10.6.11

Two Big Movements Running in Country

Anti Anna-Ramdev Vs. Anna-Ramdev                                                         Movement
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7.6.11

Main Chup Rawangajii

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का जीवन परिचय पढ़कर मैं उनसे और भी ज्यादा प्रभावित हो गई हूँ. बेहद होनहार विद्यार्थी थे मनमोहन सिंह. वो अपने अकादमिक करिअर में हमेशा अव्वल रहे और अपनी सभी प्रमुख उपाधियाँ उन्होंने विश्व के जाने - माने कॉलेजों से ली हैं जिनमे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. उन्होंने अपने जीवन में जो भी काम किया उसमे बेहद सफलता प्राप्त की. वर्ष १९८२-१९८५ तक वे रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे, वे योजना आयोग के सलाहकार भी रहे. राज्य सभा सांसद रहे श्री सिंह वर्ष २००८-०९ में भारत के वित्तमंत्री बने तथा भारत को लाइसेंस राज से मुक्त कर देश की आर्थिक तरक्की सुनिश्चित की. बस यहीं से वो हर भारतीय के प्रिय नेता बन गए. 
जब तेरहवीं लोक सभा के लिए चुनाव होने थे तो पूए भारत में डॉक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर आसीन देखने की चाहत लोगों में थी, सबको लगता था की इनके जैसा होशियार और ईमानदार व्यक्ति अगर देश का नेता होगा तो देश हिरण की तरह कुलांचे मारता हुआ आगे बढेगा और एक ऐसी सरकार का निर्माण होगा जोकि देश की एकता को मजबूती और स्थिरता देगी साथ ही, विकास ही सरकार का मुख्य मुद्दा होगा. थोड़े से ही समय में डॉक्टर मनमोहन सिंह ने अपनी शख्सियत का ऐसा जादू चलाया की अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अल्बरदेई से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा तक सब उन्हें दिली इज्जत देने लगे और वो फ़ोर्ब्स पत्रिका के अनुसार विश्व के १८ वें सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गए. 
ऐसे में देश की विपक्षी पार्टियाँ कोई मौका नहीं ढूंढ़ पाईं जिससे श्री सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनने  से रोक सकें और वो पुनः १४ वीं लोकसभा के प्रधानमंत्री बन गए. पर इसके बाद सब गड़बड़ होने लगी. प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार लगातार घोटालों में फंसती चली गई और हमारे ७८ वर्षीय प्रधानमंत्री सबकुछ 'बेबस' होकर देखते रह गए. बड़ा आश्चर्य हुआ कि जनता का चहेता नेता बेबस कैसे हो सकता है? उन्हें किसने बेबस कर दिया है? घटक दलों कि मांगों और तेवरों ने? तो क्या दल का नेता अपने घटक दलों कि बेबुनियाद मांगे अस्वीकार नहीं कर सकता है? बी जे पी ने राष्ट्र को बताया कि मनमोहन सिंह जी तो कठपुतली मात्र है, रिमोट कंट्रोल तो सोनियाजी के पास है तो यकीन नहीं हुआ मुझे, ऐसा कैसे हो सकता है कि इतना होशियार व्यक्ति जिसपर जनता को भरोसा  है , कठपुतली बन जाये? मुझे लगा कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता है.
परन्तु, मैं शायद गलत थी, परसों रात हुई घटना जिसने पूरे देश को हिला दिया उसपर श्री मनमोहन सिंह का कोई बयान नहीं आया. क्यों? एक देश का प्रधानमंत्री जो कि बेहद पढ़ा-लिखा है न ट्विटर पर उपलब्ध था नाही ऐसे किसी माध्यम से जनता से संवाद स्थापित कर रहा था. जबकि विश्व के सबसे बड़े देश के राष्ट्रपति जोकि शायद हमारे प्रधानमन्त्री से ज्यादा ही व्यस्त होते होंगे ट्विटर जैसे माध्यमों का प्रयोग दैनिक रूप से करते हैं. कल दिनभर मीडिया परसों रात को हुई घटना दिखाती रही जिसे देखकर सभी आहात हो गए परन्तु कांग्रेस के नेता बिना किसी झिझक के पुलिस कि बर्बरता को सही ठहराते रहे जैसी कि हमें तो सही-गलत का निर्णय करना आता ही नहीं है. कल तो ऐसा लगा जैसे कि हम भारत के नहीं लिबिया के नागरिक हैं और गद्दाफी का आतंक झेल रहे हैं. 
सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी कहाँ हैं सब? इन्हें यू पी में जो हो रहा है वो गलत लगता है और जो परसों हुआ क्या वो सही था? खैर, इन नाम के गांधीयों पर मैं नहीं जाना चाहती. मन में ये विचार उठ रहा है कि क्यों इतने पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री, जनता के प्रिय प्रधानमंत्री एक आठवीं पास सन्यासी या कांग्रेस के शब्दों में कहें तो मात्र एक योग टीचर से डर गए? इन्होने दिग्विजय सिंह कि जुबान पर लगाम क्यों ना कसी? फिर वही, 'बेबस' रहे होंगे. पर हजारों लोगों को सोते वक़्त पिटवाना इन्हें सही लगा और ये ऐसा कर भी पाए , उस वक़्त ये क्यों न 'बेबस' हो गए? आश्चर्य होता है ना ?!! कोई जवाब जैसा जवाब दीजिये प्रधानमंत्रीजी , हम आपको मजबूर नहीं बल्कि ताकतवर नेता के रूप में देखना चाहते हैं और आप अभी भी 'बेबस' हैं. पूर्व आई पी एस अफसर डॉक्टर किरण बेदी ने ठीक ही कहा है " ये लीडरशिप नहीं है, अगर आप अपनी जिम्मेदारिया नहीं उठा पा रहे हैं तो जनता को धोखा मत दीजिये". कांग्रेस चाटुकारों से भरी हुई अवसरवादीयों की पार्टी है जो ये भूल गई है की बी जे पी और आर एस एस के लोग भी भारतीय ही हैं जैसे कि कांग्रेसी. भगवा रंग किसी कि बपौती नहीं है, ये देश का स्वाभिमान है तभी केसरी रंग हमारे देश के झंडे में सबसे ऊपर है. इसको सभी को सम्मान देना चाहिए चाहे वो जिस भी 'मत' का हो. 

