में बिग बॉस जैसे शो के माध्यम से यह बात व्यापक पैमाने पर रखी जा सकती है कि झगडे कि स्तिथी होने पर उसे कैसे सुलझाया जाये और मेरे व्यक्तिगत विचार यही हैं कि स्वामी अग्निवेश इस काम के लिए उपयुक्त व्यक्ति हैं.

बिग बॉस में पहले भी श्री श्री रविशंकर और बाबा रामदेव को बुलाने का प्रयास किया गया था परन्तु उन्होंने आमंत्रण नहीं स्वीकार किया. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दो दिन के अल्पप्रवास में स्वामी अग्निवेश क्या ऐसा कोई उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगे कि आगे भी आध्यात्मिक गुरु इस मंच के जरिये एक बड़े संभ्रांत  और दिग्भ्रमित लोगों को मानवता कि राह दिखाने आयें. मैं तो कम से कम यही चाहती हूँ . कोई कैसा भी दिखता हो, सुंदरी या बलवान, है तो वो एक इंसान ही, सबको जरुरत होती है एक शांतिमार्ग की. 

6.11.11

Main 'Om' nahin bolungi, Main muslim hun !!

मेरी ६ साल की बेटी और उसकी हमउम्र दोस्त ज़ोर से लड़ रहे हैं,"मेरे गुरु का अपमान मत करो, वो सद्गुरु  हैं, हम सबके गुरु " सौम्या ने जोर से चिल्लाकर कहा. वो तेजी से शबनम की तरफ लपकी. शबनम भी कहाँ पीछे हटने वाली थी, ज़ोर से चिल्लाई, " मैं ॐ नहीं बोलूंगी, मैं मुस्लिम हूँ, मैं क्यों बोलूं ॐ ?"  

हा हा हा !!! मुझे जाकर बीचबचाव करना पड़ा. आज ईद की रात है और मुझे अपनी मुस्लिम दोस्तों की याद आ रही है. मेरी स्कूली शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में और सेन्ट जोसफ कॉन्वेंट स्कूल में हुई है. पहली स्कूल में जहाँ शुद्ध हिन्दू तरीके सिखाये जाते हैं वहीँ कॉन्वेंट स्कूलों में ईसाई धर्म पर ज़ोर रहता है. पहली स्कूल में जहाँ हमने अपने धर्म का पालन करना सीखा वहीँ कॉन्वेंट में हमारा दृष्टिकोण थोडा व्यापक हुआ. हम सभी धर्मों की सहेलियां परीक्षा के समय चर्च जातीं और ईसा मसीह से अच्छे रिजल्ट के लिए प्रार्थना करतीं (पढाई में हमारा कुछ कम ही मन लगता था). 

हम  जब बड़े हुए तो दायरा स्कूल के चर्च से बढ़कर मंदिर, गुरूद्वारे और अन्य चर्च तक भी पहुंचा. मैंने कभी मस्जिद तो नहीं देखी है परन्तु अजमेर में ख्वाजाजी के दरबार जरुर गई थी पापा के साथ. अभी तक याद है, वहां कुछ है, एक शक्ति, जिसे मैंने महसूस किया और मन्नत भी मांगी. 

पर यह सब मैं ६ साल की छोटी-सी बच्चियों को  कैसे समझाउं ? अभी तो बस यह कहकर रोक दिया कि ऐसा नहीं कहते बेटा. उसे अपने हिसाब से चलने दो, और कोई भी चीज जो आस्था से जुडी हो उसे किसी पर थोपो मत. हालाँकि योग और ध्यान का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से धर्म से नहीं है. योग और ध्यान मानव के लिए है ना कि किसी धर्म विशेष के लोगों के लिए.

खैर, शबनम हलुवा खाकर प्रसन्न हैं और फुलझड़ियां जलाने के बाद तो प्रसन्नता चेहरे से टपक रही है और घर से विदा होते-होते अपनी महंदी दिखाते हुए इठलाकर सौम्या को ईद  की दावत के लिए अपने घर भी बुलाया है. इस बात पर सौम्या भी गदगद है कि कल उसका अपनी दोस्त के यहाँ न्योता है.

आज देवउठनी एकादशी है और ईद की रात भी, हम दोनों त्यौहार मानते हैं और ज़िन्दगी का दुगुना आनंद उठाते हैं. जहाँ DIWALI में ALI हैं वहीँ RAMJAAN में RAM हैं. आप सभी को ईद की तहेदिल से मुबारकबाद और छोटी दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं !! 



4.11.11

KAUN BANEGA CROREPATI



 कौन बनेगा करोड़पति का आकर्षण पांचवे वर्ष सिर चढ़कर बोल रहा है, पूरा का पूरा हिन्दुस्तान आँखें फाड़कर देख रहा है रेवाड़ी की बंटाई. जैसे बच्चनजी  पोते के आने की ख़ुशी उसके गर्भ में रहते ही मनाई जा रही है . रेवड़ियाँ बँट रही हैं, गरीबों को, अबलाओं को, बुजुर्गों को और उन भाग्यवानों को जिनका अमिताभ बच्चनजी  के सामने बैठने का  नंबर लग जाता है. कितने आसान प्रश्न पूछ रहे हैं सिद्धार्थ बासु जैसे वो तो गरीब भारतीयों को आज के आज ही करोड़पति बनाकर ही मानेंगे.

