शांतिदूत गिलानी


मालदीव्स में चल रहे सार्क सम्मलेन में सबकी नजर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बातचीत पर टिकी थी. भारत पाक का रिश्ता हमेशा खट्टा मीठा रहा है और द्विपक्षीय वार्ता का कोई ठोस हल कभी नहीं निकला है परन्तु हर बार दोनों देशों के लोग अपने नेतृत्व की ओर आशा के साथ देखते हैं कि शायद इस बार कुछ ऐसा हो कि दोनों देशों के बीच कोई मजबूत रिश्ता बन पाए. बातों-बातों में मनमोहन सिंह ने पाक प्रधानमंत्री पर ऐसी जिम्मेदारी डाल दी है जिसे उठाना आसान नहीं है. 

दोनों देशों के मध्य यह रिश्ता कल, व्यापार और सांस्कृतिक पर सुधारा जाता है परन्तु जैसे ही बात आतंकवाद पर आती है कि दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर देते हैं. इस बार कुछ अलग हुआ, भारत के प्रधानमंत्री ने अपने पडोसी देश के प्रधानमंत्री को 'शांतिदूत' कह दिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बात दरकिनार कर दी कि पाक अभी भी आतंक का सबसे बड़ा आश्रय स्थल है, अजमल कसब को आतंकी बनाने का काम पाक की भूमि में ही हुआ है. आज भी पकिस्तान में चुनाव हिन्दुस्तान के खिलाफ जहर उगलकर ही जीते जाते हैं. 

फिर भी, यदि मनमोहन सिंह यह सोचते हैं कि दोनों देशों के आपसी समबन्ध सुधारने के लिए सकारात्मक सोच और बड़प्पन जरुरी है तो इसमें गलत क्या है. कहा भी गया है कि, 'क्षमा बडन को चाहिए, छोटों को दुलार '. अब यह गिलानीजी के ऊपर है कि वो अपने देश को सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं या अभी भी चीन की मदद से भारत को झुकाने का ही प्रयास करते हैं. चीन तो पाकिस्तान के पक्ष में है ही, यदि भारत से दुश्मनी ख़त्म कर पाकिस्तान दोस्ती बढाता है तो न केवल दोनों देशों के लोग सुकून से जी सकेंगे बल्कि ऐसी ताक़त बनेंगे कि दुनिया भी आतंकवाद से कुछ राहत महसूस करेगी.

पाकिस्तानी जमीन का इतना दुरूपयोग हो चुका है कि एकदम से तो आतंक नहीं मिटाया जा सकता परन्तु यदि पाकिस्तानी हुकूमत चाहे तो अमेरिका और भारत की मदद से इस आतंक पर एक सार्थक कार्यवाही कर सकती है. इसके लिए सबसे पहले पाकिस्तान को अपने दोहरेपन से बचकर रहना होगा क्योंकि चीन भारत को तो कंट्रोल कर सकता है परन्तु पाक के अन्दर फ़ैल रहे आतंकवाद से उसे नहीं बचा पाएगा. आज की तारीख में यह एक दिवास्वप्न अवश्य लगता है परन्तु देखा जाए तो पाक के पास इस स्वप्न को हकीकत में बदलने के अलावा और कोई रास्ता भविष्य में नहीं बचेगा क्योंकि भारत तेजी से अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत बढ़ा रहा है. ऐसे में, चीन से निपटाना भी भारत के लिए कुछ वर्षों बाद आसान होगा. देखना है कि क्या गिलानी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बातों को गंभीरता से लिया है ? या यह वार्ता भी मात्र एक कागज़ी दस्तावेज बनकर रह जाएगी. 

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