5.6.11

Sarkar Raaj

बाबा रामदेव द्वारा रामलीला मैदान में की जा रही शांतिपूर्ण सभा का सरकार ने जिस तरह निर्ममता से दमन किया है ऐसा लगा जैसे हम अपने देश में नहीं अपितु किसी और देश में रहा रहे हों. कोई सरकार अपने ही बच्चों पर शांतिपूर्ण सभा करने पर आंसूं गैस के गोले कैसे फेंक सकती है वह भी रात को १ बजे जबकि वह अच्छी  तरह से जानती थी कि प्रदर्शनकारियों में औरतें और बच्चे भी थे. अब ये तर्क तो बेमानी है कि हमने तो शांति से उठने को कहा था पर बाबा नहीं माने. क्यों मानेंगे भाई ? वो तो आमरण अनशन पर थे. 
खैर, जो भी हुआ अब वह बीती बात हो गई है, प्रश्न यह है कि अब आगे क्या ? जनता क्या करेगी? बी जे पी से तो जनता पहले ही आजिज आ चुकी है इसीलिए कांग्रेस ने सरकार बनाई, अब कांग्रेस भी सोनियाजी और राहुलजी के अलावा कुछ भी नहीं सोच पा रही है. इस घटना काण्ड से राजनीति में एक विरक्ति उत्पन्न हो गई है, जिस प्रकार बाबा रामदेव कह रहे हैं कि लोकपाल सही होगा इसकी क्या गारंटी है उसी प्रकार जनता ये भी जानती है कि बाबा रामदेव कि पार्टी के मंत्री भ्रष्ट नहीं होंगे की भी कोई गारंटी नहीं है. ऐसे में देश में क्या आपातकाल की स्तिथी आ गई है? 
हमारा  विश्वास न तो कांग्रेस पर है न बी जे पी पर और ना ही बिना परखे हुए बाबा रामदेवजी की पार्टी पर , हमारा विश्वास है केवल देश के संविधान पर. इन हालात पर क्या कहता है संविधान? क्या संविधान मौन है? नहीं . संविधान सबको अभिव्यक्ति की और अपनी राजनितिक पार्टी बनाने की छूट देता है. ऐसे में सिविल सोसायटी बनाकर देश की जनता को संविधान के अनुरूप चलने वाले दल को चुनना चाहिए. ये होगा कैसे? 'RIGHT TO RECALL' के जरिये. राईट टू रिकाल ऐसा अस्त्र है जिससे जनता चुनावों के २ १/२ साल बाद उन जनप्रतिनिधियों को वापस बुला सकती है जो उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं. निश्चित रूप से , कोई भी प्रतिनिधि ५ वर्षों का शासन २ १/२ वर्षों तक सीमित नहीं करना चाहेगा और इस तरह जनता को शक्ति मिलेगी और बेहतर शासन भी. 
आज की घटना ने सबको झकझोर के रख दिया है और यह भी सबक सिखा दिया है की अब जागने का वक़्त आ गया है. अब रामदेव बाबा समझ गए होंगे की उनकी लड़ाई कितने ताकतवर दुश्मन से है जिसके परिणाम स्वरुप वो और भी मजबूत होकर उठेंगे उसी तरह जैसे गांधीजी को मजबूत बनाया था अंग्रेजों की बर्बरता ने. देश की जनता सदैव ऐसे नेताओं के साथ थी और रहेगी. पर अब ये सिविल सोसायटी और बाबा रामदेव की जिम्मेदारी है की वो लोगों का भरोसा बनाये रखें. अंत में, प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंग जी से  एक ही बात कहानी है की हमें तो संसद पर भरोसा है पर संसद कब इस भरोसा का मान रखकर दिखाएगी बस इतना बता दीजिये. उम्मीद करती हूँ कि प्रधानमंत्री रात को हुए घटनाक्रम पर अपना पक्ष रखने के लिए जनता के सामने आयेंगे और जो विश्वास जनता ने उनपर किया है उसे वो नहीं तोड़ेंगे.  

