18.8.12

नूर नीरव - इन्द्रियातीत अस्तित्व


मेरी पहली सब्सक्राईबर नूर लाहोर थीं ... उनके बाद परसों तक कोई और मुस्लिम सब्स्क्राइबर नहीं था. कल से अचानक ही मुस्लिम सब्स्क्राइबर की संख्या बढ़ गई है. क्या वो मुझे मुस्लिम समझ रहे हैं या माइल्ड हिन्दू ? 

 पता नहीं , खैर.... मैं संज्ञा अग्रवाल हूँ . मुझे मुस्लिम नाम बहुत अच्छे लगते हैं परन्तु चाह कर भी मैं अपना नाम मुस्लिम नहीं रख पा रही थी क्योंकि ऐसी हिमाक़त घर में पहले किसी ने नहीं की थी कि माता-पिता का दिया नाम ही बदल दें. 

 मैंने वेद, पुराण, रामायण , गीता आदि का गहन अध्ययन नहीं किया है. जो कि हिन्दू होने के नाते मुझे करना चाहिए था. तो फिर मैं हिन्दू क्यों हूँ ? क्योंकि मेरे माता-पिता , दादा-दादी आदि हिन्दू हैं. उन्होंने भी  वेद - पुराण नहीं पढ़े हैं . फिर वो हिन्दू क्यों हैं ? मुझे बचपन से ही गौतम बुद्ध अच्छे लगते हैं. मैं बौद्ध होना चाहती थी पर ऐसा करने के पहले ही मुझे हिन्दू धर्म अच्छा लगने लगा और मैं धर्म से हिन्दू ही रह गई. या कहें कि अब ख़ुशी-ख़ुशी हिन्दू हूँ नाकि आरोपित तौर पर . 

परन्तु नाम 'नूर' रख लिया तो क्या हो गया  ? 'नूर' का मतलब होता है 'प्रकाश' , मेरे लिए नूर का मतलब है ईश्वर का प्रकाश. कई और भी विकल्प थे जैसे- फिजा, गुल, नूरी, परवीन, शमा, ग़ज़ल ... कितने अच्छे शब्द हैं ना .... परन्तु नूर जितना नूर किसी और शब्द में ना था. इसलिए मैंने नूर ही चुना. 

फेसबुक ने मुझसे सरनेम पूछा तो मैंने 'नीरव' लिख दिया. एकदम शांत ...गहरा.... शांत ... ऐसा ही लगा था जब पहली बार सद्गुरु से मिली थी. सो , नीरव मेरा चित्त हुआ. 

नाम सिर्फ टैग है... जिससे हमें पहचाना जाता है . धर्म वो है जिसकी अपनी मान्यता होती है, किताबें होती हैं , नियम होते हैं आदि. पहले मैं वो हूँ जो मैं हूँ ..  " नीरव " ... फिर हिन्दू हूँ , फिर भारतीय हूँ , फिर अग्रवाल हूँ ,फिर संज्ञा हूँ और अब " नूर " हूँ.

"नूर"  सिर्फ टैग है . मेरे पसंद का टैग. इसमें कौन सी बड़ी बात है कि आप अपनी पसंद का नाम रख लेते हैं प्रचलित नाम छोड़कर ... बिलकुल साधारण बात है. परन्तु मैं ना समझती इतनी से बात जो सद्गुरु ने मुझे शरीर और मन से अन्य  "नीरव" से ना मिलवाया होता. कहाँ है ये नीरव ... कितना बड़ा है , कैसा दिखता है.... नहीं पता ... पर है जरूर !  जो आप भी मिलना चाहते हों अपने नीरव से तो सद्गुरु की शरण में जाएँ... मन , बुद्धि , अहंकार में निहित या परे .. पता नहीं ...परन्तु आपको अपना अनंत प्राण 'नीरव' मिलेगा ज़रूर, ये वादा है. 

प्रणाम सद्गुरु !  


