एक पत्र का अवसान (८)


कोई हास परिहास नहीं है डेढ़ सौ फीट गहरी खाई में छलांग लगाना...।  पर वाह रे धावक और वाह रे ठाकुर जी.... एक पल को भी इनकी आँख न झपकी ... सांसें थामें जबड़ा भींचे ... दोनों कूद पड़े पाताल में...। नीचे जाते धावक और ठाकुर के कानों में चिंघाड़ती हवा जैसे अनिष्ट का संकेत कर रही थी.... पर धावक के फैले नथूने.... और तीव्र बुद्धि उन हवाओं की इस चाल से ज़रा भी विचलित न थे.... वो तो एकाग्र हो अपने लक्ष्य की ओर देख रहे थे...।

छोटी ठकुराइन रसोई में भोजन की तैयारियाँ ज़ोरों से कर रहीं थीं और उन्हें प्रतिक्षा थी दीनू की... , वे मन ही मन सोच रहीं थीं...( न जाने कहाँ मर गया है... जब काम हो .. ये लोग दिखाई नहीं देते...अब इस बाल बुझक्कड़ कौसल (कोसू) से मैं क्या-क्या काम करवाऊँ ? कचरिन को भी अभी मौत आनी थी... झूठी कहीं की.. पड़ी होगी घर में आराम से ... बुखार हो गया है ठकुराइन.... झूठ बोला है उसका झुमकू.... अरे वही रुक जाता.... नहीं.... माँ की सेवा करूंगा ठकुराइन.... बड़ा आया सेवा करने वाला... ) इतना सोचते-सोचते ठकुराइन को अपनी भलमनसाहत पर स्वयं ही रोना आ जाता है।

हड़बडाहट और बड़बड़ाहट में ठकुराइन का पैर ताँबे के गंज से टकरा जाता है... एक ज़ोर की आवाज़ आती है रसोई से जो बड़ी ठकुराइन के कमरे तक पहुंच जाती है..... बड़ी ठकुराइन स्थिति की गंभीरता पर मनोविनोद कर चुपचाप हंसती हुई राम नाम की माला फेरतीं जाती हैं।

दीनू इस समय ठकुराइन की मानसिक व्याकुलता से अनभिज्ञ अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए एक नहर बनाने में लगा हुआ है। सहसा उसे मन में बरतन पटकने की ध्वनि सुनाई दी पर दीनू ने उसे मन का वहम समझकर अनसुना कर दिया। नदी के पा मिट्टी गीली होती है अतः कुदाल और फावड़े से जल्दी काम हो रहा है कि इतने में नारायण आ गया। बड़ी तेजी से उसने कुछ अपने हाथ से निकालकर दीनू की ओर बढ़ाया परन्तु गीली मिट्टी में फिसलकर दीनू को टक्कर दे मारी और उसी के ऊपर गिर गया... और सारा मही पकौड़े भी... दीनू के सिर का श्रृंगार बन गए।

" क्यों रे ! क्यों हो तुम ऐसे हड़बड़िए ? "

" मैं नहीं... तुम हो गड़बड़िए... इतने प्यार से दौड़े-दौड़े मही पकौड़े लाए और तुम ... सीधे खड़े भी न रह सके... किस काम का कूल्हा तुम्हारा जो हमारी एक ठोकर न सह सका...😂😂😂 "

दीनू के पास इस प्रश्न का उत्तर न था सो वो सिर से ही हाथ पोंछकर मही पकौड़े खाने लगा.....

इस दृश्य को देखकर हीरा को भी हंसी आ गई और वह दुम हिलाता दौड़कर दीनू के पास आ गया मही पकौड़े खाने...

[मतलब .... आपको विश्वास नहीं है मेरी बात का... तो हीरा की ज़ोर ज़ोर से हिलती पूँछ ही देख लीजिए... जबड़ा खुला और होंठ कान के कोर छूते .. साफ बता रहे हैं कि वो भी खूब हँस रहा था। ऊपर से पकौड़े देखकर टपकती लार ... 😂😂 ]

" दीनू ... कब तक तेरी नहर रानी लहराती खेतों तक पहुंच जाएगी कोई अनुमान.. "

" पहुंच तो आधे पहर में जाए पर .... मिट्टी बहुत चिकनी हो गई है यहाँ.. बार-बार गिर जाते हैं.. फिर उठते हैं.. फिर गिर जाते हैं... 😂😂😂 "

" 😂😂😂😂 "

ठाकुर जी से बेखबर... सब कुशलमंगल है यहाँ....... /


                                                                       (क्रमशः)

#संज्ञा_पद्मबोध ©

 🍃 🍃🙏 🙏 🙏 🍃🍃

आज का विमर्श -
मित्रता की नोंकझोंक और हास परिहास शारीरिक और मानसिक तनाव कम कर देते हैं।

Comments