2.6.11

Aakhir kab tak?

  एक प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या ने प्रश्न किया है कि जब सारे कानून इन स्वयं सिद्ध लीडर्स ने ही बनाने हैं तो पार्लियामेंट क्या करेगी? मेरे विचार से यह प्रश्न बिलकुल सही है परन्तु जहाँ विजय माल्या यह प्रश्न पार्लियामेंट कि तरफ से पूछ रहे हैं वहीँ मैं जनता कि तरफ से सोच रही हूँ कि ऐसी पार्लियामेंट किस काम कि जो ६० वर्षों में भी सही निर्णय लेना नहीं सीख सकी है. क्या पार्लियामेंट अब अपनी प्रौढ़ावस्था में नहीं पहुँच गई है ? क्या उसे अभी तक लोकपाल बिल और विदेशों में जमा भारतीय धन के बारे में खुद कोई गंभीर कदम नहीं उठा लेना चाहिए था? इन अति महत्वपूर्ण मसलों पर नियम बनाने के लिए देश को राजनीति से इतर नेताओं की जरुरत क्यों पड़ रही है? क्योंकि, हमारी पार्लियामेंट ने इन ६० वर्षों में ये सिद्ध कर दिया है कि वो सिर्फ अपने बारे में सोचना जानती है और वो जनता कि भलाई के लिए नहीं बनाई गई है.
  बेचारी जनता अपनी राजव्यवस्था के लिए नेताओं पर निर्भर है और भारत देश के अति चतुर नेता ये बात भली-भांति समझते हैं. मानाकि सभी नेता बुरे नहीं हैं पर यह बात तो तय है कि अच्छे नेता किसी काम के नहीं हैं अतः उन्हें भी बुरे लीडर्स में ही गिना जायेगा. इस प्रकार, सभी नेता जो पार्लियामेंट में आसीन हैं जनता के विश्वास के अयोग्य साबित होते हैं. ये केवल अपनी तनख्वाह बढ़ाने के विधेयक में ही फूर्ती और एकता दिखाते हैं और जैसे ही कोई बात आम जनता के हित कि होती है इन्हें ४० वर्षों लम्बी नींद आ जाती है. आज़ादी के बाद से ६४ वर्षों में भारतीय संविधान में करीब १०० संशोधन किये गए हैं परन्तु अभी भी विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र  में  एक मजबूत लोकपाल और लोकायुक्त नहीं हैं. ट्रांसपरेंसी इंटर्नेशनल २०१० के अनुसार भ्रष्टाचार में भारत का स्थान १७८ देशों में ८७ वां है , इमानदारी में भारत को ३.३ अंक मिले हैं जबकि प्रथम पायदान पर पुनः डेनमार्क  है ९.३ अंकों के साथ. 
  कोई भी देश एक सुगठित राजव्यवस्था के अभाव में तरक्की नहीं कर सकता है और एक सुगठित प्रशासन में सबसे बड़ा रोड़ा होता है व्यक्तिगत स्वार्थ पूरित निर्णय निर्माण होना. ऐसी व्यवस्था से 'सुपर पवार' होने कि कल्पना करना भी एक बेजान विचार है. यही कारण है कि भारत से लगातार प्रतिभा का पलायन अधिक अच्छी व्यवस्था वाले देशों की ओर हो रहा है. एक छोटी सी सरकारी नौकरी से लेकर ओलम्पिक कि प्रतिस्पर्धा में भाग लेने तक हर जगह बाबुओं और नेताओं कि चाटुकारिता करनी पड़ती है और एक मोटी रकम तोहफे में देनी पड़ती है. ऐसे में हर क्षेत्र में भारत का पिछड़ना स्वाभाविक है और कहीं अगर तरक्की हुई भी है तो वह व्यक्ति के स्वयं के बलबूते हुई है नाकि उसे कोई सरकारी सहायता मिली है जिसके लिए सरकार जनता से मोटी रकम टैक्स के रूप में वसूलती है. 
