16.6.17

रेत के टीले पर III

वो मुसाफिर कोई और था
जो चला गया छोड़कर...
ये मुसाफिर कोई और है
जो खड़ा है साथ ईंट की दीवार से टिककर..
वो मुसाफिर कोई और होगा
जो आएगा इसके बाद
मेरे कश के धुँए के खत्म होते-होते
इस रेत के टीले पर....

* धुँए - प्राण
©पद्मबोध संज्ञा अग्रवाल

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