  दिल तो करता है कि इन KBC वालों को भारत सरकार बना दें. लो, ले जाओ जितना बटोर सकते हो !!  बहुत सुन लिए कि 'तुम नालायक हो, तुम्हे नौकरी नहीं मिल सकती, तुम्हे छोकरी नहीं मिल सकती, तुम कभी चार पैसे नहीं कमा पाओगे अपने दम पर ' . अब ये बीते दिनों की बात हो गई है, जैसे प्रचार किया जा रहा था उसी तरह यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है .... याद है, tag line ? "कोई छोटा नहीं होता ". मान गए जी, ४०००, ६००० रुपयों की मामूली सी नौकरी करने वाले भी बन सकते हैं 'पञ्च कोटि महामणि'. 

 मेरे शुभचिंतक पूछते हैं कि मैं क्यों नहीं मौके का फायदा उठाती? मैंने भी वही पढाई की है जो पहले करोड़पति और पहले पञ्च कोटि महामणि ने की है, मैं भी परीक्षा के उसी स्तर पर हूँ जहाँ वो थे करोड़पति बनने से पहले.  तो मेरा जवाब है की मैं रातों रात करोड़पति नहीं बनाना चाहती ये मुझे बहुत आलसी जैसा काम लगता है , एक तरह की गम्बलिंग. दूसरे, जब अतुलनीय तकलीफ में पड़े लोगों को आगे बढ़ते देखो तो बहुत ख़ुशी होती है , मैं अपना कुछ न कुछ कर ही लूंगी ऐसा मुझे विश्वास है. अभी तो मैं उन औरतों की तारीफों के पुल बांधना चाहती हूँ जो मुझसे बहुत कम सुविधा में पढ़ती हैं और लाखों रुपये अपने बुद्धि कौशल से प्राप्त कर रही हैं.  

 यह सच है कि हमें भाग्यवादी नहीं कर्मप्रधान मानसिकता रखना चाहिए परन्तु यह कहना ही होगा कि KBC ने अनेक लोगों के बीच आशा का संचार किया है और यह उम्मीद बंधाई है कि पढ़ाई कभी बेकार नहीं जाती, छोटा कोई नहीं है, बस एक ईमानदार अवसर सामने होना चाहिए और जिन लोगों को ईमानदार अवसर ना मिले हों वो भी निराश न होकर जुझारू बन जाएँ. बस यह याद रखें कि कोयले ही हीरा बना करते हैं, छोटा कोई नहीं है  इस जग में, न हम, न तुम, ना ही कोई और. ज़िन्दगी की मिठास करोड़पति बनने से नहीं बल्कि उन प्रयासों से बढती है जो  KBC के माध्यम से बच्चनजी और सिद्धार्थ बासु कर रहे हैं. 

23.10.11

शुभ दीपावली


जले तो प्यार में, मरे भी तो प्रकाश में  
जले तो अज्ञान जले, अंतस का अहंकार हारे
दीपज्योती की है यह सीख 
 खुद जल ताकि मन  हो  गंगाजल सा निर्मल 
मन  की  जलन  बदल जाये बुराई के दहन में 
जीवन इसी का नाम है  

13.10.11

जूनको फुरुटा को समर्पित - अत्याचारी मुक्त क्यों है ?





औरत तू चुप क्यों है?  
तेरा हत्यारा मुक्त क्यों है?
आज ये, कल वो 
कभी अपने आँगन तो कभी दूजे आँगन 
तुझ पर रख बुरी नजर
वो अत्याचारी मुक्त क्यों है?

काली बन विनाश कर 
बिजली बन आघात कर 
तू चपला तू चंचला
तू विश्व की रचियता
किसका बैठी इंतज़ार कर 
जोर का प्रहार कर 

ह्रदय दहले काँप कर 
ऐसी तू हुँकार  कर 
न झुकी है तू 
ना झुकेगी तू 
अपमान कभी ना स्वीकार कर
काली बन विनाश कर
बिजली बन आघात कर 

