27.5.13

'वी - द इमली पीपल '

पटेल के घर का नजारा देख रो पड़ीं सोनिया, राहुल ने दिया मां को सहारा......( समाचार )

राबर्ट वाड्रा को भी आना चाहिए था सोनिया गाँधी के साथ हताहतो का हाल जानने. खुद अपनी आँखों से देखना था कि पैसे के दम पर इतराने वालों से 'इमली पीपल' कैसे निपटते हैं. कल सोनिया गाँधी के आँसू सिर्फ नंदकुमार पटेल के लिए नहीं बहे होंगे अपितु उन्हें बरबस ही आपबीती भी याद हो आई होगी. परन्तु सोनिया गाँधी ने इससे क्या सबक लिया ? क्या अब वे समझेंगी कि अपना परिवार सुरक्षित रखने के लिए उन्हें उन अन्य परिवारों के सुख-दुःख से भी जुड़ना होगा जो दुःख के हद से पार होने के बाद कुछ भी कर सकते हैं. हालाँकि ऐसा लगता तो नहीं है क्योंकि राहुल गाँधी खुद बोल चुके हैं कि माँ ने कहा है की ताज काँटों से भरा होता है. आज भी गाँधी परिवार दलित के घर सुख-दुःख बांटने ( उनके घर खाने और सोने ) चुनावों के वक्त ही जाता है. क्या राहुल गाँधी ठीक घटनास्थल वाले गाँव में किसी आदिवासी के यहाँ जायेंगे रात को खाना खाने और सोने .. चलिए .. चुनावों के समय ही सही .. जायेंगे ? जवाब है ' नहीं ' . बात साफ़ है की आलाकमान अपने  दुःख ( और पैसा कमाओ ताकि बाथरूम और सुन्दर बन सके ) में अत्यंत दुखी है. गाँव वालों का दुःख दर्द बांटने का बहुमूल्य समय उनके पास नहीं है.



अपने राजतन्त्र को स्यूडो लोकतंत्र से चलाने वाले इन नेताओं के प्लेन चेहरे पर कल अवाक का भाव तब उभरा है जब खुद पर हमला हो गया. वैसे चीन, पाक , बांग्लादेश हो या अमेरिका ये किसी से नहीं डरे. इन्हें सिर्फ अपनी चिंता थी , है और रहेगी. तो क्या होगा नक्सली समस्या का क्योंकि नेता - अफसर - मानवाधिकार कार्यकर्ता तो सही रास्ता निकाल पाने में असमर्थ रहे हैं. ये स्वार्थी और लालची को अस्तेय और अपरिग्रह नही सिखा पाए साथ ही, बेबस लाचार को पलायन कर खुद को साबित कर दो नहीं सिखा पाए हैं.  तो क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा.. जैसे को तैसा ?

ऐसे ही चलता रहा जैसे को तैसा तो उस का जवाब होगा .. जैसे को तैसा. कहते हैं कश्मीर की वादियाँ अभी तक इसलिए बची हुई हैं क्योंकि कश्मीर सेना के हाथ में है और इस कारण उसकी पहाड़ियों का व्यापारिक सौदा नहीं हो पाता है. लगता है इसी प्रकार अब दंडकारण्य को भी बचाया जा सकेगा. तो क्या यही चाहता है इमली पीपल ? अब बहुत समय से उठ रही मांग पूरी होने को है... बस्तर सेना को समर्पित होने को है. परन्तु इससे भी समस्या नही सुलझेगी क्योंकि सेना कश्मीर की समस्या का हल नहीं बन पाई है. बस एक पिंजरा बना पाई है जिसमें आम लोग आतंकवादियों के साथ-साथ सेना के बिगड़े जवानों के आतंक को भी सह रहे हैं बेबस और लाचार होकर.