3.8.12

Dear Anna



हमारे देश की परम्परा के अनुसार मुझे आपको प्यारे अन्ना नहीं आदरणीय अन्नाजी कहना चाहिए.डिअर अन्नाजी, हमें आपकी पीढ़ी ने क्या दिया ? आप कहेंगे हमने देश को आजादी दी पर कैसी  आजादी , कैसा अधिकार ?लुटने का अधिकार ..... शिकायत करने का अधिकार ... आन्दोलन करने का अधिकार ... यही ना ! काश इसकी जगह दिया होता शिक्षा का अधिकार, सम्मानित जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, ऊंचे से ऊंचा उड़ने का अधिकार .  क्यों बने हैं हम एक असंतुष्ट कौम ? .. ताकि बड़े लोगों के 'अनुभवी बच्चों' की जय-जयकार कर सकें ? नीचे रहें ताकि वो ऊपर रह सकें ? भीड़ अनेक से बनी पर एक है .. क्योंकि उसकी समझ और दुःख एक है. आप जानते हैं यह मर्म इसलिए आप महामहिम किसन बाबूराव हजारेजी नहीं .. अन्ना हैं. बस , यही बात चुभ रही है सबको . सबने ज्ञान की तलवार से अपना खेल सेट कर रखा था.. कि आप आ गए और सब गड़बड़ हो गया.  आपने अनशन कर दिया .. जो इन भ्रष्ट लोगों के सपने में भी संभव नहीं है.. ऊपर से  आपने यह अनशन जनता के लिए कर दिया...  आज के स्वार्थी दौर में इतना सोचने भर में खाया-पिया बाहर आ सकता  है .


इसलिए आप डिअर अन्ना हैं अन्नाजी :)


आप जानते हैं कि चुनाव धन-बल से जीते जाते हैं . राजनीति जोड़-तोड़ का खेल है परन्तु उनके लिए जो कमजोर खिलाडी हैं. जो मजबूत होते हैं वो अपना खेल ईमानदारी से जीतते हैं. आप निश्चिन्त हैं क्योंकि आप जानते हैं कि जनता को ठग नहीं ईमानदार व्यक्ति चाहिए. ऐसा व्यक्ति अपने काम में फेल भी हो सकता है परन्तु भ्रष्ट और काईयाँ बिलकुल नहीं.. फिर अन्यायी होना तो दूर की बात है. इतने दिनों का अनुभव बताता है कि राजनीति में आते ही आप पर कीचड़ उछालने का कार्य और तेज हो जाएगा परन्तु आपको इसकी परवाह नहीं.  हमें भी नहीं है.. हमें भी पता है यह होगा. कोई बात नहीं.


आपका प्रचार जनता करेगी ... धन की क्या आवश्यकता है ? हार गए तो हार गए... कम-से-कम अब भारतवासी यह बहाना तो नहीं बना पाएंगे कि कोई अच्छा विकल्प ही नहीं था ..किसे वोट देते ? यह बहुत बड़ा परिवर्तन होगा आपके द्वारा. मैं अपने स्तर पर आपके लिय प्रचार करुँगी और इसके लिए बहुत मेहनत नहीं लगेगी... आपकी मधुर मुस्कान, ईमानदारी और निर्णय लेने की क्षमता सबको मोहित कर चुकी है. आप वामपंथियों की तरह सरकार की आलोचना मात्र नहीं करते हैं अपितु समय की नजाकत देखते हुए आन्दोलन को नए स्तर पर ले जा रहे हैं.  इस उम्र में इतनी साफ़ दृष्टि, जोश और नवाचार देखकर सभी खुश और उत्साहित महसूस कर रहे हैं.




रही बात विदेश नीति और वित्तीय नीति की तो आज जो नीतियाँ बना रहे हैं उनसे हम संतुष्ट नहीं है. ऐसा लगता है कि आज के नीतिनिर्माताओं को अपने देश पर भरोसा है ही नहीं.  देश के लिए डंडा और विदेशियों के लिए नम्र कालीनें . स्वदेशी की अवहेलना करना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना और नेतृत्व की कमजोरी को दिखाता है. हम सबको उम्मीद है कि हम कम पढ़े-लिखे (देश को चूना लगाने का ज्ञान भी नहीं ), कम  साहसी ( बेईमानी और ऊपर से धौंस दिखाने के साहस का नितांत अभाव ), ईमानदार लोग देश को अपने संकल्प से वह दे पाएंगे जो हमसे आने वाली पीढ़ी उम्मीद करती है.


डिअर अन्ना आप आगे बढ़ें , हम आपके साथ हैं.