25.9.11

फिर हुई एक देवी की अवहेलना

बिलासपुर. अरपा नदी के पुल के नीचे एक नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनकर भीड़ इकठ्ठा हो गई, पास में ही सिम्स अस्पताल में उसे भर्ती कराने पर पता चला कि यह बच्ची कुछ ही घंटे पहले पैदा हुई है और नियत समय से कुछ पंद्रह दिन पहले पैदा हुई है. बच्ची का वजन मात्र दो किलोग्राम  है.  पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है परन्तु चार दिनों बाद भी पुलिस यह नहीं पता लगा पाई है कि ये बच्ची किसकी है? यह अभी तक पता   नहीं चल सका है कि किस कारण से बच्ची को ऐसी दयनीय हालत में छोड़ा गया है? क्या यह उसके लड़की होने का कसूर है या कोई और वजह है .
  नवरात्र पर ऐसी घटना एक तरह की घृणा और शर्मिंदगी पैदा करती है. हम लड़की को क्यों छोड़ देते हैं? वो देवी हैं, लड़कों से ज्यादा अपने माता-पिता के प्रति लगाव रखती हैं और उनके काम आने को तत्पर रहती हैं. आज की लड़कियाँ घर और बाहर दोनों के काम संभालती हैं. क्या यह प्रत्येक नारी का दैवीय रूप नहीं है, एक हाथ में बच्चा, दूसरे में कडाही, तीसरे में ऑफिस की फाइल और चौथे में समाज सेवा का काम , यह कोई साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं है. और यदि नाजायज सम्बन्ध ऐसी घटना के जिम्मेदार हैं तो कहाँ है वो मर्द जो तनिक भी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता है? 
  असली माता-पिता का तो पता नहीं परन्तु कई निःसंतान दम्पत्तियों ने अवश्य उस नवजात प्यारी सी बच्ची को गोद लेने के लिए अस्पताल प्रशासन से  बात की है जो उक्त बच्ची के माता-पिता की तरह दिनरात उसकी देखरेख कर रहें हैं. अस्पताल प्रशासन का कहना है कि वो बच्ची को मातृछाया को सौंप रहें है और जो दम्पती बच्ची को गोद लेना चाहते हैं उन्हें जिले के एस डी एम को अपनी सिफारिश सौंपनी होगी. देखिये, दुनिया का खेल, यहाँ कौन अपना है और कौन पराया कह नहीं सकते. जिन्होंने जन्म दिया उन लोगों ने तो मुंह फेर लिया वहीँ जिनका उस बच्ची से कोई नाता नहीं वो उसे अपनाने के लिए तड़प रहे हैं. 


त्यौहार और परीक्षा की दोहरी तैयारी एक साथ कैसे करें?

इस हफ्ते गृहणियों के लिए ऐसी चुनौती आ रही है जिसके बारे में सोचकर ही बुखार चढ़ जाता है, माँ दुर्गा का पवित्र नवरात्री का त्यौहार और बच्चों की परीक्षा दोनों ही एकसाथ है और दोनों ही चुनौतियों में खरा उतरना प्रत्येक गृहिणी का सपना होगा ऐसे में हम आपकी सहायता करेंगे यह समझाने में कि क्या करें कि त्यौहार का काम और खुशियों के साथ-साथ बच्चों की परीक्षा की भी अच्छी तैयारी करवाई जा सके. 

  1. काम को तेजी के साथ योजना बनाकर निपटाएं.
  2. थोडा वक़्त थकान दूर करने और मनोरंजन के लिए भी निकालें.
  3. समय बर्बाद करने वाले लोगों से दूर रहें तथा उन्हें स्पष्ट कर दें कि आप अभी व्यस्त हैं अतः बाद में समय निकालकर उनसे अवश्य बात करेंगी. आपके इस स्पष्ट और मित्रतापूर्ण व्यवहार से आपका समय भी बचेगा और सम्बन्ध भी कटु नहीं होंगे.
  4. जरुरत के सामान की एक सूची बना लें ताकि पूजा की सभी सामाग्री उपलब्ध हो और पढाई के समय बच्चों को बार-बार काम के लिए ना उठाना पड़े. 
  5. बच्चों से बात कर अपना और उनका टाइम टेबल सेट कर लें ताकि आप एक-दूसरे के काम आयें और बेवजह नाराज होकर त्यौहार का मजा किरकिरा ना करें.
  6. बच्चों को रचनात्मक ढंग से काम करने की छूट दें ताकि वो उत्साह के साथ काम करें और धैर्य बनाये रखें ताकि आपसे यह व्यवहार आपके बच्चे भी सीखें और तनाव के समय में भी संयत व्यवहार करें. 
  7. बच्चों के पढ़ते समय गुस्से में ना चिलायें, इससे उनकी पढाई और समय दोनों खराब होगा और वो आपका काम अनमने ढंग से करेंगे.
  8. अपने बच्चों को हल्का खाना दें और थोड़ी थोड़ी देर में कुछ हल्का नाश्ता देते रहें जो वो खुद तैयार कर सकें ताकि आपको अपने काम के लिए भी समय मिल सके. 
  9. व्रत में उतनी ही कठोरता रखें जितना साध पायें , भगवान् भक्ति से प्रसन्न होते हैं अतः बीमारी या कमजोरी में कठोर व्रत ना रखे.

20.9.11

मुसीबतों से क्या डरना?