मजबूरीवश देखते जाइये तट पर खड़े इस क्रमिक नरसंहार को क्योंकि आगे अभी और भी ऐसी खबरें कतार में कड़ी हैं अपनी बारी के इन्तेजार में - ' लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बाय - वी द इमली पीपल .'
है न ?

25.5.13

एक पत्र का अवसान

२ .


बड़ी ही मुश्किल से बाहर निकल पा रहा हूँ इस तने से। ठंडी - ठंडी हवा भी मेरा कष्ट कम नही कर पा रही है।

आहा ... निकल आया। कितना अँधेरा है यहाँ चारों तरफ। ह्म्म… शांतचित्त ... विस्मय से निहारता .. थकान से चूर सो गया नवागत पत्र।

सुबह की शीतल बयार का सूर्य की कोमल रश्मियों के साथ फुगड़ी खेलते हुए और पीछे से विहंग कलरव की अजान ने नवागत का स्वागत किया। इतनी ताजगी , सुन्दरता और सम्पूर्णता जिससे पत्र स्वयं को भूपति सा महसूस कर रहा था।

पता ही नहीं चला कितना समय व्यतीत हो गया ऐसे अपलक सृष्टि को निहारते। ऊष्मा की बढ़ती मात्रा शरीर में ऊर्जा बढ़ाती जा रही है।

और .. नीचे से कुछ आवाज़ भी आ रही है .. कुछ अलग सी आवाज़ ....

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

फिर बहुत से आवाजें एक साथ स्वरबद्ध आने लगीं ..

बुद्धं शरणम गच्छामि
संघम शरणम गच्छामि
धम्मं शरणम गच्छामि

'भगवन !
ध्यान में मन नहीं लगता। कोशिश करता हूँ परन्तु मनके - मनके दुखों की माला ...... साँस रोक लेती है .. क्या करूँ ?
कुछ भी करूँ .. कितना भी करूँ .. दुःख से पार नही पा पाता।
कैसे शांति प्राप्त करूँ ? '

' वत्स !
जीवन इस क्षण है।
दुःख भी एक क्षण में था और सुख भी। उसकी इस क्षण अनुभूति करना दुःख का कारण है। सम्यक स्मृति का पालन करो अर्थात जो स्मृति योग्य है केवल उसका चिंतन मनन करो।'

' भगवन !
सम्यक स्मृति का पालन कैसे हो ? यह कार्य सरल नहीं। '

' वत्स !
सम्यक स्मृति के लिए सम्यक दृष्टि आवश्यक है। सम्यक दृष्टि ही सम्यक वाक् की ओर  अग्रसर करेगी और सम्यक वाक् , सम्यक क्रिया की ओर अग्रसर करेगा। आष्टांग मार्ग का पालन ही समाधि की अवस्था तक पहुंचा सकता है। एक ऐसी अवस्था जब दुःख आतंरिक नहीं अपितु बाह्य क्रिया हो जाएगा। '

पत्र यह वार्तालाप बड़े ध्यान से सुन रहा था प्रकृति का आनंद लेते हुए उस व्यक्ति की समीपता में जो वृक्ष के नीचे बैठा है .. एक अंतहीन 'जीवन'।

(क्रमशः)


'एक पत्र का अवसान १'

22.5.13

एक पत्र का अवसान

१ 




पत्र अवसान के उपरांत जमीन पर पड़ा है ..सूखा हुआ .. जगह जगह से मुड़ा हुआ और शांत। 
[क्या वह सचमुच में शांत है ? हाँ हाँ जी .... असीम शांत है।] 

कि तभी एक चौपाये का एक कठोर पाया उसके मृत क्षीण शरीर पर पड़ा और पत्र के चरमराने की आवाज आई। चौपाया बेखबर, बेअदब जुगाली करते आगे बढ़ गया और अपने पाप धोते हुए पत्र के मुंह पर सस्वर पवित्र गोबर कर गया। 

