26.7.11

Bol meri machhali kitna pani








Bachpan me jab hum school me apne doston ke saath khelte the to yah khel sabhi nursery group ka priya khel hota tha...GOL GOL RANI, ITTA ITTA PANI, BOL MERI MACHHALI KITTA PANI.....ITTAAA PANIIII. Bahut maja aata tha ki ab pani ka level upar hota ja raha hai aur ab hum pakad me aane hi wale hain .Maine apni beti se poochha ki tum ye khel khelti ho school me to usane kaha NAHIN. Mujhe dukh hua ki ab purane khel lupt ho rahe hain aur wo isaki jagah RINGA RINGA ROSES khelti hai. Mujhe lagta hai ki ye khel bhi agali generation me lupt ho jayega kyonki tab tak hamare desh me naa pani bachega nahi roses.


Har saal garmiyon me pani ka hahakaar hota hai aur barish me pani ki barbadi, jaise garmi khatm hote hi sab bhool jate hain ki agale varsh fir grishm ritu aane wali hai. Hamare desh me prakritik vibhinnta pai jati hai isliye kahin desh ke sabhi sthanon me jal saman matra me uplabdh nahi hota hai. Rajasthan aur Gujrat jaise pashchimi bhagon varsha ritu me jahan 100mm barish mil pati hai wahin Meghalay jaise poorvi kshetro me 10000mm tak barish record ki gai hai. Uttari prant sadabahar nadiyon se jal prapt karte hain to Daskhini prant utar-poorvi monsoon se achchhi barish prapt kar lete hain.


Hamari nadiyon, naharon aur bhoomigal jal se aur varsha jal milaakar bhi jitna pani hame milta hai wo hamari tamaam aavashyaktaon ko poorti nahi kar pata hai. Udyog, krishi, nistaar aur anya aavshyakataaon ke liye hamare paas jal ke aparyaapt strot hain. Jal rajya ka vishay hai atah yah jaruri hai atah jal ki anuplabdhta rajyon ke beech vivaad ka vishay ban jati hai kyonki nadiyan rajya ki seema dekhkar nahi bahti hain. Kaveri jal vivad, Narmada jal vivad ne rajyon ki sarkaar hi nahi apitu nivasiyon ke madhy bhi katuta paida kar di hai.
Desh ki badhti aavashyakataon ko dekhte hue rajyon ko shighratishigra ek majboot jal neeti banaani hogi aur usame sthaniya shasan ki upayogita sunishchit karni hogi taki bhavishya me in yojnaon ko sthaniy star par poora kiya ja sake.


Mere vichar se jaldohan badhne ka sabse mahatvapoorn kaaran hai, apni sanskriti se hamara palayan karna aur upbhogwadi sanskriti ki or badhana. Nai peedhi bujurgon dwara bataye gaye tarike se vanon ki raksha kare aur simit jalopbhog kare to jal samvardhan ko badhava milega. Saath hi krishi me aavashyakta anusaar hi kitnashak rasayanon ka prayog ho aur jyada se jyada jaivik khadon ka stemaal karna hoga. Akhadya paudhon par sewage ka pani tatha khara pani upyog karna chahiye. sthaniy logon ki madad se koopon ka nirman karna chahiye aur gharon me jal samvardhan upaay aavshyak roop se apnane chahiye. Factoryon se nikla pani achchhi tarah se upcharit karna chahiye taki wo paryawaran ko jyada nuksaan naa pahunchaye. Bhummigat jal ka andhadhundh dohan rokne ke liye meter lagwana chahiye taki sabko samaan matra me jal mile.


Kahin baadh aur kahin sookhe se niptane ke liye sookhagrast kshetron me anivarya roop se pedon ki sankhya badhani chahiye taki bharat ka koi bhi nagrik pyasa na rahe. Na daulat na shohrat, hamari asal poonji to hamaari dharti maa hai jiski hame har haal me raksha karni chahiye tabhi ham apne aage aane wali piddhi ko jal, vidyut aur bhojan de payenge. Aane wali peddhi ka bhi swachchha aur sundar paaryavaran par utana hi haq hai jitana hamara hai, aaj ki hamari saavdhani unka bhavishya sundar aur khushhaal banayegi. Hame apne bachchon me prakriti aur usak sansadhanon ke prati kritgyata kaa bhaav utpann karna chahiye taki wo aur unke bachche bhi hamari tarah khel saken ..GOL GOL RANI ITTA ITTA PANI, BOL MERI MACHHALI KITTA PAANIII. 

बचपन  में  जब  हम  स्कूल  में  अपने  दोस्तों  के  साथ  खेलते  तो  यह  खेल  सभी  नर्सरी  ग्रुप  का  प्रिय  खेल  होता  था ...गोल  गोल  रानी , इत्ता  इत्ता  पानी , बोल  मेरी  मछली  कित्ता  पानी .....इत्ता  पानी।बहुत  मजा  आता  था  कि  अब  पानी  का  लेवल  ऊपर  होता  जा  रहा  है  और  अब  हम  पकड़  में  आने  ही  वाले  हैं। मैंने  अपनी  बेटी  से  पूछा  कि तुम  ये  खेल  खेलती  हो  स्कूल  में  तो  उसने  कहा ' नहीं'। मुझे  दुःख  हुआ कि अब  पुराने  खेल  लुप्त  हो  रहे  हैं  और  वो  इसकी  जगह  RINGA RINGA ROSES खेलती  है। वैसे लगता  है कि ये खेल भी  अगली पीढ़ी में लुप्त हो जायेगा  क्योंकि  तब  तक  हमारे  देश  में  ना  पानी  बचेगा  और ना ही roses ।