 क्या आप अपने जीवन को संकटग्रस्त देखकर हताश हो रहे हैं? क्या आपको ऐसा लगता है कि अब इस रात की सुबह नहीं होगी? तो समझ लीजिये कि बस अब सुबह होने को ही है और सुबह का सूर्य अपनी आभा आपके जीवन में बिखेरने के लिए बस आ ही गया है. वेदों में भी कहा गया है कि जितना सघन कीचड़ होगा उतना ही अधिक उसमे कमल के खिलने की संभावना अधिक होगी अर्थात जीवन एक नए और सफल आयाम पर पहुँचने के पहले बेहद स्याह पहलू से होकर गुजरता है.
आइये जानें कि जीवन के इस पल का कैसे सामना करें?
  1. हर हाल में हौसला बनाये रखें चाहे समस्या आर्थिक, शारीरिक या पारिवारिक क्यों न हो. कहते हैं न कि आधी जीत तो बुलन्द हौसलों से ही मिल जाती है.
  2. सदा प्रसन्न रहें और ईश्वर के दिए अनमोल उपहार याने अपने हंसमुख स्वभाव और शारीर पर तनाव का असर ना पड़ने दें.
  3. वैज्ञानिक शोध के द्वारा, यह सिद्ध हो चुका है कि जो लोग तनाव पर हावी हो जाते हैं वही तनावमुक्त और सफल जीवन जीते हैं जैसे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान एम् एस धोनी. 
  4. शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए नियमित खानपान रखें और योगाभ्यास करते रहें. इससे अनेक तरह के तनावों से छुटकारा मिलेगा. इससे दिनचर्या नियमित होगी जिसका लम्बे समय में बहुत लाभ मिलेगा.
  5. सबके सामने अपनी परेशानियों का रोना रोने की बजाये एक भरोसेमंद राजदार बनाये ताकि मन भी हल्का हो सके और अपने मित्र की सहायता से अपनी परेशानी का हल भी खोज सकें.
  6. अपने समय और धन को नेक कार्यों में लगायें ताकि बुरे वक़्त में ये आपका संबल बनें. किसी की सहायता करने से मन शांत होता है और सकारात्मकता भी बढती है. 
  7. सृजनशील व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित्त रहता है क्योंकि वो अपनी नकारात्मकता और बोरियत को नवीनता में बदल देता है अतः सृजनशील बनें. 
  8. अपनी सांगत में ऐसे लोगों को शामिल करें जिन्हें जीवन का व्यापक अनुभव हो और वो सकारात्मक हों ताकि उनका असर आप पर भी हो और आपका जीवन सही दिशा में चलता रहे.
  9. धन की बचत करें ताकि वह बुरे वक़्त में काम आये और संवेदनाओं का निवेश करें ताकि वे सामाजिक और  व्यक्तिगत जीवन में आपके लिए सफल और सुरक्षित मार्ग का काम करें.
  10. अच्छे  व्यवहार से सब प्रसन्न होते हैं अतः बात - बात पर खीज कर और मुसीबतें बढाने की बजाये हंसमुख बने रहे.

टोनही प्रथा की सच्चाई क्या है?




१२ सितम्बर को गणेश विसर्जन के दौरान किसी ने नहीं सोचा था कि वो लीलावती का आखिरी दिन है. एक गरीब विधवा स्त्री का गला उसके पडोसी ने यह इल्जाम लगाकर काट दिया कि वह टोनही है और उक्त स्त्री की ही वजह से जेठू कौशिक(हत्यारा) के घर में लगातार मौतों का सिलसिला चल रहा है. माना जाता है कि टोनही प्रथा बिहार , छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश , बंगाल के गाँव में पाई जाती है परन्तु दिनदहाड़े बिलासपुर शहर में हुई यह पहली वारदात थी.

कानून के मुताबिक, किसी महिला को टोनही सिद्ध करने के लिए यह साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है कि वह किसी एक ख़ास परिवार के विरुद्ध जादू टोने का प्रयोग कर उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयत्न करती है ताकि उक्त औरत के खिलाफ कार्यवाही की जा सके. परन्तु ऐसा देखा गया है कि टोनही प्रताड़ना प्रायः उन औरतों को झेलनी पड़ती है जो विधवा हैं और अकेले रहती हैं. उनकी जायदाद हड़पने या दुष्कर्म करने की नियत से सामर्थ्यशाली पुरुष ऐसे अनर्गल आरोप लगाकर अकेली महिला को परेशान करते हैं ताकि उसका समाज में जीना दूभर हो जाये. इन परिस्तिथियों से तंग  होकर वह स्वयं कहीं और चली जाये ताकि उसकी संपत्ति पर  कब्ज़ा किया जा सके तथा शारीरिक शोषण सरलता से किया जा सके. 

कानून इस मामले में खामोश नहीं है. किसी महिला को टोनही प्रताड़ना देने वाले व्यक्ति को ५ से १० वर्ष तक कि सजा हो सकती है और हत्या करने कि स्तिथि में धरा ३०४ के तहत हत्या का मुकदमा चलाया जाता है. टोनही प्रथा हमारे समाज पर एक कलंक है जिसे हमें मिटाना होगा. इसके लिए आवश्यक है कि हम महिलाओं के प्रति उदार नजरिया रखें तथा उनकी सुरक्षा पर विशेष ध्यान दें. ऐसे लोगों को हर स्तर पर बेनकाब करने की जरुरत है जो स्त्री को अबला समझ कर उसके साथ खेलने का प्रयास करते हैं. टोनही प्रथा भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी डायन प्रथा के रूप में विद्यमान है जिसका उन्मूलन स्त्री शिक्षा के द्वारा ही किया जा सकता है. प्रत्येक स्त्री चाहे गरीब हो या अमीर, पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़  समझना ही होगा की उसे अपने हक के लिए और उसके साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खुद  लड़ना है.   

११ अक्टूबर , २०१२ 
आज लीलाबाई कश्यप को न्याय मिल गया और दोषियों को सजा.

