रघु १




गीली सी रात हो और चंद्रमा का साथ हो तो पैर खुद ही जंगलों की ओर दौड़ पड़ते थे। सिंपल सा गुलाबी सूट एक रेगुलर पैजामे और बांह तक आस्तीन में इतनी ठंड तो रोक ही लेता था कि मैं पेड़ों की हरी भरी महक का आनंद ले सकूं पर सांप सी रेंगती हवाएं मेरा कुछ ना बिगाड़ पाएं। पैरों की स्लीपर अंगूठे के दाब से ज़मीन पर पकड़ बनाए रखती। बस इतना काफी था प्रकृति के निवेदन को स्वीकार करने के लिए सो हम बांहे फैलाए गोल घूमते जंगलों में झूमने लगे। पूर्णिमा का चंद्रमा भी जैसे ताक रहा था इस पल को जैसे अपनी सदियों की बतरस की इच्छा पूरी करने की चाह हो उसकी। चंद्रमा और हम इस भीनी गीली रात में देढ़ घंटे तक बतियाते रहे पता ही नहीं चला।

घर लौटते समय एक बिल्ली भी पीछे-पीछे चल रही थी... सरसराहट की पत्तियों की आवाज.. मेरे पीछे देखते ही गुम हो जाती... शायद उसे पता था कि हम शेर से तो नहीं डरते पर रात को बिल्ली दिख जाए तो चीख निकल जाती है। काली बिल्ली और उसकी चमकती आंखें .. ह्रष्ट पुष्ट डील-डौल और दबे पांव वाली चाल ... चांदनी रात के कोहरे में भय पैदा कर देती है।

घर में आते ही घर का दरवाजा बंद किया और सीधा किचन गए गरमागरम काॅफी बनाने। शक्कर कम हो और काॅफी स्ट्रांग तो तंद्रा टूटती है और सभी इंद्रियों के दरवाज़े खुले जाते हैं। काॅफी पीते हुए टेबल पर पैर रखे ही थे कि पैर नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन पर पड़ गया। तुरंत मैगज़ीन हटाकर टेबल पर पड़ा रिमोट उठाया और लगे न्यूज़ चैनल सर्चने। अचानक लाॅक किए हुए बेडरूम के अंदर से दरवाजा भड़भड़ाने की आवाज आई। पहले तो लगा कि हवा होगी पर .. घर का दरवाजा अंदर से बंद था और बेडरूम की खिड़कियां भी बंद थीं तो समझ नहीं आया कि हवा थी या ... शायद बिल्ली...एनी वे .. वे रूम के अंदर आए कैसे ?!

कुछ समझ नहीं आया... काॅफी पीते हुए न्यूज़ देख ही रहे थे कि पहले तो लगा जैसे घड़ी के ऊपर से किसी ने हाथ दबाया और फिर.. बाएं पैर के अंगूठे में सरसराहट हुई। मेरा ध्यान फिर से बंद कमरे में गया। आसपास कोई था पर था नहीं। अपनी तृतीय दृष्टि पर ध्यान कर हमने जानने की कोशिश की कि कौन है जो बात करने की कोशिश कर रहा है?

"कौन हो बोलो?" हमने कड़क आवाज़ में पूछा।

कोई जवाब नहीं आया।

घर में अकेले... नींद आती तो कैसे ...
पानी पीने के लिए किचन जा ही रहे थे कि तीसरी आंख फड़की.. लगा कि कोई संपर्क कर रहा है...

हमने फिर पूछा,
"क्या काम है बोलो?"

एक दुबला-पतला पच्चीस एक साल का लड़का सामने आया और बोला,
"मैम! मैं हूं .. रघु!"

"क्या काम है बोलो?"

रघु - " आप मुझे जानती हैं ना मैम ... आपके घर के रास्ते में गुपचुप बेचता था। आप एक बार मेरे यहां गुपचुप खाए थे। आपको मीठी चटनी पसंद है ना "

" तो ? क्या हुआ तुम्हें? इतनी कम उम्र में मर मुरा गए .. काहे ? क्या हो गया था ?"

रघु - " मैम! मैं बहुत मुसीबत में हूं। जिस गाड़ी ने मुझे कुचला था उस गाड़ी का मालिक मेरे परिवार को खरीद लिया मैम ... थोड़े रूपयों के लिए मेरा परिवार बिक गया ... मेरे हत्यारे को सजा न दिलाकर उन लोगों ने पांच लाख रूपए ले लिए। "

पानी का गिलास धन्न से प्लेटफॉर्म पर रखते हुए मैंने कहा,
" भाड़ में जाएं साले .. पर मैं क्या कर सकती हूं अब ! सौदा हो चुका है और अब मैं या पुलिस कुछ नहीं कर सकते हैं।"

रघु तपाक् से बोला,
"अपने लिए नहीं आया हूं मैम।"

उसकी गंभीर आवाज़ ने मुझे रोक लिया।

" वो अमीरजादा पांच बार में पैसे दिया था मेरे घरवालों को। दो बार अम्मा को दिया.. तीसरी बार बीवी मिली उसको दिया... पांचवीं बार घर गया उसको अकेला पाकर तो बोलता है ... मेरी हो जा नहीं तो तेरे ऊपर पंद्रह लाख की चोरी लगा दूंगा।"

मैंने ठहाका लगते हुए कहा,
" मरने दो सालों को.. बिकाऊ लोग.. आया ना *** का नतीजा सामने..."

रघु- " मेरी बेटी को घूर रहा था मैम! मैं कुछ नहीं कर पाया.. बेबस देखता रह गया...."

"ओके....
कल शाम को देखते हैं ... आओ मिलने ... नाम क्या बताए थे सुअर का ? "

"नितिन देसाई मैम ..."
बोलते बोलते रघु के आर-पार शरीर में अग्नि सा लाल रंग तैर गया।

"रघु ! लोगों के अपने कर्म और कर्मफल हैं.. उसमें मेरा दखल उचित नहीं है। तुम्हारी बात समझ रही हूं पर मैं क्या कर सकती हूं ... !"

रघु - " मैम! कल शाम को कितने बजे आऊं"

रघु के दृढ़ विश्वास ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया....

एक महीने बाद.....

दरवाजे में अजीब सी दस्तक हुई...

" कहिए... कौन हैं आप... ?"

"मैम मैं ... तृप्ति हूं ! आपके बारे में सुना तो मिलने चली आई। "

"कहिए क्या काम है आपको ?"

"अंदर आऊं मैम .. आपसे बहुत जरूरी बात करनी थी ।"

मैंने तृप्ति को ड्राइंगरुम में बिठाया कि ठीक से बैठने के पहले ही वह धुंआधार बोलने लगी,

" मैम..  मेरे पति का एक महीने पहले रोड एक्सीडेंट हो गया था। क्या आप पता कर सकती हैं उनसे बात करके कि वो कौन था जिसके कारण उनकी कार असंतुलित होकर खाई में गिर गई ? लोगों ने भी देखा मैम .. एक पतला सा आदमी बिजली की गति से दौड़ता हुआ कार से टकरा गया और फिर अचानक गायब हो गया....पर ढाबे में लगे कैमरे में कुछ भी नहीं दिख रहा है। वो कौन था मैम जिसने मेरे पति की हत्या कर दी ? "

बताइए ..
क्या बताती मैं तृप्ति देसाई को कि मेरे सोफे के एक तरफ उसका पति सिर झुकाए खड़ा था और दूसरी ओर रघु ढीठता से हाथ बांधे खड़ा था।

कौन कब बलवान हो जाए ... कोई नहीं जानता!!!

#संज्ञा_पद्मबोध ©

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