Mumma Vs. Amma



खाद्य सुरक्षा बिल ( Food Security Bill ) किसी भी जिम्मेदार और जनकल्याणकारी सरकार का प्रमुख उद्देश्य माना जायेगा. प्रत्येक सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने कमजोर नागरिकों, अपाहिज, वृद्ध, बच्चों और अत्यंत गरीब वर्ग को खाद्य सुरक्षा प्रदान करे ताकि वे अपना जीवनयापन कर सकें. हमारे देश में आदिकाल से राजे-महाराजे और समृद्ध जन गरिबोब और असहायों को जीवनोपयोगी चीजें बाँटते आ रहे हैं, इसी प्रकार लंगर का आयोजन करना हमारे देश में बड़े आदर से देखा जाता है. 



बड़े देर से ही सही, चुनावों के मद्देनजर, कांग्रेस जैसी पुरानी शासक पार्टी ने आखिरकार अपने खाने-पीने के अलावा नागरिकों के खाने-पीने की चिंता की है. इतना अच्छा बिल आ रहा है परन्तु कोई ख़ुशी नहीं हो रही है, हम सब जानते हैं कि आज के हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस के पास खिलाओ और खाओ के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. श्रीमती इंदिरा गाँधी पहली नेता थीं जिन्होंने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया था, बात ७० के दशक की है, बड़ा लोकप्रिय नारा है,' था' नहीं लिख सकती क्योंकि ये नारा आज भी प्रासंगिक है. 


प्रमुख अर्थशास्त्री पाई पानान्दिकर भी खाद्य सुरक्षा बिल से  असंतुष्ट हैं क्योंकि उनका मानना है कि रोजगार देना ही खाद्य सुरक्षा है.  बात सही है, परन्तु सर, वृद्ध और बच्चे, अत्यंत अपंग रोजगार खोजने में असमर्थ होते हैं. क्या हम उनकी खाने कि जरूरतें बिना शर्त पूरी नहीं कर सकते? क्या ये राज्य ( सरकार ) का कर्तव्य नहीं है कि वो असहाय लोगों की देखभाल करे? हमारे यहाँ चलाये जाने वाले रोजगारपरक कार्यक्रम भी धांधली से भरपूर हैं सो यह बात खाद्य सुरक्षा बिल पर भी लागू होगी. तो क्या हमें इस विषय पर पहले विचार नहीं करना चाहिए क्या कि हम भ्रष्टाचार पहली फुर्सत में निपटायेंगे फिर नए कानून बनायेंगे ? 


तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने यह कहकर इस बिल का विरोध किया है कि इसमें राज्यों का हिस्सा उनकी मर्जी के बिना निर्धारित कर दिया गया है, वो अपने राज्य के अनुकूल काम नहीं कर पाएंगे. वहीँ बिहार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक चाहते हैं कि यह बिल प्रत्येक गरीब के काम आये, एक भी गरीब भूखा न सोये. सबकी अपनी-अपनी सोच है, गरीबी रेखा से नीचे आय वर्ग वाले लोगों के लिए २ रुपये किलो चावल और ३ रुपये किलो गेहूं प्रति व्यक्ति उपलब्ध करना आसान तो नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक, भारत के पास जो धान्य उपलब्ध है वह काफी हिस्सा सही तरीके से नहीं रखने की वजह से खराब हो जाता है, इतने कम दाम में अनाज देने से खाद्यान्न का अवमूल्यन ( दाम गिरना ) भी होगा.


अन्ना हजारे से निपटने के लिए सब नए-नए पैंतरे आजमा रहे हैं, गंभीरता जनता के प्रति कम और अपने प्रति ज्यादा नजर आती है. इसका खुला प्रदर्शन हम संसद में देख ही चुके हैं जब सभी सांसदों ने एक स्वर में संसद को सर्वोपरि माना था और किसी ने भी इस बात पर खेद प्रकट नहीं किया था कि संसद ६० वर्षों में भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाई है. संसद छः दशकों में देश को एक ईमानदार और कर्मठ राष्ट्रीय चरित्र देने में असमर्थ रही है क्योंकि उसका खुद का चरित्र स्वार्थपरक रहा है. गरीबों के भले के नाम पर ये अपनी जेबें गर्म करते आये हैं. शायद यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा बिल के नाम पर शीतकालीन सत्र में गर्मी के एहसास के लिए फिर गरीबों के सपने भुन्जाये जा रहे हैं. हम्म... ठंडी में भी गर्मी का एहसास !! सिर्फ और सिर्फ एहसास ही, कुछ और नहीं. 

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