इस मामले में अदालत ने तीनोंआरोपियों को भादवि की धारा 302, 34 के तहत आजीवन कारावास एवं 5-5 हजार रुपए जुर्माने की सजा दी है। वहीं टोनही प्रताडऩा निवारण अधिनियम की धारा 4 के तहत उन्हें एक साल कारावास व 5-5 सौ रुपए जुर्माने से दंडित किया है। आम्र्स एक्ट की धारा 25 (1), (1 ख), ख के तहत 3 साल सश्रम कैद एवं 5-5 सौ रुपए जुर्माना किया गया है। धारा 27 (1) आयुध अधिनियम के तहत आरोपी बाप-बेटों को 3 साल कारावास एवं 1-1 हजार रुपए जुर्माने की सजा दी गई है। 

14.9.11

BHRASHTACHAAR PAR KAREN PRAHAR

मानव जाति ने अपने अस्तित्व और प्रसार के लिए अनेक युद्ध लड़े हैं, राजशक्ति से, पडोसी से, भाई से और यहाँ तक की जानवरों से भी परन्तु यह पहली बार देखने में आ रहा है कि अच्छाई और बुराई के बीच  जंग भ्रष्टाचार जैसे आत्मार्पित विषय पर हो रही है वो भी १२१ करोड़ जनसँख्या वाले लोकतांत्रिक देश में | आश्चर्य इसलिए हो रहा है की लोकतंत्र को अक्सर भीड़ तंत्र कहा जाता है, ऐसी व्यवस्था जिसमे सबको बोलने की आजादी है और इसलिए कभी किसी विषय पर जनता का एकमत होना संभव नहीं होता है |


इसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का फायदा उठाते हुए हमारे हुक्मरान  आज तक हमें आपस में धर्म, जाति के नाम पर  लड़वाते रहे हैं | उन्हें पता है की भारत की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है और यह भी कि हम आपस में ही लड़ने में सिद्ध हस्त हैं | यह सच है कि सिविल सोसायटी कुछ ५ लोगों का एक छोटा सा समूह है जो पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है परन्तु यह भी सच है की हम अन्ना हजारे, किरण बेदी, जस्टिस हेगड़े पर शक भी नहीं करते | अरविन्द केजरीवाल आज युवाओं के पसंदीदा नेता के रूप में उभर रहे हैं और भूषण परिवार अपनी चतुराई से सरकारी दांव-पेंच संभालने में सक्षम साबित हो रहे हैं वहीं सरकार के पक्ष से कपिल सिब्बल सरकार की किरकिरी करा रहे हैं | ऐसे में, जनता के लिए यह सुनहरा अवसर है जब वह एक मंच पर खड़ी होकर आपस में ना लड़े और सबकी भलाई चाहने वाले इस समूह को अपना पूर्ण सहयोग दे | 

नई पीढी को राजनीति से पूर्णतः विमुख होने से बचाने में सिविल सोसायटी का योगदान कोँग्रेस के युवराज राहुल गाँधी से कहीं ज्यादा है और सच तो यह है की बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के अनशन ने राहुल गाँधी के निम्न वर्ग के प्रति प्रेम की सच्चाई उजागर कर दी है | भ्रष्टाचार केवल ए .राजा, कलमाणी और येदियुरप्पा  की बपौती नहीं है, कई दशकों से ये एक रिवाज का रूप ले चुका है जो की देश के गरीब तबके को बहुत कष्ट दे रहा है | कहाँ से ये गरीब तबका अपनी नौकरी के लिए रिश्वत लाये? कहाँ से ये गरीब जनता घर और दुकान लगाने के लिए बाबुओं को पैसे खिलाये? दवा, दूध, तेल जैसी जीवनोपयोगी वस्तुओं में हो रही मिलावट केवल त्योहारों में पकड़ी जाती है, बाकी साल का क्या जब ये लोगों की जान से खेल रहे होते है? सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तुत तर्क कि लोकपाल निम्न स्तर के अधिकारीयों पर भी लागू हो पूरी तरह सही है | 

कोई तो उपाय होना चाहिए जिससे कि भ्रष्टाचार में लिप्त बाबुओं के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही की जा सके और उन्हें उनके किये की सजा दी जा सके | ऐसे में सरकारी लोकपाल बिल की पंगुता यही दर्शाती है कि नेता अभी तक जनता का मिजाज नहीं समझ पाए हैं अपितु सभी दलों को समर्थन में लेकर अन्ना के १६ अगस्त के उपवास को भी बाबा रामदेव के आन्दोलन की ही तरह कुचलना चाहते हैं | सोचिये तो जरा, हमारे देश में गांधीजी के प्रमुख अस्त्र अनशन को करने के लिए सरकार सिविल सोसायटी को जगह तक उपलब्ध नहीं करा रही है, क्यों भला? जब हजारों लोग फ़िल्मी सितारों का शो देखने जा सकते हैं, भारत -पाक के मैच देखने जा  सकते  हैं तो देश की भलाई के लिए हो रहे अनशन का हिस्सा बनने के लिए क्यों एकत्रित नहीं हो सकते हैं ? अन्ना हजारे ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि वो पूर्णतः अहिंसक आन्दोलन करना चाहते हैं जो व्यवस्था के खिलाफ है ना कि यूपीए के खिलाफ |