पत्र अब भी शांत है। तेज धूप में गोबर अब सूख गया है और उसकी गंध भी बदल गई है। कीटों का शोर बता रहा है की आज सबकी गोबर की दावत होने वाली है। सो वो भी हो गई। अचानक मौसम ने करवट ली और बारिश होने लगी। बूँद-बूँद बारिश का पानी और बारिश से उठती मिट्टी की सौंधी खुश्बू पूरे वातावरण को बदल रही थी। सूखी मिट्टी मारे ख़ुशी के बहने लगी। बूंदों की लड़ी से पेड़ों ने अपना मुंह धोया और मुस्कुराने लगे। जड़ें अपना गला तर करके आराम करने लगीं और बारिश की मार से कुम्हलाये नाजुक फूल बारिश  के ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगे। 

सब खुश थे भीगे हुए संवारे हुए खुश्बूदार ... आह्हा !!!!

इस सबके बीच हमारा पत्र सोच रहा है कि वो क्यों नही है अब खुश्बूदार और खूबसूरत सब की तरह। कोई नहीं है जिससे पूछे बताये कि उसे खुश्बू नहीं आ रही है अब ना ही ताज़ी हवा में अंगड़ाई ले पा रहा है। बस मन मसोस कर सबको देख रहा है और सबकी बातें सुन रहा है। इतना सोचना था कि हमारे वाले पत्र की शाँति भंग हो गई।

' एक समय था जब मैं हरे रंग का था, सुन्दर , गठीला और मेहनती। पानी पीता और धोंकनी सी गर्म सूर्य रश्मियों से पेड़ के लिए भोजन बनाता। सबसे आगे रहता था मैं। पक्षियों का गाना सुनता और उनके बच्चों को शाम को हवा के झोंकों से लहराकर गाने सुनाता। और अब, अब पड़ा हूँ बेबस अपने पेड़ से होकर अलग, पीला, मुड़ा- तुड़ा। '

(क्रमशः)

एक पत्र का अवसान - २

18.5.13

एक मीठी बूँद

एक मीठी बूँद
सर से अक्षुकोण तक
एक नमकीन बूँद
वहीँ अक्षुकोण पर
एक कम मीठी और कम नमकीन बूँद
अपने भार को संभालती
तेजी से लुढ़कती
गाल से ठोड़ी तक
तरबतर करती
सर से पैर तक

कुछ हल्का करते ...कहीं ...अन्दर
कुछ उजला करते ... गहनतम ... कहीं ... अन्दर
धरती का बोझ बढ़ाते
तीव्र गति से बढ़ती
कम मीठी
कम नमकीन
कम स्वच्छ
कीचड़ में बदलती

एक मीठी बूँद
नियति का क्रूरचक्र
समाती भीषण अग्नि में
सूख जाती वह
बिन राख 
कण कण बिखर

फिर कण कण जुड़ती 
बनती एक स्वच्छ बूँद 
आने सिर की सडकों पर 
मिलने पुनः अक्षुकोणों से 
करने हल्का नमकीन अक्षुजल ..
कहीं .. गहन .. अनंत विस्तार में 
समाने कीचड़ बन गंगा में 
फिर बरसने सबके ऊपर 
वहीँ उसी की जगह पर 
गंगा बनकर ......... 



17.5.13

अस्तित्व के आयाम

नर्म हरी घास
कोमल नारंगी धूप
काली पीली तितली
बैंगनी फूल
बेरंग समीर
कड़ी कत्थई शाख
नीला अम्बर
सफ़ेद कलकल दरिया
अच्छा लगता है न ?

कागज की नाव
रूमाल का पंखा
चुन्नी की साड़ी
गुड़िया की शादी
आटे की चूड़ी
हवा की चाय
बिन बात आंसू
सच्चा लगता है न ?

सबका होना
खुद का खोना
'उनका' होना
'उनका' न होना
पर भी उनका होना
दर्द में हँसना
हंसते हुए रोना
कैसा लगता है न ?