  भारत में ब्रिटिश डेमोक्रेसी अपनाई गई है जहाँ लोग वोट देकर किसी उम्मीदवार को अपना नेता चुनते हैं और वह नेता संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करता है. भारतीय संसद दो सदनों से बनी है जिसमे एक उच्च सदन है तथा एक निम्न सदन है . लोकसभा निम्न सदन है जोकि सीधे तौर पर जनता से जुडी होती है और नियम निर्माण में महती भूमिका निभाती है. राज्य सभा उच्च सदन है जो कि  कुछ मामलों में लोकसभा पर लगाम रख सकती है तथा अन्य विषयों में वह लोकसभा कि अनुगामी मात्र है. यह बात विगत वर्षों में साफ़ हो गई है कि यह दोनों सदन जनता कि अपेक्षाओं में खरे नहीं उतरे हैं और अब भारतीय संविधान में व्यापक बदलाव कि आवश्यकता महसूस कि जा रही है ताकि देश को मुट्टी भर नेता अपने स्वार्थ के धनी लोगों को बेच न दें. 
  स्वित्ज़रलैंड में भी डेमोक्रेसी है पर थोड़ी अलग तरह की, वहां जनता की प्रत्येक निर्णय में सक्रीय भागीदारी होती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी निर्णय लोकहित को टाक में रखकर ना किया जा सके. वहां नगरीय स्तर पर सभी निर्णय जनता के बीच वोटिंग कराकर लिए जाते हैं उसके बाद ही जनता द्वारा चुने गए नेता उक्त प्रस्ताव पर कोई क़ानून बना सकते हैं. अति महत्वपूर्ण मसलों पर भी जनता से राय लेने के बाद ही कोई प्रस्ताव देश स्तर पर कानून बन सकता है. यही वजह है कि स्वित्ज़रलैंड को विश्व के सबसे ईमानदार और अच्छे प्रशासनों में गिना जाता है. निश्चित ही हमें ऐसे मॉडल पर भी विचार करना चाहिए.  
  कुछ लोगों को यह विचार भारतीय परिप्रेक्ष्य में अटपटा व अव्यवहारिक लग सकता है परन्तु ऐसा नहीं है. क्या हम ऐसी व्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकते जिसमे किसान तय कर सके कि उसके लिए उचित नीति क्या होगी? विद्यार्थी तय कर सके कि पढाई कि कौन इस व्यवस्था उसे आगे बढ़ने में मदद करेगी? करदाता तय कर सके कि कितना कर वह स्वेच्छा से भारतीय हित में दे सकते है जिससे कि उसका अपना अहित भी न हो? ऐसा हो सकता है, ये असंभव नहीं है क्योंकि अब भारत पहले जैसा नहीं रहा.  अब यहाँ साक्षरता बढ़ रही है और जितना हम लोगो को आगे बढ़ाएंगे उतना ही वो ज्यादा समझदार होंगे. जनता नादान है कहकर अपना स्वार्थ साधने वाले नेताओं को अब साधना पड़ेगा और इसके लिए  इससे  अच्छा मौका और कब आएगा जब खुद श्री अन्ना हजारेजी और बाबा रामदेव जैसे सिद्ध पुरूष आगे आकर देश कि जनता को जगा रहे हैं. अब भारत नेताविहीन नहीं है, यहाँ के युवाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सस्ती राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है और वो अच्छे लोगों को पहचानते भी हैं और उनके साथ भी हैं.