16.6.17

गुरमेहरवाद..

मुझे वाद-विवाद कभी अच्छे नहीं लगे। दोनों पक्ष सही हैं पर अपना ही राग अलापेंगे बस। ऐसी बहस में चाहे कोई  कितना भी अच्छा तर्क दे या भाषा का प्रयोग करें और दोनों पक्षों में से कोई भी जीते मुझे वो थोड़ा पानी कम ही लगते। आप एक ही बात पर अटक गए मतलब पूरी बात आपने समझी कहाँ।

अब क्योंकि पीएससी से जुड़ी हूं तो tv पर डिबेट देखती हूं । आज तक पर, दूरदर्शन पर... इनके डिबेट मुझे अच्छे लगते थे परंतु एक दिन गलती से मैंने अर्नब गोस्वामी को सुन लिया । मुद्दा था कि कश्मीरी युवक पाकिस्तान की जीतने की खुशी मना रहे थे और जेएनयू के दूसरे लड़कों ने उन्हें गुस्से में पीट दिया। बड़ी मासूम सूरत बनाते हुए कश्मीर के सुंदर लड़के तर्क देते हैं कि भारत में बोलने की आजादी है तो हम पाकिस्तान के जीतने पर खुशी क्यों नहीं मना सकते?

और बोलते-बोलते उस मासूम खूबसूरत लड़के ने सिर नीचे झुका कर एक बदमाश मुस्कुराहट छुपाई। मेरा खून खौल गया देख कर। हमारे डैशिंग ऑर्नब गोस्वामी कहां वेट करते हैं संघी का.. कोई कुछ बोले वह खुद ही कूद पड़े ...उनका तर्क सुनिए, "मतलब आप कहना चाहते हैं कि जापान जीतेगा कोई फुटबॉल मैच और मैं बम फोड़ना चाहता हूं ... ऑस्ट्रेलिया जीतेगा कोई मैच में बम फोड़ना चाहता हूं इसमें आपको क्या आपत्ति है... पर ऐसा कभी होता नहीं है ना ... मेरे डिबेट में आप भारत के खिलाफ एक बात नहीं कह सकते ... पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है उसकी जीत में खुशी मनाना.. आपका कोई तर्क अलाउड नहीं है। "

उस खूबसूरत मासूम कश्मीरी चेहरे का क्या रंग उड़ा.. मैं आपको क्या बताऊं ..मजा आ गया डिबेट देखकर..

वहीं कल बेहद चर्चित कन्हैया जी का तर्क सुना.. कितना मूर्ख आदमी है यह ...कितनी मूर्खतापूर्ण बातें करता है... धन्य हैं हमारे संबित पात्रा जी मेरे दूसरे पसंदीदा पात्र जिनकी वजह से मुझे डिबेट भाने लगे.. उन्होंने कन्हैया के तर्कों का इतना अच्छा जवाब दिया कि बंगाल की भूमि में होने के बावजूद भी उनके तर्कों को लोगों ने बेहद सराहा ... बताइए कन्हैया को रामदेव बाबा के अमीर होने पर एतराज था.. संबित पात्राजी ने कहा तो आप चाहते हैं कि वह गरीब बने रहें.... अपनी मेहनत से आज वो आगे आ गए तो उन्हें आप रोल मॉडल बनाएंगे या कोसेंगे?

इन दोनों महानुभावों की वजह से मुझे डिबेट अच्छी लगने लगी ।

 ....कल ndtv लग गया गलती से और वह दिमाग खराब हुआ कि नींद नहीं आई। उनका कहना था जोकि रवीश कुमार जी अपने अजीब ढंग से बता रहे थे जैसे कि कोई बच्चा महीनों से भूखा हो तो कैसे वह खाने पर टूट पड़ता है .. वैसे ही हमारे रवीश कुमार जी बिना सांस लिए अपनी बात धारा प्रवाह बोलते हैं जैसे सालों के भूखे हों। कल ठोककर उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि केवल नक्सली साहित्य मिल जाने से कोई देशद्रोही नहीं होता ..जबतक हिंसा नहीं हुई है कोई देशद्रोही नहीं माना जाएगा।

हे रवीश कुमार और कोर्ट ! इन 2 प्रश्नों का जवाब दीजिए पहले,
आदरणीय न्यायालय की सच्चाई अगर हम लिख दें या बोल दें.. तो कोई उस से दंगा तो नहीं भड़कता तो फिर इसे न्यायालय की अवमानना मानकर जेल क्यों भेज दिया जाता है.... दूसरा, कोई व्यक्ति यदि दूसरे व्यक्ति को रेप कर देंगे बोल दे तो उसके बोलने से रेप तो नहीं हो जाता.. तो फिर पुलिस उस आरोपी को क्यों गिरफ्तार कर लेती है । अब क्योंकि आपने अपने देश को एक भौगोलिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से बस देखा है तो आपको लगता है कि इसके खिलाफ बोल देने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता कि उसे सजा दी जाए । मतलब आपकी बहन को किसी ने देख कर कोई हनन जैसी बात कर दी ..आपको पीटने का जो मन हुआ खून खौला वह जायज है.. परंतु एक दूसरा व्यक्ति यदि भारत को अपनी मां समझता है और उसके हनन का प्रयास होते देखता है और उसका खून खौल जाता है और हाथ उठ जाता है तो वह गलत है ... क्योंकि वह व्यक्ति उस खास पार्टी का है जो आपको नहीं पसंद है । कोर्ट सिर्फ दूसरों को भाषण देने के लिए बनाए गए हैं... उलजुलूल कैसे भी फैसले करिए ...सैलरी रखिए और घर में निकल जाइए । रविशजी ..आपका tv चैनल असंतुष्टों को खुश करने की खुजली मारक दवाई से ज्यादा कुछ नहीं लगता मुझे।

लाहौल विला कूवत......धिक्कार है तुम पर ! अब मेरी बात इतनी सही तो नहीं है क्योंकि मैं किसी शहीद की बेटी नहीं हूं ... मेरे घरवाले तो व्यापारी हैं।... मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं हूं ...मेरे पास मीडिया की ताकत भी नहीं है ... पैसे की ताकत भी नहीं है पर इतना जरुर पता है कि मेरी देशभक्ति किस से ज्यादा है और किससे कम इसका सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत मुझे बिल्कुल नहीं है । भई  जिनके समझ में आया उनको राम-राम और बाकी को हे राम !

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