हर साल  देश में गर्मियों  में  पानी  कि कमी से हाहाकार होता है और  बारिश  में  पानी  की  बर्बादी । जैसे  गर्मी  ख़त्म  होते  ही  सब  भूल  जाते  हैं  कि  अगले  वर्ष  फिर  से ग्रीष्म  ऋतु  आने  वाली  है । हमारे  देश  में  प्राकृतिक  विभिन्नता  पाई  जाती  है  इसलिए  देश  के  सभी  स्थानों  में  जल  सामान  मात्रा  में  उपलब्ध  नहीं  होता  है। राजस्थान  और  गुजरात  जैसे  पश्चिमी  भागों  वर्षा  ऋतु  में  जहाँ  100mm बारिश होती है वहीँ  मेघालय  जैसे  पूर्वी  क्षेत्रो  में  10000mm तक  बारिश  रिकॉर्ड  की  गई  है। उत्तरी  प्रान्त  सदाबहार  नदियों  से  जल  प्राप्त  करते  हैं  तो  दक्षिण प्रान्त  उत्तर -पूर्वी  मोन्सून से  अच्छी बारिश  प्राप्त करते हैं।


हमारी  नदियों , नहरों, भूमिगल  जल से  और  वर्षाजल  मिलाकर  भी  जितना  पानी  हमें  मिलता  है  वो  हमारी  तमाम  आवश्यकताओं की  पूर्ती  नहीं  कर  पाता है। उद्योग , कृषि , निस्तार  और  अन्य  आवश्यकताओं  के  लिए  हमारे  पास  जल  के  अपर्याप्त स्त्रोत  हैं। जल  राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। इसीलिए जल  की  अनुपलब्धता  राज्यों  के  बीच  विवाद  का  विषय  बन  जाती  है  क्योंकि  नदियाँ  राज्य  की  सीमा  देखकर  नहीं  बहती  हैं। कावेरी  जल  विवाद , नर्मदा  जल  विवाद आदि ने  राज्यों  की  सरकार  ही  नहीं  अपितु  निवासियों  के  मध्य  भी  कटुता  पैदा  कर  दी  है।  देश  की  बढती  आवश्यकताओं  को  देखते  हुए  राज्यों  को  शीघ्रतिशीघ्र   एक  मजबूत  जल  नीति  बनानी  होगी  और  उसमे  स्थानीय  शासन  की  उपयोगिता  सुनिश्चित  करनी  होगी  ताकि  भविष्य  में  इन  योजनाओं  को  स्थानीय  स्तर पर  पूरा  किया  जा  सके।


मेरे  विचार  से  जलदोहन  बढ़ने  का  सबसे  महत्वपूर्ण  कारण  है , अपनी  संस्कृति  से  हमारा  पलायन  करना  और  उपभोगतावादी  संस्कृति  की  ओर  बढ़ना। नई  पीढ़ी  बुजुर्गों  द्वारा  बताये  गए  तरीको से  वनों  की  रक्षा  करे  और  सीमित  जलोपभोग  करे  तो  जल  संवर्धन  को  बढ़ावा  मिलेगा। साथ  ही  कृषि  में  आवश्यकता  अनुसार  ही  कीटनाशक  रसायनों  का  प्रयोग  हो  और  ज्यादा  से  ज्यादा  जैविक  खादों  का  इस्तेमाल  करना  होगा। अखाद्य पौधों  पर निस्तार का  पानी  तथा  खारा  पानी डालना चाहिए। स्थानीय  लोगों  की  मदद  से  कूपों  का निर्माण  करना  चाहिए  और  घरों  में  जल  संवर्धन  उपाय  आवश्यक  रूप  से  अपनाने  चाहिए। फैक्ट्रियों से  निकला  पानी  अच्छी  तरह  से  उपचारित  करना  चाहिए  ताकि  वो  पर्यावरण  को  ज्यादा  नुक्सान  ना  पहुंचाए। भूमिगत  जल  का  अंधाधुंध  दोहन  रोकने  के  लिए  मीटर  लगवाना  चाहिए  ताकि  सबको  सामान  मात्रा   में  जल  मिले। कहीं  बाढ़  और  कहीं  सूखे  से  निपटने  के  लिए  सूखाग्रस्त क्षेत्रों  में  अनिवार्य  रूप  से  पेड़ों  की  संख्या  बढ़नी  चाहिए  ताकि  भारत  का  कोई  भी  नागरिक  प्यासा न  रहे।


न  दौलत  न  शोहरत , हमारी  असल  पूँजी  तो  हमारी  धरती  माँ  है। जिसकी  हमें  हर  हाल  में  रक्षा  करनी  चाहिए  तभी  हम  अपने  आगे  आने  वाली  पीढ़ी  को जल , विद्युत और  भोजन  दे  पाएंगे। आने  वाली  पीढ़ी  का  भी  स्वच्छ और  सुन्दर  पर्यावरण  पर  उतना  ही  हक  है  जितना  हमारा  है। आज  की  हमारी  सावधानी  उनका  भविष्य  सुन्दर  और  खुशहाल  बनाएगी। हमें  अपने  बच्चों  में  प्रकृति  और  उसके  संसाधनों  के  प्रति  कृतज्ञता  का  भाव  उत्पन्न  करना  चाहिए  ताकि  वो  और  उनके  बच्चे  भी  हमारी  तरह  खेल  सकें ....'गोल  गोल  रानी  इत्ता  इत्ता  पानी , बोल  मेरी मछली  कित्ता पानी '। 

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