मेरी राय में, सरकार को बिना डरे जनता की  इस पहल का स्वागत  करना चाहिए और संसद में एक अच्छा मसौदा पेश करना चाहिए क्योंकि समय के साथ परिवर्तन अवश्यम्भावी है | अधिकारों से युक्त लोकपाल सभी दलों के काम आएगा, जनता का अमूल्य धन विदेशी बैंकों में ना जमा होकर देश कि संचित निधि में जमा होगा और विकास में उसका सही उपयोग होगा | हालाँकि यह सच है कि कागज़ में लिखी बातें जब हकीक़त से रूबरू होती हैं तो उतनी असरदार नहीं दिखती हैं पर कहते हैं ना, ना मामा से काना मामा अच्छा | देश एक अच्छी लोकपाल व्यवस्था चाहता है जिसमे निम्न से उच्च वर्ग तक सभी जनसेवक शामिल होने चाहिए, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज और प्रधानमत्री भी, साथ ही लोकपाल की कार्यप्रणाली पारदर्शी और दबाव रहित हो और एक निश्चित समय में जनता को न्याय दे सके | अब जनता की बारी है 'सरकार' को यह दिखाने की कि हम और भ्रष्टाचार नहीं होने देंगे | हम जहाँ हैं वहीँ से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे और अपने स्तर पर देश के इस 'दुश्मन' को भगा कर रहेंगे | सभी देशवासियों को इस मुद्दे पर सरकार द्वारा आन्दोलनकारियों के प्रति किये जा रहे दुष्प्रचार का और अत्याचार मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए और भ्रष्टाचार पर ऐसा प्रहार करना चाहिए कि यह दानव फिर कभी बेशरमों कि तरह हमारे देश के सामने ना आ सके |

भ्रष्टाचार का अंत कैसे हो ?

देश घोटालों की बौछार से त्रस्त है और ऐसे समय में अन्ना हजारे जैसे स्वच्छ चरित्र के व्यक्ति का भ्रष्टाचार के विरोध में जन सैलाब खड़ा कर देना ऐसा सुअवसर है इस पीढ़ी के लिए, जिसका भरपूर प्रयोग किया जाना चाहिए | जापान और कुछ यूरोपीय देशों में ईमानदारी राष्ट्रीय चरित्र है, हमारे यहाँ भी था, जो अब पुनः प्राप्त किया जा सकता है | इसके लिए निम्नलिखित कदम भारतीयों को उठाने होंगे -
  1. प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को ईमानदार बनाए रखे और छोटी से छोटी ईमानदारी को भी प्रोत्साहन दे | 
  2. प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचारियों का असहयोग किया जाये तथा उनको भ्रष्टाचार करने से रोकने का शांतिपूर्ण प्रयास किया जाये | 
  3. आर टी आई का सभी दफ्तरों में कडाई से पालन किया जाये |
  4. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ शिकायत करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराई जाये |
  5. छः माह से एक वर्ष के अन्दर भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई पूरी की जाये | 
  6. भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर नॉन-बेलेबल वॉरंट जारी किया जाये |
  7. आरोप सिद्ध होने की दशा में कठोर कारावास की सजा के साथ ही पूर्व प्रदान की गई उपाधियों को वापस लेने का भी प्रावधान किया जाये |
  8. लोकपाल और लोकायुक्त को आम जनता की आवश्यकताओं को देखते हुए कार्यक्षेत्र प्रदान करें तथा उन्हें स्वतंत्र, राजनितिक हस्तक्षेप से मुक्त और अधिकार संपन्न किया जाये |
  9. सभी राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी तथा कर्मी, लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त के दायरे में हों, इसी क्रम में, जज भी लोकपाल तथा लोकायुक्त के दायरे में होने चाहिए | 
  10. किसी  राजनेता पर भ्रष्टाचार सिद्ध होने पर उसे राजनीति से पूर्णतः अलग कर दिया जाये | 
  11. भ्रष्टाचारी की संपत्ति राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दी जाये |
  12. देश  के सम्मान तथा सुरक्षा से खेलने वालों को फाँसी की सजा दी जाये | 
  13. विदेशों में धन जमा करने की अनुमति देने के पूर्व सभी संदेह दूर कर लिए जाएँ तथा ऐसे खातों का निश्चित समयांतराल में पुनः परिक्षण किया जाये | 
  14. गरीबों का धन लूटने वालों को आजीवन कारावास दिया जाये |
  15. भ्रष्टाचार का रहस्योद्घाटन करने वाले आम नागरिकों तथा मीडिया को सरकार द्वारा सम्मानित किया जाये | 
  16. राष्ट्रपति, सभी जज, प्रधानमन्त्री, सभी कैबिनेट मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री तथा कैबिनेट मंत्री अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करें तथा व्यर्थ के दिखावे से दूर रहें | 
  17. मीडिया धन के अपव्यय करने वाली पार्टियों को महत्त्व ना दे क्योंकि अभी भारत भूखा है, वह धन का अपव्यय देखकर खुश नहीं हो सकता है, यह मीडिया का अपना प्रण होना चाहिए | 
' भ ' से ' भारत ' और ' भ ' से ' भ्रष्टाचार ' एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं | भ्रष्टाचार के घुन को केवल उपवास और आन्दोलनों से ही समाप्त नहीं किया जा सकेगा अपितु इसके लिए आवश्यक होगा एक सबल ईमानदार राष्ट्रीय चरित्र जो प्रत्येक नागरिक का आभूषण हो | यह कदापि असंभव नहीं है| स्वदेश की रक्षा प्रत्येक नागरिक का धर्म है और आज हमारा सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार है जिसके खिलाफ हमें एकजुट होकर लड़ना है| व्हिसल ब्लोअर बनिए, बनाइये और सुख की नींद तब तक ना लें जबतक हमारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त ना हो जाये|

