शरणार्थी

भारत किसका है, असल में हकदार कौन है यह प्रश्न आज मन में आया। अंतर्मन में संग्रहित तमाम सूचनाआओं का मनचित्र ललाट के डेढ़ इंच दूर प्रोजेक्टर की भांति चलने लगा। निश्चित ही सूक्ष्म शरीर जागृत हो सक्रिय हो गया। छठवीं कक्षा की मानव का विकास क्रम वाली छवि जिसमें सबसे पहले उभरी। कॉर्डेट्स (मत्स्य)से लेकर ड्रायोपिथीकस जो कपिरूप के अधिक निकट था और रामापिथेकस जो मानवरूप के निकट था से लेकर बुद्धिमान मानव होमो सेपियन्स तक सभी किसी जंगल में निर्बाध भ्रमण करते दिखे। स्थान अफ्रीका, नर्मदा घाटी, ऑस्ट्रेलिया, ईरान कहीं भी हो सकता था। न धर्म का बंधन न समाज का न ही राजनीतिक व्यवस्था का कोई तानाबाना।
15 करोड़ वर्ष एक से तो न गुजरते सो परिवर्तन हुए। जैसे-जैसे प्रकृति से तारतम्य बढ़ा वैसे-वैसे जनसंख्या बढ़ी अर्थात् प्रकृति का दोहन बढ़ गया। बढ़ते अनुभव ने अच्छी उपजाऊ जगह की पहचान करा दी। अब यहाँ से परिवार और समाज दोनों की आवश्यकता आन पड़ी परंतु स्वभाव से जिज्ञासु और लोभी मनुष्य इतने से संतुष्ट न हुआ। उसने राज्य की कल्पना की। ताकि खुद को और शक्तिशाली बना सके। कालांतर में उत्तर वैदिक युग में धर्म का भी रस राज्य सुख में घोला गया ताकि समाज के भिन्न-भिन्न एककों को मजबूती से एक किया जा सके।
यहाँ तक तो सब ठीक था परंतु बढ़ती जनसंख्या और लालसा ने पहले मनुष्य के संयम को हर लिया फिर विवक को। अब विभिन्न क्षेत्रों की नृजातियाँ आपस में बेहतर जीवन की तृष्णा में एक दूसरे पर अपनी प्रमुखता दिखाने लगीं। हिमालय पार के क्षेत्रों से भारत पर अनेक यायावरों ने हमले किए। कुछ लूटपाट तक सीमित रहे कुछ यहाँ के निवासी बन गए। अलग-अलग कालक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों से आए इन लोगों और यहाँ के स्थाई निवासियों में आपस में ब्याह भी हुए और युद्ध भी। इन सभी स्वाभाविक घटनाक्रमों के मध्य एक बड़ी भयंकर दुर्घटना हो गई जिससे पृथ्वी का यायावरी का स्वाभाविक चक्र थम सा गया।
द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिरा दिया। युद्ध की ऐसी विभीषिका कि सारी पृथ्वी वहीं की वहीं ठहर गई। सारे अवाक् ! स्तब्ध!  मानव के एकाएक निम्नतम स्तर पर पहुँचने के गवाह बने रह गए। चारों ओर त्राहिमाम् के दृश्य। इस युद्ध से कोई अछूता न था। धन - जीवन सब की हानि। इस विभीषिका से बचने के उपाय खोजने संयुक्त राष्ट्र ने नियम बनाए। सभी देशों की राजनीतिक सीमाएँ स्पष्ट की जाने लगीं और इन सीमाओं का उल्लंघन करने वाले देशों को सजा के तौर पर सहायता से वंचित करने का प्रावधान रखा गया।
और बस यहीं से समस्त जीवद्रव्य अनेक देशों के अपने-अपने तालाब के नियमों में सड़ने लगा। हिंदू पाकिस्तान में फंस गया, उन्मुक्त ख्याल होमो सेपियंस अरब देशों में फंस गया, भारत का सच्चा मुसलमान भारत में फंस गया, सीरिया, यमन के समाचार और चित्र तो रोंगटे खड़े कर देते हैं। परंतु कभी सबके प्रिय आश्रयदाता देश अमेरिका, भारत, ब्रिटेन अब और अप्रवासी नहीं चाहते तो ये कहाँ गलत हैं ?  अपने देश की सीमाओं की रक्षा करना राज्य का प्रथम कर्तव्य है । परंतु उन नागरिकों का क्या जो बिना कसूर वहशी दरिंदों के क्षेत्र में फंस गए हैं। क्या यही है अब उनका भाग्य ? क्यो अब स्थानांतरण इतना कठिन हो गया है ? कभी भारत और अमेरिकी संस्कृति अपने भातृभाव और व्यापक दृष्टिकोण के लिए जानी जाती थीं। 'काबुलीवाला' की रचना आज का रचनाकार कैसे कर पाएगा? वो परदेस का जल जो अपनी जलमाला को तरोताजा़ कर संस्कृति को पोषित करता था अब केवल डिजीटल दुनिया का अंग बनकर रह गया है। सीरिया का हाल तो हमें पता है परंतु उनकी समस्या का निवारण किसी के पास नहीं है।
इस संसार को गतिहीन करने की सुविचारित समझ असल में मनुष्य की नासमझी है। मनुष्य और जल का प्रवाह रोका जा रहा है कल वायु और पक्षी भी रोकिएगा। हमें ऐसे समाधान खोजने होंगे जिससे शरणार्थी समस्या हो ही न क्योंकि यह वसुंधरा किसी अलकायदा या किसी राष्ट्रपति की जागीर नहीं है। वस्तुत: हम सब यहाँ कुछ पल के यात्री मात्र हैं। ऐसे में सच्चे मानव का प्रयास यही होना चाहिए कि सहयात्रियों को भी समान सम्मान और अधिकार दिया जाए। बस इतनी सी समझदारी ही तय करेगी कि हम होमो सेपियंस बुद्धिमान थे और हैं , कि हम भारतीय और अमेरिकी महान थे, हैं, और रहेंगे।

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