न जलना
न भीगना
न होना
न ना होना
पर होना
क्यों होना जब ना होना
समस्त उद्वेग शांत हो जाना
'शिवोहम' का गुँजन करता है न ? 

14.5.13

अनामिका - मातृछाया एक

१५ दिन से लेकर ६ साल तक के बच्चे .
कोई टोकरी में मिला , कोई अस्पताल में .. कोई पुलिस स्टेशन से लाया गया तो कोई ... कह नही सकते उस असलियत को. रोते बच्चे .. बच्चे अनेक .. संभालने वाले आवश्यकता से कुछ कम.
सरकार की मदद ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है. लोगों की मदद से सेवा भारती का ' मातृछाया ' चल रहा है.
छोटे-छोटे बच्चे .. कितने प्यारे ...  छः छः गोदी में आ गए एक साथ .. उतरने को तैयार नही ..  संयुक्त परिवार जैसे. मेरे आते-आते बच्चों ने कल चोकलेट लाना का निवेदन भी किया है और हाव-भाव ऐसे की आप मना कर नही सकते. सच में , बच्चे सब जानते हैं.
अच्छा लगा सबसे मिलकर . आप भी जुड़िये किसी सामाजिक सरोकार से . जो आपके दिल के करीब हो. निर्मल ख़ुशी प्राप्त होगी . यदि आप ' मातृछाया ' को बच्चों के उपयोग का कोई सामान देना चाहते हैं तो 'अनामिका ' से संपर्क करें.

मातृछाया
कुदुदंड
बिलासपुर

9.5.13

शून्य है लक्ष्य


व्यर्थ प्रयास
सीमा के पालन का
असीम प्राप्ति

असीम प्राप्ति
असफलता में भी
सफलता से

सफलता से
उल्लंघन मार्ग  है
सही प्रयास

सही प्रयास
यह भेद ससीम
शून्य है लक्ष्य

शून्य है लक्ष्य
मिलेगा, पूरा कर
जीवनचक्र

जीवनचक्र
कर्मखाता संघर्ष
कर प्रयास

कर प्रयास
शून्य में होजा लीन
अनश्वरता





3.5.13

चुप रहो कि अभी अपनी बारी नही आई है ..

कलियाआआआआआआ .........................

सरब्जॆत्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त ..........................

कहाँ हो तुम ............................


कलियाआआआआआआ .........................

सरब्जॆत्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त

ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह
कोई रोको इसे .................
कितनी ज़ोर की चीख
प्रेतों की रूह काँप जाये ..........

सुन लो ये चीख
देख लो कैसे माथा पीटते हैं
कैसे छाती पीटते हैं
कैसे बेबस बाप होंठ भींचे
भीड़ के सामने सम्मान बचाने
खडा हो जाता है
'अपने को' ख़ाक करने
सीख लो ......................

गर्व करो ..
हम सब एक हैं
गुजराती, पंजाबी , हिन्दू , मुसलमान
एक से मरते एक से रोते
मेरा भारत महान

मत आना 'उसके लिए'
रहने दो उसे अकेले मरते
कर दो मुनादी ..
अपने भी अकेले मरने की आज
ऐसे ही मरोगे एक के बाद एक
अकेले .. अकेले .. अकेले

मत सोचना की यह सबसे बुरा है
इससे बुरा क्या होगा ?
नही जी .. बुरा होना अभी बाकी है
बच्चों का बिक जाना याद है
पांच सौ रुपये में .. हरियाणा , बिहार में ?
अब होगा ये खेल लाखों में
शराब में धुत्त अबोध बच्चे - बच्चियां
सरहद पार शहीद होंगे
देश के लिए ...
अकेले .. अकेले .. अकेले


[ मौन को प्रणाम
 किसी ने ठीक कहा है ..
जाके पैर न पड़े बवाई .. वो क्या जाने पीर पराई ]