यात्रा नहीं जनाब, काम कीजिये




८ सितम्बर को लालकृष्ण आडवाणी जैसे संसद के माध्यम से समाचारों में छाने को बेताब थे, उन्होंने लोकसभा में लगातार दो घोषणाएं की. पहली घोषणा थी कि वे संसद में हुए नोट कांड की जिम्मेदारी लेना चाहते हैं और इस नाते वो खुद भी जेल जाना चाहेंगे जैसा की उनके दो विधायकों को जेल भेजा गया है. और दूसरी, वो पुनः रथ यात्रा प्रारंभ करेंगे. ८२ वर्षीय नेता क्यों कह रहा है कि मुझे जेल भेजो, क्या ये अन्ना की नक़ल है, नहीं. इमर्जन्सी के दौर में पहले भी श्री लालकृष्ण आडवाणी जेल जा चुके है पर इस बार उनके लाख जोर-जोर से चिल्लाने पर भी देश से कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली और लोग समझ गए कि यह सब खेल है राजनीति का.  
लालकृष्ण आडवाणी आज भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं ना कि कोई नैतिक जिम्मेदारी लेने के इच्छुक है. देखिये न, ऐसी कोई जिम्मेदारी हमारे केन्द्रीय मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं लेते हैं और न ही आडवाणी ने अपने गृहमंत्री के कार्यकाल में ऐसा कोई उदहारण प्रस्तुत किया था जबकि इनके कार्यकाल में बेहद शर्मिंदा करने वाला ताबूत काण्ड हुआ था फिर भी ये तनिक लज्जित नहीं हुए थे. बिलकुल पी. चिदंबरम की ही तरह विशेष चाल और ढाल का प्रदर्शन करते हुए बात करते थे, तो फिर आज रिश्वत जैसे मसलों पर इतना गुस्सा क्यों?
उनकी दूसरी घोषणा थी की वो रथयात्रा करेंगे. क्यों करेंगे? इसकी अब किसे जरुरत है? देश हाई टेक हो गया है अतः अब युवाओं से जुड़ने के लिए रथ यात्रा की जरुरत ही नहीं है केवल यात्रा डोट कॉम से ही काम चलाया जा सकता है और भारत की ग्रामीण जनता एक ८२ वर्षीय नेता से क्या उम्मीद करे? ये एक भी ऐसा नेता बीजेपी से नहीं उपजा पाए हैं जो कि अपरिपक्व राहुल गाँधी को दरकिनार कर दे. जबकि अन्ना टीम के अरविन्द केजरीवाल ने मात्र ६ माह में ही लाखों युवाओं और बुजुर्गों को भी अपना मुरीद बना लिया है, ये काम बीजेपी अवसरों कि भरमार होने पर भी नहीं कर पाई है. अब ये नया कुछ कर भी नहीं पाएंगे क्योंकि अन्ना के तैयार किये माहौल का कांग्रेस इन्हें फायदा उठाने नहीं देगी. 
बात साफ़ है, अब काम ही बोलेगा, माइक और शब्द नहीं. ६० वर्षों बाद ही सही पर अब देश चुपचाप कुछ भी नहीं सहेगा. अब सबको जवाब देना होगा संसद में. काम करके दिखाना होगा अपने संसदीय क्षेत्र में और खाना खाना होगा तिहाड़ में यदि अब भी नहीं सुधारे तो. बात एकदम सीधी और सपाट है, जो काम करेगा वही मेवा खायेगा. तो मेवा खाना है तो अच्छे नेता तैयार करें जो आपको अगले चुनावों में निर्णायक बढ़त दिला सकें. 

12.9.11

बेखबर रहेंगे कब तक?



भारत में लगातार हो रहे हमले हमारी शासन व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हैं. फिर वही धमाके, देश के दिल दिल्ली में. परन्तु इस बार कुछ अलग दिखा जो पहले नहीं दिखाई दिया था और वह है अन्ना का प्रभाव. गृहमंत्री का फ़ौरन घटना स्थल जाना और प्रधानमंत्री का बेबस बयान कम से कम इतना तो बदलाव आया की जेड शेनी की सुरक्षा में बैठना ही पर्याप्त नहीं है परन्तु देश में आई प्राकृतिक और आतंकवादी आपदाएं हमें भी कुछ कह रही हैं. 

नेताओं का दोष तो है परन्तु एक नागरिक के नाते हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं अपने देश को आतंकवाद और आपदाओं से बचाने की अतः  हमें  अपनी इन जिम्मेदारियों  को निभाने के लिए ये कदम उठा सकते हैं.

  1. आपदाओं और आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए एक कार्यक्रम  तैयार  करें जो स्कूली बच्चों और युवाओं को मानसिक और शारीरिक तौर पर मजबूत बनाये ताकि वो ऐसे हालात से स्वयं निपटने में सक्षम बन सकें.
  2. गली-मोहल्लों में ऐसे समूहों का निर्माण करें जो व्हिसल ब्लोवर का काम करें ताकि देश में एकता और मजबूत हो.
  3. अवांछित तत्वों पर ये जागरूक समूह कड़ी दृष्टी रखें और तुरंत इनकी जानकारी पुलिस को दें.
  4. होटल मालिक और गृह स्वामी क़ानून का पालन करें और बिना पहचान- पत्र  के किसी को भी घर या कमरा किराये पर ना दें.
  5. विस्फोटकों की खरीद -फरोख्त पर नजर रखें.
  6. देश में धार्मिक उन्माद न फ़ैलाने दें.
  7. पुलिस और अपराध रोकने हेतु बनाई गई प्रशासनिक मशीनरी में बैठे सुस्त और लापरवाह अधिकारीयों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाये ताकि बाहरी दुश्मन हमारी कमजोरियों का फायदा ना उठा सकें.
  8. सरकार को मजबूर करें कि वह भ्रष्ट लोगों से सख्ती से निपटे ताकि देश में शांति और व्यवस्था बढे और असंतोष न पनपे.

6.9.11

मायावती की माया


अन्ना हजारे को कोसने वाली मायावती अपने मायाजाल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फंस चुकी हैं. उनके नाम से बने गार्डन पहले ही उनकी मंशा जाहित कर रहे थे और अब विकिलीक्स  का  दावा  रही  सही  कसर  निकाल  रहा  है , ध्यातव्य  है कि यूपी  में चुनाव  सर  पर  हैं , ऐसे  में  बहन मायावती  को  यह  खुलासा  सत्ताच्युत  कर  सकता  है. अन्ना  हजारे  के  आन्दोलन  ने  यह साबित  कर दिया है कि ईश्वर जाति -धर्म  में नहीं  बल्कि  इंसानियत  में बसते  हैं जिसे  समझने  की  समझ  हम भारतीयों में है. 

24.8.11

Karvan

कारवां जुड़ता गया 
राह में बढ़ते-बढ़ते

छोड़ चले थे जिन मुकामों को 
आज उन्हीं की तलाश है 

जैसे रास्ता कोई गोल बना गया
मिलते हैं तो लगता है "तुम?"

नहीं मिलते तो न पता चलता 
दुनिया 'उसकी' , राह 'उसकी' 

जिसे मैं समझी थी अपना 
वह मंजिल भी 'उसकी'

हंसती हूँ, मैं यहाँ क्यों? 
बचपन का खेल याद आ गया 

गोल-गोल रानी , इत्ता-इत्ता पानी
बोल मेरी मछली कित्ता पानी

खुश हूँ, गोल-गोल-गोल.....
इत्ता पानी..... तैरना जानती हूँ अब

15.8.11

जन लोकपाल बिल के समर्थन में एक आम भारतीय

प्रति,
श्री मनीष तिवारी,
प्रवक्ता, कांग्रेस दल 
भारत 

आदरणीय मनीषजी,
मैं ( संज्ञा अग्रवाल ) भारत की एक आम नागरिक हूँ जो कि श्री अन्ना हजारे जी के आन्दोलन के समर्थन में आपको यह पत्र लिख रही हूँ | 
मनीषजी, मैं बचपन से ही कांग्रेस की समर्थक रही हूँ और मुझे इस बात का फक्र भी है , परन्तु इस बार कांग्रेस ने मेरी उम्मीदों और विश्वास को बुरी तरह चोट पहुंचाई है जिसका मुझे अत्यंत खेद है | आप नौकरशाही से डर गए? भ्रष्ट नौकरशाहों और नेताओं को अपनी तरफ करने के लिए आपने देश की जनता को धोखा देने की कोशिश की है जो कि मुझे दुखी कर रही है |

मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप सरकारी लोकपाल बिल में आवश्यक सुधार लायें तत्पश्चात इसे लोकसभा में प्रस्तुत करें ताकि एक प्रभावी लोकपाल बिल पारित हो और हमारे देश को भ्रष्टाचार रुपी कैंसर से छुटकारा मिल सके | इस नेक कार्य को कांग्रेस खुद करे यही जनता की इच्छा है | मैं आने वाले समय को भ्रष्टाचार मुक्त देखना चाहती हूँ ताकि मेरी बच्ची अपने सामर्थ्य अनुसार उन्मुक्त आकाश में उड़ान भर सके और इस देश को अपनी सेवाएँ दे सके जो मैं भ्रष्ट लोक सेवा आयोग के निर्णयों की वजह से समय पर नहीं दे पाई | आशा करती हूँ कि आप मेरी और देशवासियों की पीड़ा समझेंगे और तदनुरूप आवश्यक निर्णय लेंगे |  

एक अन्य निवेदन यह है कि आपकी पार्टी ( क्योंकि अब कांग्रेस हमें अपनी पार्टी नहीं लगती है ) श्री अन्ना हजारेजी के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी न करे क्योंकि ऐसा कर आप देश को धोखा नहीं दे पाएंगे अपितु अपनी ही छवि और ख़राब कर लेंगे | 

एक आम भारतीय नागरिक  
संज्ञा अग्रवाल 
बिलासपुर
छत्तीसगढ़ 

यह मेल श्री मनीष तिवारीजी को भेजी जा चुकी है|